अध्याय-5. यात्रियों के नज़रिए: समाज की समझ
📅 Date: 24 February 2026 (Tuesday)
प्राचीन काल में लोग रोजगार, सुरक्षा, तीर्थयात्रा या साहस की भावना से यात्राएं करते थे। इन यात्रियों ने अपने वृत्तांतों (Travelogues) के माध्यम से मध्यकालीन भारत की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति का जो वर्णन किया है, वह आज इतिहास का एक अमूल्य स्रोत है। इस अध्याय में हम तीन प्रमुख विदेशी यात्रियों—अल-बिरूनी (11वीं सदी), इब्न बतूता (14वीं सदी) और फ्रांस्वा बर्नियर (17वीं सदी)—के नजरिए से भारत को समझेंगे।
1. अल-बिरूनी और 'किताब-उल-हिन्द'
जीवन परिचय और भारत आगमन
- जन्म: 973 ई. में ख़्वारिज़्म (आधुनिक उज़्बेकिस्तान) में। ख़्वारिज़्म शिक्षा का बड़ा केंद्र था।
- भाषा ज्ञान: वह सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत का ज्ञाता था। (यूनानी भाषा नहीं जानता था, फिर भी प्लेटो से परिचित था)।
- भारत आगमन: 1017 ई. में सुल्तान महमूद गज़नवी ने ख़्वारिज़्म पर आक्रमण किया और अल-बिरूनी को गज़नी ले आया। महमूद के भारत आक्रमणों के साथ वह भारत (पंजाब) आया और यहीं बस गया।
'किताब-उल-हिन्द' (तहकीक-ए-हिन्द)
यह अरबी भाषा में लिखी गई एक विस्तृत कृति है। इसमें 80 अध्याय हैं।
- विषय: धर्म, दर्शन, खगोल-विज्ञान, रीति-रिवाज, कानून, और मापन विधियाँ।
- शैली: हर अध्याय की शुरुआत एक प्रश्न से होती है, फिर संस्कृत परंपराओं का वर्णन और अंत में अन्य संस्कृतियों से तुलना।
समझने में बाधक तत्व (अवरोध)
अल-बिरूनी ने भारत को समझने में तीन बाधाएँ बताईं:
- भाषा: संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से इतनी अलग थी कि अनुवाद कठिन था।
- धार्मिक अवस्था: धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं में अंतर।
- अभिमान: स्थानीय लोगों का अपनी संस्कृति को लेकर अभिमान।
2. अल-बिरूनी का वर्ण व्यवस्था विवरण
उसने भारतीय वर्ण व्यवस्था की तुलना प्राचीन फारस से की ताकि यह दिखाया जा सके कि सामाजिक विभाजन केवल भारत तक सीमित नहीं था।
- चार वर्ण: ब्राह्मण (ब्रह्मा के मुख से), क्षत्रिय (भुजाओं से), वैश्य (जंघाओं से) और शूद्र (चरणों से)।
- फारस से तुलना: फारस में भी चार वर्ग थे—घुड़सवार/शासक, भिक्षु/पुरोहित, चिकित्सक/वैज्ञानिक, और किसान/शिल्पकार।
- आलोचना: उसने वर्ण व्यवस्था को स्वीकार किया, लेकिन 'अपवित्रता' की अवधारणा को खारिज कर दिया। उसका तर्क था कि प्रकृति में हर अपवित्र वस्तु अपनी पवित्रता वापस पा लेती है (जैसे सूर्य हवा को स्वच्छ करता है), इसलिए कोई भी जाति सदा के लिए अपवित्र नहीं हो सकती।
3. इब्न बतूता और 'रिहला'
जीवन परिचय (Moroccan Traveller)
- जन्म: मोरक्को के तंजियर (Tangier) में। वह एक शिक्षित परिवार से था जो 'शरिया' (इस्लामी कानून) का विशेषज्ञ था।
- यात्री स्वभाव: उसे "पुस्तकों की बजाय यात्राओं से अर्जित ज्ञान" में विश्वास था। वह मक्का, सीरिया, इराक, फारस और अफ्रीका की यात्रा कर चुका था।
- भारत आगमन: 1333 ई. में वह सिंध पहुँचा। मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसकी विद्वता से प्रभावित होकर उसे दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त किया।
- चीन यात्रा: 1342 ई. में सुल्तान के दूत के रूप में वह चीन गया।
'रिहला' (यात्रा वृतांत)
अरबी भाषा में लिखा गया यह ग्रंथ 14वीं सदी के भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अत्यंत रोचक विवरण देता है। इब्न बतूता अक्सर उन चीजों का वर्णन करता था जो उसे अनोखी लगती थीं।
