आधुनिक इतिहास : 11. महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन: स्वतंत्रता का संघर्ष

आधुनिक इतिहास: महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन: स्वतंत्रता का संघर्ष
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महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन: एक युगांतकारी संघर्ष

आधुनिक इतिहास : 11. महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन: स्वतंत्रता का संघर्ष

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की उन दुर्लभ घटनाओं में से एक है जहाँ अहिंसा और सत्याग्रह जैसे नैतिक हथियारों ने एक विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य की जड़ें हिला दीं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारतीय जनमानस में जो असंतोष पनपा था, उसे संगठित रूप देने का कार्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने किया। परंतु, महात्मा गाँधी के आगमन ने इस आंदोलन को केवल बुद्धिजीवियों की सभा से निकालकर एक 'जनांदोलन' में बदल दिया। इस लेख में हम गाँधीजी के नेतृत्व में हुए विभिन्न चरणों और भारतीय राजनीति के क्रमिक विकास का विस्तार से अध्ययन करेंगे।


1. कांग्रेस से पूर्व की राजनीतिक चेतना और स्थापना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) से पहले ही भारत के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक संगठन सक्रिय हो चुके थे। इन संगठनों ने क्षेत्रीय स्तर पर भारतीय हितों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाना शुरू कर दिया था।

📌 कांग्रेस पूर्व के प्रमुख संगठन:
  • पूना सार्वजनिक सभा (1870): एम.जी. रानाडे और उनके सहयोगियों द्वारा स्थापित, जिसका उद्देश्य जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करना था।
  • इंडियन एसोसिएशन ऑफ कलकत्ता (1876): सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस द्वारा गठित, जिसने मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को मंच दिया।
  • मद्रास महाजन सभा (1884): एम. वीरराघवाचारी और उनके साथियों द्वारा दक्षिण भारत में राजनीतिक जागरूकता के लिए स्थापित।
  • बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885): फिरोजशाह मेहता, के.टी. तेलंग और बदरुद्दीन तैयबजी द्वारा गठित।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म (1885)

दिसंबर 1885 में एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ए.ओ. ह्यूम के प्रयासों से बॉम्बे में कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता उमेश चंद्र बनर्जी ने की और इसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस का दृष्टिकोण 'उदारवादी' था, जो संवैधानिक तरीकों से सुधारों की मांग करते थे। दादाभाई नौरोजी, जिन्हें 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' कहा जाता है, ने अपनी पुस्तक 'Poverty and Un-British Rule in India' के माध्यम से भारत से धन के निष्कासन (Drain Theory) को उजागर किया।


2. राष्ट्रवाद का उदय: चरमपंथी काल और बंगाल विभाजन

1905 के आते-आते कांग्रेस के भीतर एक नया धड़ा उभरा जो 'प्रार्थना और याचिका' की नीति से असंतुष्ट था। इन्हें 'गरम दल' या चरमपंथी कहा गया।

लाल-बाल-पाल और आक्रामक राष्ट्रवाद

लाला लाजपत राय (पंजाब), बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र) और बिपिन चंद्र पाल (बंगाल) ने स्वदेशी और बहिष्कार का नारा दिया। लोकमान्य तिलक ने घोषणा की— "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।" उन्होंने केसरी और महरत्ता समाचार पत्रों के माध्यम से जनता को जगाया।

🔥 बंगाल विभाजन (1905) और स्वदेशी आंदोलन:
वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को विभाजित करने का निर्णय लिया, जिसका वास्तविक उद्देश्य बढ़ते राष्ट्रवाद को कुचलना और हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था। इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। रवींद्रनाथ टैगोर ने 'आमार सोनार बांग्ला' लिखा और लोगों ने रक्षाबंधन मनाकर एकता का प्रदर्शन किया। यह आंदोलन 1908 तक चला और अंततः 1911 में दिल्ली दरबार में विभाजन को रद्द करना पड़ा।

