अध्याय-4: विचारक, विश्वास और इमारतें (सांस्कृतिक विकास)
📅 Date: 24 February 2026 (Tuesday)
ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण 'मोड़' (Turning Point) माना जाता है। इस काल में ईरान में जरथुस्त्र, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और भारत में महावीर और बुद्ध जैसे चिंतकों का उद्भव हुआ। इन्होंने जीवन के रहस्यों, मृत्यु और पुनर्जन्म को समझने की कोशिश की।
1. यज्ञों की परंपरा और नए दार्शनिक प्रश्न
पूर्व वैदिक परंपरा (1500-1000 ई.पू.)
प्रारंभिक जानकारी ऋग्वेद से मिलती है। इसमें अग्नि, इंद्र, और सोम जैसे देवताओं की स्तुति के मंत्र हैं।
- उद्देश्य: लोग मवेशी, बेटे, अच्छा स्वास्थ्य और लंबी आयु पाने के लिए यज्ञ करते थे।
- प्रक्रिया: शुरू में यज्ञ सामूहिक होते थे, बाद में घर के मालिकों द्वारा किए जाने लगे।
उत्तर वैदिक काल और जटिल यज्ञ (1000-600 ई.पू.)
समय के साथ यज्ञ जटिल होते गए। सरदार और राजा 'राजसूय' और 'अश्वमेध' जैसे यज्ञ करते थे, जिनके लिए ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भरता बढ़ गई।
उपनिषद और नए प्रश्न (छठी सदी ई.पू.)
चिंतकों ने यज्ञों के महत्व पर सवाल उठाए और नए प्रश्न पूछे:
- क्या मृत्यु के बाद जीवन है?
- क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता है?
- सत्य एक है या अनेक? (आत्मा और परमात्मा/ब्रह्म का संबंध)।
बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों का उल्लेख है। शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूमकर अपने दर्शन का प्रचार करते थे। जहाँ ये दार्शनिक वाद-विवाद होते थे, उन नुकीली छत वाली झोपड़ियों को 'कुटागारशाला' कहा जाता था। यदि एक शिक्षक दूसरे को तर्क से हरा देता था, तो वह अपने शिष्यों सहित उसमें शामिल हो जाता था।
2. लौकिक सुखों से आगे: नियतिवादी और भौतिकवादी
वेदों की सत्ता को चुनौती देने वाले दो प्रमुख मत थे:
- नियतिवादी (आजीवक संप्रदाय): इसके संस्थापक मक्खलि गोसाल थे। इनका मानना था कि "सब कुछ भाग्य द्वारा पूर्व निर्धारित है," मनुष्य इसे बदल नहीं सकता।
- भौतिकवादी (लोकायत परंपरा): इसके प्रणेता अजित केसकम्बलि थे। इनका मानना था कि मनुष्य चार तत्वों (मिट्टी, जल, अग्नि, वायु) से बना है। मृत्यु के बाद सब नष्ट हो जाता है, कोई 'आत्मा' या पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिए, दान या यज्ञ व्यर्थ हैं।
3. जैन धर्म: त्याग और अहिंसा
जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक (तीर्थंकर) हो चुके थे। वर्धमान महावीर 24वें तीर्थंकर थे।
जैन दर्शन के मूल सिद्धांत
- संपूर्ण विश्व प्राणवान है: केवल मनुष्यों में नहीं, बल्कि पत्थर, जल और वायु में भी जीवन है।
- अहिंसा (Non-violence): किसी भी जीव को चोट न पहुँचाना जैन धर्म का केंद्र बिंदु है।
- कर्म चक्र: जन्म और पुनर्जन्म का चक्र 'कर्म' द्वारा निर्धारित होता है।
- तपस्या और त्याग: कर्म के चक्र से मुक्ति पाने के लिए संसार का त्याग (संन्यास) आवश्यक है।
1. हत्या न करना (अहिंसा)
2. चोरी न करना (अस्तेय)
3. झूठ न बोलना (सत्य)
4. ब्रह्मचर्य का पालन
5. धन संग्रह न करना (अपरिग्रह)
