पृथ्वी की आंतरिक संरचना: एक विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण
📅 भूगोल शोध नोट्स | कक्षा 11
पृथ्वी, जिस पर हम रहते हैं, ऊपर से जितनी शांत और स्थिर दिखाई देती है, इसके भीतर का संसार उतना ही गतिशील और जटिल है। मनुष्य ने चंद्रमा पर कदम रख दिए हैं और मंगल ग्रह तक पहुँचने की योजना बना ली है, लेकिन यह एक विडंबना ही है कि हम अपनी ही पृथ्वी की गहराई में आज तक 12 किलोमीटर से अधिक नहीं जा पाए हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझना न केवल भू-गर्भ शास्त्रियों के लिए जिज्ञासा का विषय है, बल्कि यह मानव अस्तित्व की सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। भूकंप क्यों आते हैं? सुनामी की विनाशकारी लहरें कैसे उत्पन्न होती हैं? और ज्वालामुखी से निकलने वाला धधकता लावा कहाँ से आता है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर पृथ्वी की विभिन्न परतों—भूपर्पटी, मैंटल और क्रोड—की कार्यप्रणाली में छिपे हैं। यह लेख पृथ्वी की आंतरिक स्थिति को समझने के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों का अत्यंत विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
1. भूगर्भ की जानकारी के साधन: प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष साक्ष्य
चूँकि पृथ्वी की त्रिज्या 6,370 किलोमीटर है, इसलिए इसके केंद्र तक पहुँचकर नमूने लेना असंभव है। गहराई बढ़ने के साथ तापमान और दबाव इतनी तेजी से बढ़ते हैं कि वहाँ किसी भी मशीन का टिक पाना संभव नहीं है। अतः, वैज्ञानिकों ने भूगर्भ को समझने के लिए दो प्रकार के स्रोतों का सहारा लिया है:
A. प्रत्यक्ष स्रोत (Direct Sources)
ये वे साक्ष्य हैं जो हमें पृथ्वी के पदार्थों को साक्षात देखने और उनके विश्लेषण का अवसर देते हैं:
- खनन (Mining): विश्व की सबसे गहरी सोने की खानें (दक्षिण अफ्रीका) मात्र 3 से 4 किमी गहरी हैं। इतनी गहराई पर भी तापमान इतना अधिक हो जाता है कि अधिक नीचे जाना संभव नहीं है।
- ड्रिलिंग (Drilling): 'गहरे समुद्र में प्रवेधन परियोजना' (Deep Ocean Drilling Project) के तहत वैज्ञानिक महासागरों में छेद कर रहे हैं। अब तक का सबसे गहरा प्रवेधन आर्कटिक महासागर के कोला (Kola) क्षेत्र में किया गया है, जिसकी गहराई 12 किलोमीटर है।
- ज्वालामुखी उद्गार: यह प्रत्यक्ष जानकारी का एक बड़ा स्रोत है। जब मैग्मा सतह पर आता है, तो हम उन चट्टानी पदार्थों का अध्ययन कर सकते हैं जो गहराई से निकले हैं। हालांकि, यह पता लगाना कठिन होता है कि यह पदार्थ वास्तव में कितनी गहराई से बाहर आया है।
B. अप्रत्यक्ष स्रोत (Indirect Sources)
चूँकि प्रत्यक्ष स्रोत केवल 12 किमी तक सीमित हैं, इसलिए केंद्र तक की जानकारी के लिए वैज्ञानिक अनुमानों और भौतिक सिद्धांतों का उपयोग करते हैं:
- तापमान, दबाव और घनत्व: यह एक स्थापित तथ्य है कि गहराई बढ़ने के साथ-साथ तापमान, दबाव और पदार्थ का घनत्व बढ़ता है। वैज्ञानिकों ने इन परिवर्तनों की दर के आधार पर पृथ्वी के केंद्र में तापमान (लगभग 6000°C) और घनत्व का अनुमान लगाया है।
- उल्काएँ (Meteorites): जो उल्काएं पृथ्वी तक पहुँचती हैं, वे उन्हीं पदार्थों से बनी हैं जिनसे सौरमंडल और हमारी पृथ्वी बनी है। उल्काओं के केंद्र का विश्लेषण करने से हमें पृथ्वी के 'क्रोड' की संरचना (लोहा और निकिल) को समझने में मदद मिली है।
- गुरुत्वाकर्षण (Gravitation): पृथ्वी के विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं होता। ध्रुवों पर यह अधिक और भूमध्य रेखा पर कम होता है। इस भिन्नता को 'गुरुत्व विसंगति' (Gravity Anomaly) कहा जाता है, जो हमें पृथ्वी के भीतर द्रव्यमान के असमान वितरण की सूचना देती है।
- चुंबकीय क्षेत्र: पृथ्वी के चुंबकीय सर्वेक्षणों से भूपर्पटी में चुंबकीय पदार्थों के वितरण और आंतरिक सक्रियता का पता चलता है।
2. भूकंप विज्ञान (Seismology): पृथ्वी का एक्सरे
भूकंपीय तरंगों का अध्ययन पृथ्वी की आंतरिक परतों का संपूर्ण चित्र प्रस्तुत करने वाला सबसे सशक्त माध्यम है। इसे 'पृथ्वी का एक्सरे' कहना गलत नहीं होगा।