3. महात्मा गाँधी का उदय और दक्षिण अफ्रीका का अनुभव

मोहनदास करमचंद गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ था। कानून की पढ़ाई के बाद 1893 में वे एक मुकदमे के लिए दक्षिण अफ्रीका गए। यही वह भूमि थी जहाँ गाँधीजी ने रंगभेद का सामना किया और अपने हथियार 'सत्याग्रह' को विकसित किया।

  • दक्षिण अफ्रीका की देन: इतिहासकार चंद्रन देवनेसन के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका ने ही गाँधी को 'महात्मा' बनाया। वहाँ उन्होंने टॉल्स्टॉय फार्म की स्थापना की।
  • भारत वापसी: जनवरी 1915 में गाँधीजी भारत लौटे। उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें सलाह दी कि वे पहले एक साल भारत का भ्रमण करें और यहाँ की स्थिति को समझें।

4. प्रारंभिक सत्याग्रह: चंपारण से खेड़ा तक

1917 से 1918 के बीच गाँधीजी ने तीन महत्वपूर्ण स्थानीय आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिसने उन्हें भारत की आम जनता के बीच स्थापित कर दिया।

  1. चंपारण सत्याग्रह (1917): बिहार में नील की खेती करने वाले किसानों को 'तिनकठिया प्रथा' (भूमि के 3/20 भाग पर नील उगाना) के तहत शोषण का सामना करना पड़ रहा था। गाँधीजी ने अहिंसक विरोध से इस प्रथा को समाप्त कराया।
  2. अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918): मिल मजदूरों के प्लेग बोनस को लेकर विवाद था। गाँधीजी ने यहाँ पहली बार 'भूख हड़ताल' का प्रयोग किया और मजदूरों को 35% वेतन वृद्धि दिलाई।
  3. खेड़ा आंदोलन (1918): फसल खराब होने के बावजूद सरकार लगान वसूल रही थी। गाँधीजी और वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सरकार को लगान माफ करना पड़ा।

5. रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग और असहयोग आंदोलन

प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने दमनकारी 'रॉलेट एक्ट' पारित किया, जिसे गाँधीजी ने 'काला कानून' कहा। इसके विरोध में 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा कर रहे लोगों पर जनरल डायर ने गोलियाँ चलवाईं। इस बर्बरता ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया।

खिलाफत और असहयोग (1920-22)

गाँधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के लिए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया। अगस्त 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ। इसमें सरकारी उपाधियों का त्याग, स्कूलों-कॉलेजों का बहिष्कार और विदेशी कपड़ों की होली जलाना शामिल था।

⚠️ चौरी-चौरा की घटना और आंदोलन की वापसी:
5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में उत्तेजित भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। अहिंसा के पुजारी गाँधीजी इस हिंसा से इतने दुखी हुए कि उन्होंने तुरंत आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर 6 साल की सजा सुनाई गई।

6. गाँधीजी के प्रति जन-धारणा और अफवाहें

गाँधीजी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि ग्रामीण भारत के लिए वे एक मसीहा बन गए थे। इतिहासकार शाहिद अमीन ने विश्लेषण किया है कि कैसे किसानों के बीच उनके बारे में चमत्कारी अफवाहें फैली हुई थीं।

  • लोग मानते थे कि गाँधीजी को ईश्वर ने उनके दुखों को दूर करने के लिए भेजा है।
  • यह अफ़वाह थी कि जो गाँधीजी का विरोध करेगा, उसका घर गिर जाएगा या उसकी फसल नष्ट हो जाएगी।
  • उन्हें 'गाँधी बाबा' या 'महात्मा' जैसे शब्दों से पुकारा जाने लगा। उनके प्रति यह श्रद्धा ही थी जिसने करोड़ों लोगों को सड़कों पर ला खड़ा किया।

7. नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)

1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' का संकल्प लिया गया। गाँधीजी ने आंदोलन शुरू करने के लिए 'नमक' जैसे सरल लेकिन शक्तिशाली प्रतीक को चुना क्योंकि नमक पर कर हर गरीब-अमीर को प्रभावित करता था।

दांडी यात्रा (12 मार्च - 6 अप्रैल 1930)

गाँधीजी ने अपने 78 अनुयायियों के साथ साबरमती से दांडी तक 240 मील की पैदल यात्रा की। 6 अप्रैल को उन्होंने समुद्र तट पर नमक बनाकर कानून तोड़ा।