4. बुद्ध और ज्ञान की खोज (Buddhism)
सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) शाक्य कबीले के राजकुमार थे। उन्होंने जीवन के कटु सत्य को समझने के लिए महल का त्याग किया।
चार दृश्य जिसने जीवन बदल दिया:
महल से बाहर उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति, एक लाश और एक शांत संन्यासी को देखा। उन्हें लगा कि मानव शरीर का क्षय निश्चित है और मुक्ति का मार्ग संन्यास में है।
बुद्ध की शिक्षाएँ (धम्म)
बुद्ध ने त्रिपिटक (तीन टोकरियां) के माध्यम से शिक्षा दी:
- विनयपिटक: संघ (भिक्षुओं) के लिए नियम।
- सुत्तपिटक: बुद्ध के उपदेश और शिक्षाएँ।
- अभिधम्मपिटक: दार्शनिक सिद्धांत।
बौद्ध दर्शन के मुख्य तत्व:
- अनित्य (Impermanence): विश्व क्षणभंगुर है और लगातार बदल रहा है।
- अनात्म (Anatta): कोई स्थाई आत्मा नहीं है।
- दुख: संसार दुखों का घर है।
- मध्यम मार्ग: घोर तपस्या और घोर भोग-विलास के बीच का रास्ता अपनाकर 'निर्वाण' (इच्छाओं का अंत) पाया जा सकता है।
5. बौद्ध संघ और समाज
बुद्ध ने 'संघ' की स्थापना की, जो भिक्षुओं का संगठन था। वे सादा जीवन जीते थे और केवल जीवन रक्षा के लिए भोजन मांगते थे, इसलिए उन्हें 'भिक्खु' कहा गया।
- समानता: संघ में राजा से लेकर दास तक सभी समान थे। भिक्खु बनने पर पुरानी पहचान त्यागनी पड़ती थी।
- महिलाओं का प्रवेश: शुरू में केवल पुरुष थे। प्रिय शिष्य आनंद के आग्रह पर बुद्ध ने महिलाओं को अनुमति दी। महाप्रजापति गोतमी (बुद्ध की उपमाता) पहली भिक्खुनी बनीं।
- थेरीगाथा: यह सुत्तपिटक का हिस्सा है, जिसमें भिक्खुनियों (थेरी - जिन्होंने निर्वाण पा लिया) द्वारा रचित कविताएँ हैं। यह महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों को दर्शाता है।
6. स्तूप: संरचना और महत्व
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों (अस्थियां) को कई हिस्सों में बांटा गया। असोक ने (अशोकावदान ग्रंथ के अनुसार) इन अवशेषों को 84,000 भागों में बांटकर उन पर स्तूप (टीले) बनवाए।
स्तूप की संरचना (Structure of Stupa)
- अंड (Anda): एक अर्द्धगोलाकार मिट्टी का टीला।
- हर्मिका (Harmika): अंड के ऊपर एक चौकोर छज्जे जैसा ढाँचा, जो 'देवताओं का घर' माना जाता था।
- यष्टि (Yashti): हर्मिका से निकलने वाला मस्तूल।
- छत्री: यष्टि के ऊपर लगी छतरी (सम्मान का प्रतीक)।
- प्रदक्षिणा पथ: टीले के चारों ओर परिक्रमा का रास्ता।
- तोरण (Toranas): चारों दिशाओं में बने अलंकृत प्रवेश द्वार।
7. साँची और अमरावती की नियति (A Tale of Two Stupas)
यह इतिहास का एक रोचक पहलू है कि साँची बच गया, लेकिन अमरावती (आंध्र प्रदेश) नष्ट हो गया।
अमरावती का विनाश क्यों हुआ?
- 1854 में गुंटूर के कमिश्नर ने अमरावती की मूर्तियाँ और पत्थर मद्रास भेज दिए।
- ब्रिटिश अधिकारी अपने बागानों की सजावट के लिए यहाँ से मूर्तियां ले गए।
- पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल (H.H. Cole) ने लिखा: "मूल कृतियों को लूटकर संग्रहालयों में भरना आत्मघाती और अपूरणीय नीति है।" उन्होंने प्रतिकृतियां (Plaster Casts) ले जाने का सुझाव दिया, लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई।
साँची कैसे बच गया?
