अध्याय-6. भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ (8वीं से 18वीं सदी)
📅 Date: 24 February 2026 (Tuesday)
आठवीं से अठारहवीं सदी तक का काल भारतीय इतिहास में धार्मिक और सांस्कृतिक बदलावों का दौर था। इस काल में वैदिक देवता (इंद्र, अग्नि, सोम) गौण हो गए और उनकी जगह पौराणिक देवताओं (विष्णु, शिव, देवी) ने ले ली। इस अध्याय में हम भक्ति आंदोलन और सूफ़ीवाद के विकास का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1. धार्मिक विश्वासों का समन्वय
वैदिक और पौराणिक परंपरा
साहित्य और मूर्तिकला में विष्णु और शिव के विभिन्न रूपों की पूजा बढ़ी। देवी की आराधना पद्धति को 'तांत्रिक' कहा गया, जिसमें वर्ण और लिंग का भेद नहीं था।
'महान' और 'लघु' परंपराएँ
समाजशास्त्री रॉबर्ट रेडफील्ड ने भारतीय संस्कृति को समझने के लिए दो अवधारणाएँ दीं:
- महान परंपरा (Great Tradition): समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग (राजा, पुरोहित) द्वारा पालन किए जाने वाले जटिल कर्मकांड।
- लघु परंपरा (Little Tradition): कृषक और सामान्य जन द्वारा पालन किए जाने वाले स्थानीय लोकाचार।
- समन्वय: जगन्नाथ (विष्णु का रूप) की पूजा इसका उदाहरण है, जहाँ स्थानीय जनजातीय देवता को मुख्य धारा के हिंदू धर्म में स्थान मिला।
2. भक्ति परंपरा: दक्षिण भारत (अलवार और नयनार)
भक्ति आंदोलन का आरंभ दक्षिण भारत (तमिलनाडु) में हुआ। इसे दो धाराओं में बाँटा गया:
- सगुण: ईश्वर के मूर्त रूप (मूर्ति) की पूजा।
- निर्गुण: निराकार ईश्वर की उपासना।
अलवार और नयनार संत
- अलवार: विष्णु भक्त (संख्या: 12)। मुख्य ग्रंथ: नलयिरादिव्यप्रबंधम् (इसे 'तमिल वेद' कहा जाता है)।
- नयनार: शिव भक्त (संख्या: 63)। मुख्य ग्रंथ: तवरम।
इन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया और ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत प्रेम पर जोर दिया। इनमें सभी जातियों के लोग (ब्राह्मण से लेकर अस्पृश्य तक) शामिल थे।
1. अंडाल (अलवार): इन्होंने स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर छंद रचे।
2. करइक्काल अम्मइयार (नयनार): इन्होंने शिव की भक्ति के लिए घोर तपस्या की।
इन महिलाओं ने पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती दी और विवाह व गृहस्थ जीवन के बजाय ईश्वर भक्ति को चुना।
राज्य के साथ संबंध
चोल सम्राटों (9वीं-13वीं सदी) ने भक्ति परंपरा को संरक्षण दिया। उन्होंने चिदंबरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम में विशाल शिव मंदिर बनवाए और संतों की कांस्य प्रतिमाएं स्थापित कीं।
3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा (लिंगायत)
12वीं सदी में कर्नाटक में एक नया आंदोलन शुरू हुआ।
- नेत्रत्व: बासवन्ना (1106-68), जो कलचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे।
- अनुयायी: वीरशैव (शिव के वीर) या लिंगायत (लिंग धारण करने वाले)।
- विश्वास: वे शिव की उपासना लिंग रूप में करते हैं। वे 'पुनर्जन्म' में विश्वास नहीं करते और मृतकों को दफनाते हैं (दाह संस्कार नहीं)।
- सुधार: इन्होंने जाति प्रथा, छुआछूत और मूर्ति पूजा का विरोध किया। विधवा विवाह और वयस्क विवाह को मान्यता दी।
4. इस्लामी परंपराएँ और भारत
711 ई. में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध विजय के साथ भारत में इस्लाम का आगमन हुआ।
