उपनिवेशवाद और देहात (Colonialism and the Countryside)
📅 विस्तृत अध्ययन नोट्स | कक्षा 12 इतिहास
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का भारतीय देहात (ग्रामीण क्षेत्रों) पर गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ा। यह प्रभाव केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि इसने भारत की सामाजिक संरचना, भूमि स्वामित्व के पारंपरिक अधिकारों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता को पूरी तरह बदल दिया। इस लेख में हम बंगाल के जमींदारों, राजमहल की पहाड़ियों के निवासियों और दक्कन के किसानों के अनुभवों के माध्यम से औपनिवेशिक नीतियों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
1. बंगाल में औपनिवेशिक शासन और इस्तमरारी बंदोबस्त
ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने शासन की शुरुआत बंगाल से की थी। यहाँ उन्होंने सबसे पहले ग्रामीण समाज को पुनर्गठित करने और एक ऐसी राजस्व प्रणाली स्थापित करने का प्रयास किया, जो कंपनी को नियमित आय सुनिश्चित कर सके।
इस्तमरारी बंदोबस्त (Permanent Settlement) - 1793
लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू की गई यह प्रणाली कंपनी के लिए एक रणनीतिक कदम थी। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
- राजस्व का निर्धारण: राजस्व की राशि को स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया। कंपनी ने भविष्य में इसमें कोई वृद्धि न करने का वादा किया।
- जमींदार की भूमिका: स्थानीय शक्तिशाली व्यक्तियों, जिन्हें अक्सर 'राजा' कहा जाता था, को जमींदार के रूप में मान्यता दी गई। वे अब भूमि के मालिक नहीं, बल्कि कंपनी के लिए राजस्व एकत्र करने वाले 'संग्राहक' (Collector) बन गए।
- निवेश की उम्मीद: ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि राजस्व निश्चित होने से जमींदार खेती में निवेश करेंगे क्योंकि बढ़ा हुआ लाभ उन्हीं के पास रहेगा। इससे कृषि में सुधार होगा और समाज में एक वफादार 'धनी भूस्वामी' वर्ग पैदा होगा।
यह कानून इस्तमरारी बंदोबस्त का सबसे कठोर हिस्सा था। इसके अनुसार, यदि किसी निश्चित तारीख को सूर्य अस्त होने तक जमींदार ने राजस्व का भुगतान नहीं किया, तो उसकी पूरी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी। 1770 के दशक के अकाल और ऊँची राजस्व मांगों के कारण शुरुआती वर्षों में 75% से अधिक जमींदारियाँ नीलाम हो गई थीं।
राजस्व भुगतान में विफलता के कारण
जमींदार समय पर राजस्व क्यों नहीं चुका पाते थे? इसके पीछे कई कारण थे:
- प्रारंभिक मांगें बहुत ऊँची थीं: कंपनी को लगा कि भविष्य में कीमतों में वृद्धि होगी, लेकिन वे राजस्व बढ़ा नहीं पाएंगे, इसलिए उन्होंने शुरू में ही मांग को अधिकतम रखा।
- कृषि मंदी: 1790 के दशक में फसलों की कीमतें बहुत कम थीं, जिससे रैयत (किसान) जमींदार को लगान नहीं दे पाते थे।
- राजस्व का असमान स्वरूप: फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व की राशि और तारीख निश्चित थी।
- जमींदारों की सीमित शक्तियाँ: कंपनी ने जमींदारों की सैन्य टुकड़ियाँ भंग कर दी थीं और उनके कचहरी तथा स्थानीय न्याय के अधिकार छीन लिए थे। अब वे राजस्व वसूली के लिए किसानों पर पहले जैसा दबाव नहीं बना सकते थे।
2. जोतदारों का उदय: ग्रामीण सत्ता का नया केंद्र
जबकि जमींदार अपनी जमींदारी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, ग्रामीण बंगाल में धनी किसानों का एक नया वर्ग उभर रहा था, जिसे 'जोतदार' कहा जाता था।