- उद्गम केंद्र (Focus/Hypocentre): वह आंतरिक स्थान जहाँ से भूकंप की ऊर्जा मुक्त होती है।
- अधिकेंद्र (Epicentre): धरातल पर वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (90°) स्थित होता है। यहाँ सबसे पहले झटके महसूस होते हैं।
- सीस्मोग्राफ (Seismograph): वह यंत्र जो सतह पर पहुँचने वाली भूकंपीय तरंगों को रिकॉर्ड करता है।
भूकंपीय तरंगों के प्रकार और उनकी चाल
तरंगें दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित हैं: भूगर्भिक तरंगें (Body Waves) और धरातलीय तरंगें (Surface Waves)।
- P-तरंगें (Primary Waves):
- ये सबसे तेज चलती हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं।
- ये ध्वनि तरंगों के समान होती हैं और ठोस, तरल व गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं।
- ये जिस दिशा में चलती हैं, उसी दिशा में कणों में संकुचन और फैलाव पैदा करती हैं।
- S-तरंगें (Secondary Waves):
- ये P-तरंगों के कुछ समय बाद पहुँचती हैं।
- इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये केवल ठोस पदार्थों से ही गुजर सकती हैं।
- यह विशेषता अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि जब S-तरंगें पृथ्वी के बाह्य क्रोड में रुक जाती हैं, तो इससे सिद्ध होता है कि बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है।
- धरातलीय तरंगें (Surface Waves):
- ये धरातल के साथ-साथ चलती हैं और सबसे अंत में रिकॉर्ड होती हैं।
- ये सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं क्योंकि ये इमारतों को गिराने और धरातलीय विस्थापन के लिए जिम्मेदार हैं।
3. भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow Zone)
पृथ्वी के भीतर कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भूकंपीय तरंगें नहीं पहुँच पातीं। इसे 'छाया क्षेत्र' कहा जाता है।
- P-तरंगों का छाया क्षेत्र: अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच एक पट्टी के रूप में होता है। इसका कारण तरंगों का क्रोड में मुड़ जाना (Refraction) है।
- S-तरंगों का छाया क्षेत्र: यह 105° के बाद पूरे क्षेत्र में फैला होता है। यह पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल का 40% से अधिक है। चूँकि S-तरंगें तरल में नहीं चल सकतीं, इसलिए वे बाह्य क्रोड को पार नहीं कर पातीं।
1. रिक्टर स्केल (Richter Scale): यह भूकंप के दौरान मुक्त होने वाली 'ऊर्जा' (Magnitude) को मापता है। इसकी सीमा 0 से 10 होती है। प्रत्येक 1 अंक की वृद्धि का अर्थ है 32 गुना अधिक ऊर्जा।
2. मरकैली स्केल (Mercalli Scale): यह भूकंप से होने वाली 'प्रत्यक्ष हानि' या गहनता (Intensity) को मापता है। इसकी सीमा 1 से 12 तक होती है।
4. पृथ्वी की परतदार संरचना (Structure of the Earth)
भूकंपीय डेटा के आधार पर वैज्ञानिकों ने पृथ्वी को तीन मुख्य परतों में विभाजित किया है:
| परत (Layer) | गहराई (Depth) | घनत्व (Density) | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| भूपर्पटी (Crust) | 0 - 70 किमी | 2.7 - 3.0 g/cm³ | यह ठोस और भंगुर है। महासागरों के नीचे यह मात्र 5 किमी और हिमालय के नीचे 70 किमी तक मोटी है। |
| मैंटल (Mantle) | 70 - 2900 किमी | 3.4 - 5.5 g/cm³ | यह मोहो असांतत्य से शुरू होती है। इसका ऊपरी हिस्सा 'दुर्बलतामंडल' (Asthenosphere) कहलाता है जो अर्ध-तरल है। |
| क्रोड (Core) | 2900 - 6370 किमी | 10.0 - 13.0 g/cm³ | भारी धातु निकिल और लोहे (Nife) से बना। बाह्य क्रोड तरल और आंतरिक क्रोड ठोस है। |
स्थलमंडल (Lithosphere): भूपर्पटी और ऊपरी मैंटल का ठोस भाग मिलकर स्थलमंडल कहलाता है, जिसकी मोटाई 10 से 200 किमी के बीच होती है।
5. ज्वालामुखी और ज्वालामुखीय भू-आकृतियाँ
ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर वह छिद्र या दरार है जहाँ से मैग्मा, गैसें और राख बाहर निकलते हैं। 'दुर्बलतामंडल' (Asthenosphere) ही वह मुख्य क्षेत्र है जहाँ से मैग्मा धरातल की ओर गति करता है।
प्रमुख ज्वालामुखियों का वर्गीकरण:
- शील्ड ज्वालामुखी (Shield Volcano): ये मुख्यतः बेसाल्ट से बने होते हैं। लावा बहुत तरल होता है, इसलिए इनका ढाल बहुत मंद होता है। हवाई द्वीप इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।
- मिश्रित ज्वालामुखी (Composite Volcano): इनसे गाढ़ा और चिपचिपा लावा निकलता है। ये भीषण विस्फोटक होते हैं और परतों के रूप में जमा होकर ऊँचे शंकु बनाते हैं।
- ज्वालामुखी कुंड (Caldera): ये सबसे अधिक विस्फोटक होते हैं। विस्फोट के बाद ये ढाँचा ऊपर उठाने के बजाय नीचे धँस जाते हैं, जिससे विशाल गड्ढा बनता है।
- बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र (Flood Basalt): इसमें लावा बहुत दूर तक बहकर फैल जाता है। भारत का दक्कन ट्रैप (महाराष्ट्र पठार) इसी प्रक्रिया का परिणाम है।
6. अंतर्वेधी आकृतियाँ (Intrusive Landforms)
जब मैग्मा धरातल पर पहुँचने से पहले ही भूपर्पटी के नीचे ठंडा होकर जम जाता है, तो उसे 'पातालीय चट्टानें' कहते हैं। इनसे बनी आकृतियाँ निम्नलिखित हैं:
- बैथोलिथ (Batholith): ग्रेनाइट का बना विशाल पिंड जो बहुत गहराई पर गुंबद के रूप में जमता है। यह मैग्मा भंडार का जमे हुए हिस्सा है।
- लैकोलिथ (Lacolith): गुंबदनुमा आकृति जिसका तल समतल होता है और यह नीचे से एक नली (Pipe) द्वारा जुड़ा होता है।
- लैपोलिथ, फैकोलिथ: तश्तरी के आकार में जमा लावा लैपोलिथ कहलाता है, जबकि लहरदार मोड़ों में जमा लावा फैकोलिथ कहलाता है।
- सिल और शीट: लावा का क्षैतिज दिशा में चादर की तरह जमना। पतली परत को शीट और मोटी परत को सिल कहते हैं।
- डाइक (Dyke): जब लावा दरारों में धरातल के समकोण (दीवार की तरह) ठंडा होता है, तो उसे डाइक कहते हैं। महाराष्ट्र में ये बहुतायत में मिलते हैं।
7. भूकंप के प्रभाव और आपदा
भूकंप एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। इसके प्रभावों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
- भौतिक प्रभाव: भूमि का हिलना, भू-स्खलन, मृदा द्रवण (Soil Liquefaction), और धरातलीय विस्थापन।
- मानवीय व ढांचागत प्रभाव: इमारतों का गिरना, आग लगना, बाँधों का टूटना और सुनामी।
सुनामी: यह भूकंप नहीं है, बल्कि भूकंपीय तरंगों के कारण समुद्र तल में होने वाले विस्थापन से उत्पन्न होने वाली विशाल लहरें हैं। यह तभी पैदा होती है जब भूकंप का अधिकेंद्र समुद्र के नीचे हो और तीव्रता 7.5 से अधिक हो।
अभ्यास: परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न एवं समाधान
1. 'P' और 'S' तरंगों में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: P-तरंगें ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों में चल सकती हैं और सबसे तेज होती हैं। S-तरंगें केवल ठोस माध्यम में ही गमन कर सकती हैं और बाह्य क्रोड में लुप्त हो जाती हैं।
2. दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) क्या है?
उत्तर: यह ऊपरी मैंटल का 400 किमी तक का भाग है जो अर्ध-पिघली अवस्था में है। यही ज्वालामुखियों के मैग्मा का मुख्य स्रोत है।
3. दक्कन ट्रैप का निर्माण किस प्रकार के उद्गार से हुआ है?
उत्तर: बेसाल्ट प्रवाह (Flood Basalt) प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार से।
4. रिक्टर स्केल और मरकैली स्केल में क्या अंतर है?
उत्तर: रिक्टर स्केल भूकंप की 'ऊर्जा' (Magnitude) को मापता है, जबकि मरकैली स्केल भूकंप से हुई 'प्रत्यक्ष हानि' (Intensity) को मापता है।
निष्कर्ष: एक गतिशील और ऊर्जावान ग्रह
पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन हमें यह बताता है कि हम जिस धरातल पर खड़े हैं, उसके नीचे शक्तियों का एक प्रचंड भंडार है। भूगर्भ में होने वाली हलचलें ही हमारे महाद्वीपों को खिसकाती हैं और नए पर्वतों का निर्माण करती हैं। भूकंप और ज्वालामुखी भले ही मानव के लिए विनाशकारी हों, लेकिन वे पृथ्वी की आंतरिक ऊर्जा के संतुलन के लिए अनिवार्य हैं। इन प्रक्रियाओं को समझकर ही हम भविष्य में आने वाली आपदाओं के प्रभाव को कम कर सकते हैं और पृथ्वी के संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। भूगोल का यह अध्याय हमारे अस्तित्व की जड़ों को वैज्ञानिक रूप से समझने का आधार प्रदान करता है।
