आधुनिक इतिहास : 12. संविधान का निर्माण - एक नए युग की शुरुआत

आधुनिक इतिहास : संविधान का निर्माण - एक नए युग की शुरुआत
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संविधान का निर्माण: एक नए युग की शुरुआत

आधुनिक इतिहास : 12. संविधान का निर्माण - एक नए युग की शुरुआत

भारतीय संविधान का निर्माण केवल एक कानून की किताब तैयार करना नहीं था, बल्कि यह एक सदियों से गुलाम रहे राष्ट्र की आत्मा को स्वतंत्र पहचान देने की प्रक्रिया थी। 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद तो हुआ, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—विविधता, गरीबी और विभाजन की त्रासदी से जूझते देश को एक ऐसे ढांचे में पिरोना, जहाँ हर नागरिक को न्याय, समानता और स्वतंत्रता मिल सके। यह लेख संविधान निर्माण की उसी जटिल और गौरवमयी यात्रा का विस्तृत विश्लेषण करता है।


1. संविधान और संविधान सभा: अर्थ और आवश्यकता

संविधान किसी भी राष्ट्र की 'बुनियादी कानून-व्यवस्था' (Fundamental Law of the Land) होता है। यह वह धुरी है जिसके चारों ओर राज्य की कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका घूमती हैं।

संविधान के मूलभूत कार्य:

  • शक्तियों का सीमांकन: यह सुनिश्चित करना कि सरकार अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न करे।
  • अधिकारों का संरक्षण: नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करना।
  • सामाजिक आकांक्षाओं की पूर्ति: भारत जैसे देश में गरीबी और जातिवाद जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए दिशा-निर्देश तय करना।
💡 संविधान सभा की मांग का विकासक्रम:
1934 में वामपंथी नेता एम.एन. रॉय ने पहली बार औपचारिक रूप से संविधान सभा का विचार रखा। इसके बाद 1935 में कांग्रेस ने इसे अपना आधिकारिक लक्ष्य बनाया। द्वितीय विश्व युद्ध के दबाव और बढ़ते आंदोलनों के बीच, ब्रिटिश सरकार ने 1946 के 'कैबिनेट मिशन' के माध्यम से इसे वास्तविकता में बदला।

2. संविधान सभा का गठन और राजनीतिक संघर्ष

संविधान सभा का गठन 'कैबिनेट मिशन योजना' (1946) के तहत हुआ था। हालांकि यह वयस्क मताधिकार पर आधारित नहीं थी (सदस्यों को प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा चुना गया था), लेकिन इसमें समाज के हर तबके का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया।

सदस्यता और संरचना:

  • कुल सदस्य: प्रारंभ में 389 सदस्य थे, लेकिन विभाजन के बाद यह संख्या 299 रह गई।
  • प्रशासनिक सहयोग: बी.एन. राव (संवैधानिक सलाहकार) ने दुनिया भर के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया। मुख्य योजनाकार एस.एन. मुखर्जी ने जटिल कानूनी विषयों को स्पष्ट परिभाषाएं दीं।
  • राजनीतिक प्रभाव: संविधान सभा की बैठकें ऐसे समय में हो रही थीं जब देश में सांप्रदायिक दंगे चरम पर थे, रियासतें अपने भविष्य को लेकर सशंकित थीं और 1946 का 'नौसेना विद्रोह' ब्रिटिश सत्ता की चूलें हिला चुका था।
🏛️ प्रमुख समितियाँ और नेतृत्व:
  • प्रारूप समिति (Drafting Committee): डॉ. बी.आर. अंबेडकर (अध्यक्ष) - इन्होंने ही संविधान का कच्चा मसौदा तैयार किया।
  • संघ शक्ति समिति: जवाहरलाल नेहरू - केंद्र को मजबूती देने के पक्षधर।
  • प्रांतीय संविधान समिति: सरदार वल्लभभाई पटेल - राज्यों और रियासतों के समन्वय के प्रमुख।
  • अध्यक्ष: डॉ. राजेंद्र प्रसाद - सभा की कार्यवाहियों का सुचारू संचालन।

3. उद्देश्य प्रस्ताव (Objective Resolution): भविष्य की रूपरेखा

13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक 'उद्देश्य प्रस्ताव' पेश किया। यह प्रस्ताव केवल शब्दों का समूह नहीं था, बल्कि इसमें स्वतंत्र भारत की नई पहचान की कसम थी।