  • महत्व: इस यात्रा ने गाँधीजी को विश्व प्रसिद्ध बना दिया। अमेरिकी पत्रिका 'टाइम' ने उनकी तुलना इब्राहिम लिंकन से की।
  • महिलाओं की भागीदारी: कमलादेवी चट्टोपाध्याय के आग्रह पर गाँधीजी ने महिलाओं को भी आंदोलन में शामिल होने की अनुमति दी।
  • गाँधी-इर्विन समझौता (1931): आंदोलन की व्यापकता को देख वायसराय इर्विन ने गाँधीजी से समझौता किया और उन्हें दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन आमंत्रित किया।

8. 'भारत छोड़ो' आंदोलन (1942): अंतिम प्रहार

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब क्रिप्स मिशन विफल हो गया, तो गाँधीजी ने 8 अगस्त 1942 को बॉम्बे के ग्वालिया टैंक मैदान से अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ा। उन्होंने नारा दिया— "करो या मरो" (Do or Die)

  • जनांदोलन का स्वरूप: हालांकि सरकार ने गाँधीजी सहित सभी शीर्ष नेताओं को तुरंत जेल भेज दिया, लेकिन आंदोलन जनता ने खुद संभाला।
  • समानांतर सरकारें: सतारा (महाराष्ट्र) और मेदिनीपुर (बंगाल) जैसे स्थानों पर भारतीयों ने अपनी स्वतंत्र सरकारें स्थापित कर लीं।
  • ब्रिटिश स्वीकारोक्ति: इस आंदोलन ने अंग्रेजों को स्पष्ट कर दिया कि अब वे भारतीयों की सहमति के बिना यहाँ राज नहीं कर सकते।

9. स्वतंत्रता, विभाजन और गाँधीजी की शहादत

1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी जो भारत की स्वतंत्रता की पक्षधर थी। लेकिन मुस्लिम लीग द्वारा अलग 'पाकिस्तान' की मांग और बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा ने स्वतंत्रता के जश्न को फीका कर दिया।

📅 अंतिम घटनाक्रम:
  • कैबिनेट मिशन (1946): संघ बनाने में विफल रहा, जिसके बाद जिन्ना ने 'प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस' (Direct Action Day) का आह्वान किया।
  • 15 अगस्त 1947: भारत स्वतंत्र हुआ। गाँधीजी दिल्ली के उत्सव में शामिल नहीं थे, वे कलकत्ता में दंगों को शांत कराने के लिए उपवास कर रहे थे।
  • 30 जनवरी 1948: नाथूराम गोडसे ने बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के दौरान गाँधीजी की हत्या कर दी। जवाहरलाल नेहरू ने आकाशवाणी पर कहा— "हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है।"

10. इतिहास के स्रोत: हम गाँधी को कैसे जानते हैं?

राष्ट्रीय आंदोलन और गाँधीजी के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे पास प्रचुर मात्रा में ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध हैं:

  1. भाषण और लेख: गाँधीजी द्वारा संपादित 'हरिजन' और 'यंग इंडिया' जैसे समाचार पत्र।
  2. आत्मकथा: उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' (My Experiments with Truth)।
  3. पत्राचार: जवाहरलाल नेहरू द्वारा संकलित 'A Bunch of Old Letters'। गाँधीजी को मिलने वाला हर पत्र वे सहेज कर रखते थे।
  4. सरकारी रिकॉर्ड: पुलिस की खुफिया रिपोर्ट और डायरियाँ, जो उस समय के विद्रोहों का विवरण देती हैं।
💡 निष्कर्ष: महात्मा गाँधी ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई नैतिक और सामाजिक गहराई प्रदान की। उन्होंने संघर्ष को केवल राजनीतिक आज़ादी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि छुआछूत निवारण, खादी के माध्यम से आत्मनिर्भरता और ग्राम स्वराज को भी आंदोलन का हिस्सा बनाया। वे आज भी दुनिया भर के लिए अहिंसा और शांति के सबसे बड़े प्रतीक बने हुए हैं।