जोतदारों की शक्ति के आधार:
- स्थानीय नियंत्रण: जमींदार शहर में रहते थे, जबकि जोतदार सीधे गाँव में रहते थे। उनका ग्रामीणों पर सीधा प्रभाव था।
- आर्थिक प्रभुत्व: वे न केवल खेती करते थे, बल्कि व्यापार और साहूकारी (Money-lending) के कारोबार पर भी उनका नियंत्रण था।
- बटाईदारी प्रथा: उनकी जमीन 'आधियार' या 'बटाईदारों' द्वारा जोती जाती थी, जो फसल का आधा हिस्सा जोतदारों को देते थे।
- जमींदार का विरोध: जोतदार अक्सर चाहते थे कि जमींदार संकट में फँसे। वे किसानों को राजस्व देने से रोकते थे और जब जमींदार की जमीन नीलाम होती थी, तो जोतदार ही उसे खरीद लेते थे।
नीलामी से बचने के लिए जमींदारों ने कई चालाकियां अपनाईं। वे अपनी जमींदारी का हिस्सा अपनी माता या पत्नी के नाम कर देते थे क्योंकि महिलाओं की संपत्ति को सरकार जब्त नहीं करती थी। इसके अलावा, नीलामी में जमींदार के ही एजेंट ऊंची बोली लगाकर जमीन खरीदते थे और बाद में पैसा देने से मना कर देते थे। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती थी जब तक कि सरकार थककर जमीन वापस पुराने जमींदार को ही कम दाम पर न दे दे।
3. पाँचवीं रिपोर्ट (The Fifth Report)
1813 में ब्रिटिश संसद में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई, जिसे 'पाँचवीं रिपोर्ट' कहा जाता है। यह भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन के कार्यों की समीक्षा थी।
- पृष्ठ संख्या: यह 1,002 पृष्ठों की एक विशाल रिपोर्ट थी।
- विषय वस्तु: इसमें जमींदारों और रैयतों की अर्जियाँ, जिला कलेक्टरों की रिपोर्टें और राजस्व के आंकड़े शामिल थे।
- उद्देश्य: ब्रिटेन में कई समूह ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार का विरोध कर रहे थे। वे इस रिपोर्ट के जरिए कंपनी के कुशासन को उजागर करना चाहते थे ताकि भारत के साथ व्यापार का रास्ता अन्य ब्रिटिश व्यापारियों के लिए भी खुल सके।
4. पहाड़िया और संथाल: कुदाल बनाम हल
यह भाग राजमहल की पहाड़ियों के निवासियों के जीवन और उनके बीच हुए संघर्ष का वर्णन करता है।
पहाड़िया लोग: जंगल के संरक्षक
पहाड़िया समुदाय राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहता था। उनका जीवन पूरी तरह जंगल पर आधारित था:
- झूम खेती: वे जंगल के छोटे हिस्से को जलाकर वहां राख की खाद से खेती करते थे। वे मुख्य रूप से कुदाल (Hoe) का प्रयोग करते थे।
- वनोपज: वे खाने के लिए महुआ के फूल, रेशम के कोये और काठकोयला इकट्ठा करते थे।
- प्रतिरोध: वे बाहरी लोगों के प्रवेश को पसंद नहीं करते थे। मैदानी इलाकों के जमींदारों को शांति बनाए रखने के लिए पहाड़िया मुखियाओं को नियमित 'खिराज' देना पड़ता था।
संथालों का आगमन: नए बाशिंदे
1830 के दशक में अंग्रेजों ने संथालों को राजमहल की तलहटी में बसने के लिए आमंत्रित किया। अंग्रेजों को पहाड़िया लोग असभ्य और जिद्दी लगे, जबकि संथाल उन्हें आदर्श किसान दिखाई दिए।
- दामिन-इ-कोह: 1832 में अंग्रेजों ने संथालों के लिए एक बड़ा इलाका सीमांकित किया और इसे 'दामिन-इ-कोह' का नाम दिया। शर्त यह थी कि संथालों को इस जमीन के एक-तिहाई हिस्से को 10 वर्षों के भीतर साफ करके खेती करनी होगी।
- हल का प्रतीक: संथाल स्थायी कृषि करते थे और 'हल' का प्रयोग करते थे। जैसे-जैसे संथालों की बस्तियां बढ़ीं, पहाड़ियों को ऊंचे और पथरीले इलाकों में पीछे हटना पड़ा, जिससे उनका जीवन संकट में पड़ गया।
5. दक्कन के देहात और रैयतवाड़ी प्रणाली
