स्वतंत्र भारत में राजनीति : 5.कांग्रेस प्रणाली - चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

स्वतंत्र भारत में राजनीति : कांग्रेस प्रणाली - चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना | विस्तृत अध्ययन
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कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

स्वतंत्र भारत में राजनीति : 5.कांग्रेस प्रणाली - चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में 1960 का दशक एक अत्यंत उथल-पुथल भरा काल रहा है। इसे अक्सर 'खतरनाक दशक' के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस दौरान राष्ट्र ने अपने दो महान प्रधानमंत्रियों को खोया, दो बड़े युद्ध झेले और भीषण आर्थिक संकट का सामना किया। नेहरू युग की समाप्ति के बाद यह प्रश्न उठा कि क्या भारत की लोकतांत्रिक जड़ें इतनी मजबूत हैं कि वह शांतिपूर्ण नेतृत्व परिवर्तन कर सके? इस अध्याय में हम विश्लेषण करेंगे कि कैसे कांग्रेस पार्टी ने अपनी आंतरिक कलह, 'राजनीतिक भूकंप' और विभाजन के बावजूद इंदिरा गांधी के नेतृत्व में एक नई शक्ति के रूप में स्वयं को पुनर्स्थापित किया।


1. राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती: नेहरू के बाद का भारत

27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन ने देश में एक राजनीतिक शून्यता पैदा कर दी। नेहरू केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के निर्माता और कांग्रेस के सर्वमान्य स्तंभ थे। उनके बाद दो मुख्य सवाल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में गूँज रहे थे:

  • नेहरू के बाद कौन? (Who after Nehru?) - क्या कोई ऐसा नेता है जो पूरे देश को स्वीकार्य हो?
  • नेहरू के बाद क्या? (What after Nehru?) - क्या भारत में लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा या यहाँ भी अन्य नव-स्वतंत्र देशों की तरह सैन्य शासन आ जाएगा?
⚠️ 'खतरनाक दशक' (Dangerous Decade) क्यों?
1960 के दशक को इसलिए खतरनाक कहा जाता है क्योंकि भारत एक साथ कई संकटों से जूझ रहा था। 1962 के चीन युद्ध ने देश का मनोबल तोड़ दिया था। 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ। लगातार मानसून की विफलता से भयंकर सूखा पड़ा और खाद्यान्न की भारी कमी हो गई। इसके अलावा, साम्प्रदायिक दंगे और क्षेत्रीय अलगाववाद की आवाज़ें भी तेज हो रही थीं। आलोचकों को लगता था कि भारत का लोकतांत्रिक ढांचा बिखर जाएगा।

2. नेहरू से शास्त्री तक: सादगी और संकल्प का युग (1964-1966)

नेतृत्व परिवर्तन का पहला चरण आश्चर्यजनक रूप से शांतिपूर्ण रहा। कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने पार्टी के भीतर आम सहमति बनाई।

लालबहादुर शास्त्री का चयन:

लालबहादुर शास्त्री को उनकी सादगी, ईमानदारी और सिद्धांत-निष्ठा के कारण निर्विरोध नेता चुना गया। वे नेहरू मंत्रिमंडल के एक अनुभवी सदस्य थे। उनके कार्यकाल के दौरान भारत ने दो बड़े संकट झेले—भयंकर खाद्यान्न संकट और 1965 का भारत-पाक युद्ध।

  • जय जवान, जय किसान: शास्त्री जी ने इन दो संकटों से निपटने के लिए यह कालजयी नारा दिया, जिसने देश में आत्मविश्वास फूँक दिया।
  • ताशकंद समझौता: युद्ध विराम के बाद वे सोवियत संघ के ताशकंद गए, जहाँ 10 जनवरी 1966 को समझौते पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद उनका आकस्मिक निधन हो गया।

3. इंदिरा गांधी का उदय: उत्तराधिकार का दूसरा संघर्ष

शास्त्री जी की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का संघर्ष अधिक तीव्र और प्रतिस्पर्धी हो गया। इस बार मुकाबला दो दिग्गजों के बीच था:

  1. मोरारजी देसाई: बम्बई प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री और एक कड़े अनुशासक।
  2. इंदिरा गांधी: पंडित नेहरू की पुत्री और शास्त्री मंत्रिमंडल में सूचना मंत्री।
🗳️ सिंडिकेट की भूमिका:
कांग्रेस के भीतर प्रभावशाली नेताओं के समूह 'सिंडिकेट' ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया। उन्हें लगा कि इंदिरा राजनीति में नई हैं और वे अपने निर्णयों के लिए सिंडिकेट पर निर्भर रहेंगी। चुनाव के लिए 'गुप्त मतदान' (Secret Ballot) का सहारा लिया गया, जिसमें इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को दो-तिहाई मतों से पराजित कर दिया।

4. चौथा आम चुनाव (1967): "राजनीतिक भूकंप"

1967 का चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। पहली बार कांग्रेस को जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा।

चुनावी माहौल:

आर्थिक मंदी, बढ़ती कीमतें, बेरोजगारी और रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) ने जनता को सड़कों पर उतार दिया था। विपक्षी दलों ने एकजुट होकर कांग्रेस को घेरने की रणनीति बनाई, जिसे 'गैर-कांग्रेसवाद' कहा गया। इसका वैचारिक ढांचा समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने तैयार किया था।

⚡ 1967 के परिणामों के झटके:
- कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत तो मिला, लेकिन उसकी सीटों में भारी गिरावट आई।
- इंदिरा के मंत्रिमंडल के आधे मंत्री चुनाव हार गए (के. कामराज और एस.के. पाटिल जैसे दिग्गज भी)।
- कांग्रेस ने 9 राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास, केरल, पंजाब, हरियाणा) में अपनी सत्ता गँवा दी।
- मद्रास में DMK पहली ऐसी क्षेत्रीय पार्टी बनी जिसने अकेले पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई।

5. गठबंधन और दल-बदल की नई राजनीति

1967 के बाद राज्यों में संयुक्त विधायक दल (SVD) की सरकारें बनीं। ये सरकारें विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि 'कांग्रेस विरोध' के आधार पर बनी थीं। यहीं से 'दल-बदल' की संस्कृति शुरू हुई।

  • आया राम-गया राम: हरियाणा के विधायक गया लाल ने पखवाड़े भर में तीन बार पार्टी बदली, जिसने भारतीय राजनीति में नैतिकता के पतन और सत्ता लोलुपता को उजागर किया।

6. कांग्रेस में ऐतिहासिक विभाजन (1969)

प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने स्वयं को सिंडिकेट के नियंत्रण से मुक्त करना शुरू किया। उन्होंने एक स्पष्ट वामपंथी रुख अपनाया और 'दस-सूत्री कार्यक्रम' की घोषणा की, जिसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण और भूमि सुधार शामिल थे।

राष्ट्रपति चुनाव और अंतरात्मा की आवाज़:

1969 में राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के निधन के बाद विवाद गहरा गया। सिंडिकेट ने एन. संजीव रेड्डी को उम्मीदवार बनाया, जबकि इंदिरा ने स्वतंत्र उम्मीदवार वी.वी. गिरि को समर्थन दिया। इंदिरा ने पार्टी सांसदों से 'अंतरात्मा की आवाज़' पर वोट देने को कहा। वी.वी. गिरि की जीत ने कांग्रेस के विभाजन को औपचारिक बना दिया:

  • Congress (O): ऑर्गनाइजेशन—सिंडिकेट के नेतृत्व वाली 'पुरानी' कांग्रेस।
  • Congress (R): रिक्विजिनिस्ट—इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली 'नयी' कांग्रेस।

7. 1971 का चुनाव: "गरीबी हटाओ" का नारा

विभाजन के बाद इंदिरा गांधी की सरकार अल्पमत में थी। उन्होंने साहसिक कदम उठाते हुए दिसंबर 1970 में लोकसभा भंग कर दी।