- साँची (मध्य प्रदेश) की खोज 1818 में हुई।
- भोपाल की बेगमों (शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम) ने इसके संरक्षण के लिए धन दिया।
- जब फ्रांसीसियों और अंग्रेजों ने इसके तोरणद्वार को अपने देश ले जाने की मांग की, तो उन्हें प्लास्टर की प्रतिकृतियों से संतुष्ट कर दिया गया, और मूल इमारत वहीं रही।
- जॉन मार्शल ने यहाँ रहकर इसके संरक्षण पर पुस्तकें लिखीं।
8. मूर्तिकला: पत्थर में गढ़ी कहानियाँ
साँची की मूर्तियों को समझने के लिए बौद्ध साहित्य का ज्ञान जरूरी था, क्योंकि कई बार मूर्तिकार प्रतीकों का प्रयोग करते थे।
प्रमुख प्रतीक (Symbols)
- रिक्त स्थान: बुद्ध के ध्यान की दशा।
- चक्र (Wheel): सारनाथ में दिया गया प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन)।
- स्तूप: महापरिनिब्बान (मृत्यु)।
- पेड़ (बोधि वृक्ष): ज्ञान प्राप्ति।
लोक परंपराएँ और बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म ने स्थानीय लोक परंपराओं को भी अपने में मिला लिया:
- शालभंजिका: तोरणद्वार पर पेड़ की डाली पकड़कर लटकती हुई स्त्री की मूर्ति। लोक परंपरा में माना जाता था कि इसके छूने से वृक्षों में फूल खिलते हैं। यह एक 'शुभ प्रतीक' था।
- गजलक्ष्मी: हाथियों द्वारा जल से नहलाई जा रही स्त्री। कुछ इसे बुद्ध की माँ माया मानते हैं, तो कुछ सौभाग्य की देवी लक्ष्मी।
- जानवर: हाथी (शक्ति और ज्ञान का प्रतीक), सर्प, बंदर आदि का अंकन जातक कथाओं को दर्शाने के लिए किया गया।
9. बौद्ध मत में विभाजन: हीनयान और महायान
ईसा की पहली सदी तक बौद्ध धर्म में बदलाव आए:
- हीनयान (थेरवाद): ये बुद्ध को एक महापुरुष (शिक्षक) मानते थे। मूर्ति पूजा नहीं करते थे। व्यक्तिगत प्रयास से निर्वाण पाने पर जोर था।
- महायान (बड़ा जहाज): ये बुद्ध को ईश्वर मानने लगे और उनकी मूर्ति पूजा शुरू की। इनमें 'बोधिसत्व' की अवधारणा आई—वे करुणावान प्राणी जो निर्वाण पाने के बाद भी दूसरों की मदद के लिए रुकते हैं।
10. पौराणिक हिंदू धर्म और मंदिर
इसी समय हिंदू धर्म में भी 'भक्ति' (ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ प्रेम) का उदय हुआ।
- वैष्णववाद: विष्णु को मुख्य देवता माना गया। इसमें दस अवतारों की कल्पना की गई (जब पाप बढ़ता है, भगवान रक्षा के लिए अवतार लेते हैं)।
- शैववाद: शिव को परमेश्वर माना गया, जिनकी पूजा लिंग रूप में या मानवी रूप में होती थी।
- मंदिर स्थापत्य: शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे जैसे थे जिसे 'गर्भगृह' कहा जाता था (जहाँ मूर्ति होती थी)। इसके ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाता था जिसे 'शिखर' कहते थे।
मंदिर निर्माण कला का चरम उत्कर्ष। 8वीं सदी में बना यह मंदिर ईंट-पत्थर जोड़कर नहीं, बल्कि पूरी एक पहाड़ी को ऊपर से नीचे काटकर (Monolithic) बनाया गया था। इसके ताम्रपत्र अभिलेख में शिल्पकार का आश्चर्य दर्ज है: "हे भगवान, यह मैंने कैसे बनाया!"