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में औपनिवेशिक शासन का विस्तार दक्षिण और पश्चिम भारत की ओर हुआ। यहाँ 'इस्तमरारी बंदोबस्त' के बजाय 'रैयतवाड़ी' प्रणाली अपनाई गई।
रिकार्डो का सिद्धांत और भू-राजस्व
ब्रिटिश अधिकारी डेविड रिकार्डो के आर्थिक विचारों से प्रभावित थे। रिकार्डो का मानना था कि जमींदार केवल 'किरायाजीवी' (Rentiers) होते हैं जो बिना किसी मेहनत के लाभ कमाते हैं। इसलिए, सरकार को सीधे किसान (रैयत) से संपर्क करना चाहिए और 'अधिशेष आय' को कर के रूप में लेना चाहिए।
- रैयतवाड़ी व्यवस्था: इसमें राजस्व सीधे किसान के साथ तय किया गया।
- पुनरीक्षण: राजस्व स्थायी नहीं था, बल्कि हर 30 साल बाद इसका फिर से सर्वेक्षण किया जाता था।
कपास का उछाल और गिरावट (अमेरिकी गृहयुद्ध का प्रभाव)
1860 के दशक में अमेरिका में गृहयुद्ध शुरू हो गया, जिससे ब्रिटेन को होने वाली कपास की आपूर्ति बंद हो गई। ब्रिटेन के लंकाशायर की मिलों को चलाने के लिए भारत को कपास का मुख्य स्रोत बनाया गया।
- अग्रिम राशि: साहूकारों ने किसानों को कपास उगाने के लिए खूब कर्ज दिया। देहात में पैसा पानी की तरह बहा।
- गिरावट (1865): जैसे ही अमेरिका में युद्ध समाप्त हुआ, भारतीय कपास की मांग गिर गई। कीमतें आधी रह गईं, लेकिन औपनिवेशिक सरकार ने राजस्व की दरें बढ़ा दीं।
6. 1875 का दक्कन दंगा
जब कपास का व्यापार चौपट हो गया, तो किसान कर्ज चुकाने में असमर्थ हो गए। साहूकारों ने अब कर्ज देने से मना कर दिया और किसानों की जमीन व पशुधन पर कब्जा करना शुरू कर दिया।
दंगों का स्वरूप:
- विद्रोह की शुरुआत पूना के सूपा गाँव से हुई।
- किसानों का मुख्य उद्देश्य साहूकारों के बही-खाते (Account books) और ऋण-बंधों को जलाना था।
- यह विद्रोह अहमदनगर और अन्य जिलों में फैल गया। किसानों ने साहूकारों का सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) भी किया।
सरकार ने एक कानून बनाया था कि साहूकार और किसान के बीच कर्ज का समझौता केवल 3 साल के लिए मान्य होगा। इसका उद्देश्य ब्याज को बढ़ने से रोकना था। लेकिन साहूकारों ने इसे ही हथियार बना लिया। वे हर तीसरे साल किसान से नए समझौते पर हस्ताक्षर कराते, जिसमें पुराना ब्याज भी मूलधन (Principal Amount) में जोड़ दिया जाता था। इस तरह किसान कभी कर्ज से मुक्त नहीं हो पाता था।
7. दक्कन दंगा आयोग और सरकारी दृष्टिकोण
विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने इसकी जांच के लिए एक आयोग गठित किया। आयोग की रिपोर्ट (1878) ब्रिटिश संसद में पेश की गई।
- आयोग का तर्क: आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि दंगों का कारण 'सरकारी राजस्व की ऊँची दर' नहीं थी, बल्कि साहूकारों का लालच और शोषण था।
- पूर्वाग्रह: यह रिपोर्ट एक सरकारी दस्तावेज है, इसलिए यह सरकार की गलतियों को छुपाने का प्रयास करती है। औपनिवेशिक सरकार यह मानने को तैयार नहीं थी कि उसकी कर नीतियों ने किसानों को विद्रोह के लिए मजबूर किया था।
निष्कर्ष
उपनिवेशवाद ने भारतीय देहात को वैश्विक बाजार से जोड़ तो दिया, लेकिन इसकी कीमत भारतीय किसानों को अपनी स्वायत्तता और संपत्ति खोकर चुकानी पड़ी। बंगाल के जमींदारों से लेकर दक्कन के रैयतों तक, सभी ने औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ अपने-अपने तरीके से संघर्ष किया। जहाँ जमींदारों ने कानूनी दांव-पेंच अपनाए, वहीं पहाड़िया, संथाल और दक्कन के किसानों ने हथियारों और विद्रोह का सहारा लिया। यह इतिहास हमें बताता है कि कैसे आधुनिक प्रशासनिक और कानूनी प्रणालियों का उपयोग अक्सर गरीब किसानों के शोषण के लिए किया गया।