नेहरू ने अपने संबोधन में कहा कि हम केवल पश्चिम के लोकतंत्र की नकल नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम एक ऐसा भारतीय लोकतंत्र बना रहे हैं जो हमारी मिट्टी की जरूरतों के अनुकूल हो। उन्होंने 'टेनिस कोर्ट की शपथ' (फ्रांसीसी क्रांति) का उदाहरण देते हुए सभा में जुनून भरा।

प्रस्ताव के प्रमुख सिद्धांत:

  • लोकतांत्रिक गणराज्य: भारत एक ऐसा देश होगा जहाँ शासन जनता द्वारा चुना जाएगा।
  • न्याय और समानता: केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय भी।
  • अल्पसंख्यक सुरक्षा: यह सुनिश्चित करना कि बहुसंख्यक शासन में अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित रहें।

4. अधिकारों की बहस: अल्पसंख्यक और शोषित वर्ग

संविधान सभा में 'अल्पसंख्यक' शब्द की परिभाषा पर लंबी बहस चली। जहाँ कुछ लोग इसे केवल धार्मिक आधार पर देख रहे थे, वहीं अन्य ने इसे सामाजिक पिछड़ेपन से जोड़ा।

एन.जी. रंगा का क्रांतिकारी विचार:

किसान नेता एन.जी. रंगा ने तर्क दिया कि असली अल्पसंख्यक वे गरीब किसान और खेतिहर मजदूर हैं जिन्हें कुचला गया है। उन्होंने कहा कि "जब तक आम आदमी को रोटी और सम्मान नहीं मिलता, आज़ादी अधूरी है।"

जयपाल सिंह और आदिवासियों का पक्ष:

आदिवासी नेता जयपाल सिंह ने स्पष्ट किया कि आदिवासी अल्पसंख्यक नहीं हैं, लेकिन वे समाज से कटे हुए हैं। उन्हें 'सिविलाइज' (सभ्य) करने के नाम पर उनकी जमीनों पर बाहरी लोगों ने कब्जा किया। उन्होंने पृथक निर्वाचिका के बजाय 'विधायी आरक्षण' की मांग की ताकि आदिवासी अपनी आवाज़ खुद उठा सकें।

"हम आपके साथ घुलना-मिलना चाहते हैं, लेकिन अपनी पहचान के साथ।" — जयपाल सिंह

5. पृथक निर्वाचिका बनाम एकीकृत राष्ट्र: सबसे बड़ा विवाद

ब्रिटिश काल से चली आ रही 'पृथक निर्वाचिका' (Separate Electorate) की मांग संविधान सभा के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी।

बी. पोकर बहादुर का पक्ष:

उन्होंने दलील दी कि अल्पसंख्यकों को अपनी रक्षा के लिए अपने प्रतिनिधियों को खुद चुनने का हक होना चाहिए। उनके अनुसार, संयुक्त निर्वाचिका में अल्पसंख्यकों की आवाज़ कभी नहीं सुनी जाएगी।

राष्ट्रवादियों का प्रहार (पटेल और पंत):

सरदार पटेल ने इसे देश की एकता के लिए 'ज़हर' बताया। उन्होंने कहा कि इसी व्यवस्था ने पाकिस्तान के निर्माण की नींव रखी थी।

"अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत का बीज बो गए।" — सरदार पटेल

गोविंद वल्लभ पंत ने तर्क दिया कि पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों को एक 'अलग टापू' बना देगी, जिससे वे कभी भी राष्ट्र की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाएंगे। अंततः, सभा ने इसे अस्वीकार कर दिया और 'आरक्षण' की व्यवस्था को अपनाया।


6. केंद्र बनाम राज्य: शक्तियों का संतुलन

भारत जैसे विशाल देश में शक्तियों का बंटवारा हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। संविधान सभा में दो मुख्य विचारधाराएं थीं:

मजबूत केंद्र के पक्षधर:

विभाजन की हिंसा को देखते हुए नेहरू और अंबेडकर का मानना था कि एक कमजोर केंद्र देश को अराजकता की ओर ले जाएगा। उन्हें एक ऐसा केंद्र चाहिए था जो अकाल, दंगे और बाहरी आक्रमणों से लड़ने में सक्षम हो। अंबेडकर ने "1935 के एक्ट से भी अधिक शक्तिशाली केंद्र" की वकालत की।