शरिया और ज़िम्मी
- शरिया: इस्लामी कानून जो कुरान और हदीस (पैगंबर के कथन) पर आधारित है।
- ज़िम्मी (Zimmi): संरक्षित प्रजा (हिंदू, ईसाई, यहूदी) जो मुस्लिम शासन में 'जज़िया' कर देकर अपने धर्म का पालन कर सकते थे।
1. शहादा (एकेश्वरवाद)
2. नमाज़ (दिन में 5 बार)
3. रोज़े (रमज़ान में उपवास)
4. ज़कात (दान)
5. हज (मक्का यात्रा)
5. सूफ़ीवाद (Sufism)
सूफ़ीवाद इस्लाम का रहस्यवादी रूप है जो ईश्वर से प्रेम और वैराग्य पर जोर देता है।
सूफ़ी शब्दावली
- ख़ानक़ाह: सूफ़ी संतों का निवास स्थान।
- शेख/पीर/मुर्शीद: गुरु।
- मुरीद: शिष्य।
- सिलसिला: जंज़ीर (गुरु-शिष्य परंपरा)।
- उर्स: पीर की बरसी (आत्मा का ईश्वर से मिलन)।
- बरकत: संत की आध्यात्मिक शक्ति।
बा-शरिया और बे-शरिया
- बा-शरिया: जो शरिया (इस्लामी कानून) का पालन करते थे (जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी)।
- बे-शरिया: जो शरिया की अवहेलना करते थे और मस्तमौला (कलंदर, मलंग) की तरह रहते थे।
6. चिश्ती सिलसिला (Chishti Silsila)
भारत में सबसे प्रभावशाली सूफ़ी सिलसिला। इसकी स्थापना ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने की।
प्रमुख दरगाहें
- ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर): इन्हें 'गरीब नवाज़' कहा जाता है। अकबर यहाँ 14 बार आया था। जहाँआरा ने इनकी जीवनी 'मुनिस-अल-अखाह' लिखी।
- निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली): इन्हें 'महबूब-ए-इलाही' कहा जाता था। इनके शिष्य अमीर खुसरो थे।
- बाबा फरीद (पंजाब): इनकी रचनाएँ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में शामिल हैं।
भाषा और संगीत
चिश्तियों ने स्थानीय भाषा 'हिंदवी' को अपनाया। ईश्वर प्रेम को मानवीय प्रेम के रूप में व्यक्त करने के लिए लंबी कविताएँ (मसनवी) लिखी गईं (जैसे मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत)। अमीर खुसरो ने 'कौल' (कव्वाली का प्रारंभिक और अंतिम भाग) का प्रचलन किया।
7. उत्तर भारत: कबीर, नानक और मीरा
उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का उदय हुआ।
कबीर (14वीं-15वीं सदी)
- जन्म से हिंदू, पालन-पोषण जुलाहा परिवार में। गुरु: रामानंद।
- दर्शन: एकेश्वरवाद, मूर्तिभंजन। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम दोनों के आडंबरों का खंडन किया।
- काव्य: उनकी रचनाएँ 'उलटबाँसी' कहलाती हैं। बीजक (कबीरपंथी), कबीर ग्रंथावली (दादू पंथी) और आदि ग्रंथ साहिब में उनकी बानी संकलित है।
बाबा गुरु नानक (1469-1539)
- जन्म: ननकाना साहिब (पाकिस्तान)।
- शिक्षा: निर्गुण भक्ति। उन्होंने 'शब्द' (Shabad) के माध्यम से उपदेश दिए।
- संगत और लंगर: सामूहिक उपासना और भोजन की परंपरा शुरू की।
- खालसा पंथ: 10वें गुरु गोबिन्द सिंह ने इसकी नींव डाली और 5 प्रतीक (केश, कंघा, कड़ा, कच्छ, कृपाण) अनिवार्य किए।
मीराबाई (15वीं-16वीं सदी)
- मेवाड़ की राजपूत राजकुमारी।
- भक्ति: सगुण (कृष्ण भक्ति)। उन्होंने कृष्ण को अपना पति माना।
- विद्रोह: उन्होंने राजमहल के ऐश्वर्य को त्याग दिया और एक संत बन गईं। उनके गुरु रैदास (चर्मकार) थे, जो जाति प्रथा के प्रति उनके विद्रोह को दर्शाता है।
शंकरदेव (असम)
इन्होंने 'एक शरण नाम धर्म' (विष्णु के प्रति समर्पण) की स्थापना की। प्रार्थना गृहों को 'नामघर' कहा गया। मुख्य रचना: कीर्तनघोष।