1. नारियल: उसने इसे मानव सिर जैसा बताया (दो आँखें और एक मुख)।
2. पान: इसे अंगूर की बेल की तरह उगाया जाता है और केवल पत्तियों के लिए महत्व दिया जाता है।
भारतीय शहर और संचार प्रणाली
- शहर: दिल्ली को भारत का सबसे बड़ा शहर बताया। दौलताबाद (महाराष्ट्र) भी आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। शहर घनी आबादी वाले और रंगीन बाज़ारों से भरे थे।
- डाक प्रणाली (Postal System): दो प्रकार की थीं—
- अश्व डाक (उलुक): हर 4 मील पर शाही घोड़े।
- पैदल डाक (दावा): हर मील पर तीन स्टेशन। यह घोड़ा डाक से भी तेज थी और इसका प्रयोग ताजे फल या खुरासान के मेवे ढोने के लिए होता था।
4. फ्रांस्वा बर्नियर: एक अलग नज़रिए
परिचय (French Traveller)
वह एक फ्रांसीसी चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार था। वह 1656 से 1668 तक (12 वर्ष) भारत में रहा। वह मुगल दरबार में दारा शिकोह के चिकित्सक और बाद में दानिशमंद ख़ान (अमीर) के साथ बुद्धिजीवी के रूप में जुड़ा रहा।
'ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर'
बर्नियर का लेखन इब्न बतूता से अलग था। वह चीजों को केवल देखता नहीं था, बल्कि उनकी तुलना यूरोप (विशेषकर फ्रांस) से करता था और भारत को 'हीन' (Inferior) दिखाने का प्रयास करता था।
'द्वि-विपरीतता' का सिद्धांत (Binary Opposition)
उसने हर चीज को ऐसे प्रस्तुत किया जैसे भारत यूरोप का विलोम हो।
- भूमि स्वामित्व का अभाव: बर्नियर के अनुसार, भारत में निजी भू-स्वामित्व (Private Property in Land) नहीं था। सारी जमीन राजा की थी।
- नुकसान: क्योंकि किसान जमीन के मालिक नहीं थे, वे सुधार में रुचि नहीं लेते थे। इससे कृषि का विनाश हो रहा था। उसने कहा, "भारत में मध्यम वर्ग नहीं है, केवल अमीर और बहुत गरीब हैं।"
- सच्चाई: मुगल दस्तावेजों (जैसे अबुल फज़ल) से पता चलता है कि राजा जमीन का मालिक नहीं था, वह केवल कर (Tax) लेता था।
शिविर नगर (Camp Towns)
बर्नियर ने मुगल शहरों को 'शिविर नगर' कहा। उसका मानना था कि ये शहर केवल शाही दरबार पर निर्भर थे। जब दरबार कहीं और जाता, तो शहर बर्बाद हो जाते। (यह पूरी तरह सच नहीं था, क्योंकि व्यापारिक शहर समृद्ध थे)।
5. सती प्रथा और महिलाओं की स्थिति
यात्रियों ने महिलाओं की स्थिति पर भी लिखा।
- इब्न बतूता: उसने दास प्रथा का वर्णन किया। दासियाँ संगीत में निपुण थीं और जासूसी के लिए भी इस्तेमाल होती थीं।
- बर्नियर और सती प्रथा: उसने एक बाल विधवा को जबरन सती होते देखा। उसने लिखा कि कुछ महिलाएं स्वेच्छा से जलती थीं, लेकिन कई को बाध्य किया जाता था।
- श्रम: महिलाएं कृषि और गैर-कृषि उत्पादन (जैसे कताई) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
6. पश्चिमी विचारकों पर बर्नियर का प्रभाव
बर्नियर के 'भूमि स्वामित्व के अभाव' वाले सिद्धांत ने बाद के यूरोपीय विचारकों को बहुत प्रभावित किया।
फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने बर्नियर के विवरण के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि एशिया में शासक निरंकुश हैं और प्रजा गुलाम है।
☭ कार्ल मार्क्स (Karl Marx):
19वीं सदी में मार्क्स ने 'एशियाई उत्पादन शैली' (Asiatic Mode of Production) का सिद्धांत दिया। उसने भी माना कि भारत में निजी संपत्ति नहीं थी और आत्मनिर्भर गाँव थे जिन पर निरंकुश राज्य का नियंत्रण था।