राज्यों की स्वायत्तता की मांग (के. सन्तनम):

मद्रास के सदस्य के. सन्तनम ने चेतावनी दी कि यदि राज्यों के पास आर्थिक संसाधन नहीं होंगे, तो वे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाएं नहीं दे पाएंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र को केवल विदेशी मामले और रक्षा देखनी चाहिए, बाकी अधिकार राज्यों को मिलने चाहिए।

"राज्यों को कमजोर करने से केंद्र भी बिखर जाएगा।" — के. सन्तनम

7. राष्ट्रभाषा का प्रश्न: भावनाओं का टकराव

भारत की विविधता को देखते हुए 'भाषा' का मुद्दा सबसे अधिक भावनात्मक रहा। गाँधीजी 'हिंदुस्तानी' (हिंदी + उर्दू) को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे क्योंकि वह आम जनता की भाषा थी।

आर.वी. धुलेकर का रुख:

हिंदी के कट्टर समर्थक धुलेकर ने कड़ा रवैया अपनाया। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि जो हिंदी नहीं जानते, उन्हें इस सभा में रहने का अधिकार नहीं है। उनके इस रवैये ने दक्षिण भारतीय सदस्यों में गहरा असंतोष पैदा किया।

श्रीमती जी. दुर्गाबाई और दक्षिण की चिंता:

दुर्गाबाई ने कहा कि दक्षिण में हिंदी के प्रति सम्मान है, लेकिन 'थोपे जाने' का विरोध है। उन्होंने भाषाई सहिष्णुता की मांग की।

✅ भाषा का ऐतिहासिक समाधान:
संविधान सभा ने एक 'मध्यम मार्ग' चुना। हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' नहीं बल्कि 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा दिया गया। देवनागरी लिपि अपनाई गई, लेकिन गैर-हिंदी भाषी राज्यों की सुविधा के लिए अंग्रेजी का प्रयोग 15 वर्षों तक जारी रखने का निर्णय लिया गया।

8. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और धर्मनिरपेक्षता

भारतीय संविधान की सबसे बड़ी साहसी जीत 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' थी।

  • मताधिकार: भारत ने पहले दिन से ही हर वयस्क (लिंग, जाति, शिक्षा के भेदभाव के बिना) को मतदान का अधिकार दिया। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी यह अधिकार अपने यहाँ बहुत देर से और लंबे संघर्षों के बाद दिया था।
  • धर्मनिरपेक्षता: भारत को किसी एक धर्म का राज्य नहीं बनाया गया। यहाँ राज्य का कोई धर्म नहीं है, लेकिन राज्य हर धर्म का सम्मान करता है। अनुच्छेद 25-30 में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार दिए गए।

9. महत्वपूर्ण काल-रेखा और उपलब्धियाँ

📅 संविधान निर्माण के पड़ाव:
  • 22 जुलाई 1947: तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया।
  • 29 अगस्त 1947: प्रारूप समिति का गठन (अंबेडकर अध्यक्ष)।
  • 26 नवंबर 1949: संविधान बनकर तैयार हुआ और अंगीकार (Adopt) किया गया (इसीलिए इसे 'संविधान दिवस' कहते हैं)।
  • 24 जनवरी 1950: संविधान पर सदस्यों के अंतिम हस्ताक्षर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने।
  • 26 जनवरी 1950: भारतीय संविधान पूर्णतः लागू हुआ और भारत एक 'गणतंत्र' बना।

निष्कर्ष: एक जीवंत दस्तावेज़ (A Living Document)

भारतीय संविधान केवल अतीत की स्मृतियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का समाधान भी है। इसकी महानता इस बात में है कि इसने 500 से अधिक रियासतों को एक देश बनाया, अस्पृश्यता जैसी सदियों पुरानी बुराई को कानूनन अपराध घोषित किया और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव रखी। आज भी जब भारत किसी संकट में होता है, तो संविधान की प्रस्तावना ही उसे मार्ग दिखाती है।

💡 संदेश: संविधान सभा के सदस्यों ने अपने व्यक्तिगत मतभेदों को राष्ट्रहित के लिए त्याग दिया। उनका यह समर्पण ही हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। संविधान केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि जीने की वस्तु है।