ग्रैंड अलायंस बनाम इंदिरा:

विपक्षी दलों ने मिलकर 'ग्रैंड अलायंस' बनाया, जिसका एकमात्र एजेंडा था— "इंदिरा हटाओ"। इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने जनता की नब्ज पकड़ी और नारा दिया— "गरीबी हटाओ"

📈 1971 के चुनावी परिणाम:
नतीजे अभूतपूर्व थे। इंदिरा की कांग्रेस (R) और CPI के गठबंधन को 375 सीटें मिलीं। अकेले इंदिरा की पार्टी ने 352 सीटें जीतीं। विपक्षी 'ग्रैंड अलायंस' 40 सीटों के भीतर सिमट गया और सिंडिकेट वाली पुरानी कांग्रेस को मात्र 16 सीटें मिलीं। इस चुनाव ने साबित कर दिया कि इंदिरा की कांग्रेस ही 'असली कांग्रेस' है।

8. पुनर्स्थापना और उसके बाद की चुनौतियाँ

1971 के तुरंत बाद भारत-पाक युद्ध हुआ और बांग्लादेश का उदय हुआ। इस सैन्य विजय ने इंदिरा गांधी को एक अजेय राष्ट्रवादी नेता बना दिया। 1972 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को प्रचंड जीत मिली।

  • नई कांग्रेस प्रणाली: इसे कांग्रेस की पुनर्स्थापना तो कहा गया, लेकिन यह पुरानी कांग्रेस जैसी नहीं थी। पुरानी कांग्रेस में लोकतांत्रिक चर्चा और विभिन्न मतों के लिए जगह थी। नई कांग्रेस पूरी तरह से 'एक सर्वोच्च नेता' के करिश्मे और भक्ति पर आधारित थी।
  • सत्ता का केंद्रीकरण: पार्टी के भीतर का सांगठनिक ढांचा कमजोर हो गया और पूरी सत्ता प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में केंद्रित हो गई।

9. प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व

नाम विशेष योगदान / परिचय
के. कामराज 'किंगमेकर' के नाम से प्रसिद्ध; मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष।
राममनोहर लोहिया समाजवादी विचारक; 'गैर-कांग्रेसवाद' के रणनीतिकार और पिछड़ा वर्ग आरक्षण के पैरोकार।
सी. अन्नादुरई DMK के संस्थापक; हिंदी विरोधी आंदोलन के नेता और मद्रास के मुख्यमंत्री।
कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री; पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू करने के लिए प्रसिद्ध।
वी.वी. गिरि स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति निर्वाचित; इंदिरा गांधी के करीबी।

निष्कर्ष: एक नए युग का सूत्रपात

1960 के दशक की चुनौतियों और 1971 की पुनर्स्थापना ने भारतीय राजनीति के चरित्र को हमेशा के लिए बदल दिया। जहाँ एक ओर कांग्रेस प्रणाली अधिक शक्तिशाली और केंद्रीकृत हुई, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय आकांक्षाओं और वंचित वर्गों (दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों) को पहली बार सत्ता के मुख्य केंद्र में अपनी पहचान महसूस हुई। इंदिरा गांधी ने यह सिद्ध कर दिया कि संगठन की मशीनरी से अधिक प्रभावी 'जनता की लहर' होती है। हालांकि, पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी ने भविष्य के लिए कई गंभीर संकटों के बीज भी बो दिए।

💡 सारांश: स्वतंत्र भारत का यह कालखंड नेतृत्व के परीक्षण, पार्टी के बिखराव और फिर एक नई राजनीतिक शक्ति के उदय की गाथा है। इंदिरा गांधी का 'गरीबी हटाओ' और शास्त्री का 'जय जवान जय किसान' केवल नारे नहीं थे, बल्कि वे उस समय के भारत की धड़कनें थे।