4: अंतर्राष्ट्रीय संगठन - वैश्विक शांति और सुरक्षा के स्तंभ
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
वैश्विक राजनीति का स्वरूप अत्यंत जटिल है, जहाँ विभिन्न राष्ट्र अपनी संप्रभुता और हितों को लेकर अक्सर टकराव की स्थिति में रहते हैं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय संगठन वे सेतु हैं जो अराजकता और व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। ये संगठन केवल राष्ट्रों का समूह नहीं हैं, बल्कि ये सहयोग के वे ढांचे हैं जो युद्ध की विभीषिका को संवाद की मेज तक सीमित करने का प्रयास करते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 'लीग ऑफ नेशंस' की विफलता ने हमें सिखाया कि एक मजबूत वैश्विक संस्था के बिना दुनिया सुरक्षित नहीं रह सकती। इसी अनुभव की परिणति 'संयुक्त राष्ट्र संघ' (UN) के रूप में हुई। इस लेख में हम अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सैद्धांतिक आधार, संयुक्त राष्ट्र की विस्तृत संरचना और 21वीं सदी की चुनौतियों के बीच इसकी प्रासंगिकता का गहन विश्लेषण करेंगे।
1. अंतर्राष्ट्रीय संगठन: अर्थ और वर्गीकरण
अंतर्राष्ट्रीय संगठन उन निकायों को कहा जाता है जिनके सदस्य संप्रभु राज्य या अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं होती हैं और जिनका कार्यक्षेत्र वैश्विक होता है। ये संगठन मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किए जाते हैं:
- अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन (INGOs): ये निजी क्षेत्र के संगठन होते हैं जो लाभ के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक, मानवीय या पर्यावरणीय उद्देश्यों के लिए कार्य करते हैं। जैसे— एमनेस्टी इंटरनेशनल और रेड क्रॉस।
- अंतर-सरकारी संगठन (IGOs): ये संगठन सरकारों के बीच संधियों द्वारा गठित किए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ (UN), यूरोपीय संघ (EU) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
2. हमें अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की आवश्यकता क्यों है?
संसार के राष्ट्रों के बीच शक्ति और संसाधनों के लिए होड़ मची रहती है। अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस होड़ को संघर्ष में बदलने से रोकने के लिए अनिवार्य हैं।
अनिवार्यता के प्रमुख पहलू:
- शांति और विवाद समाधान: अंतर्राष्ट्रीय संगठन राष्ट्रों के बीच एक 'न्यूट्रल ग्राउंड' (तटस्थ मंच) प्रदान करते हैं जहाँ वे सैन्य शक्ति के बजाय कूटनीति का उपयोग कर सकें। जैसा कि शशि थरूर ने उल्लेख किया है, UN में होने वाली बहसें भले ही उबाऊ लगें, लेकिन वे गोलियों की गूँज से कहीं बेहतर हैं।
- सहयोग का प्रबंधन: कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन्हें कोई भी देश अकेले हल नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, **ग्लोबल वार्मिंग**। यदि एक देश ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करता है और दूसरा नहीं, तो समस्या जस की तस रहेगी। IOs ऐसे वैश्विक सहयोग को अनिवार्य और प्रबंधित बनाते हैं।
- महामारी और स्वास्थ्य सुरक्षा: संक्रामक रोग सीमाओं को नहीं पहचानते। कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारियों के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे संगठनों ने सूचना साझाकरण और वैक्सीन वितरण में केंद्रीय भूमिका निभाई।
- आर्थिक स्थिरता: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) यह सुनिश्चित करता है कि वैश्विक वित्तीय प्रणाली सुरक्षित रहे। हालांकि इसमें मत प्रतिशत विकसित देशों के पक्ष में है, फिर भी यह संकटग्रस्त देशों के लिए 'अंतिम ऋणदाता' (Lender of Last Resort) के रूप में कार्य करता है।
3. संयुक्त राष्ट्र संघ (UN): इतिहास और स्थापना
संयुक्त राष्ट्र संघ आधुनिक विश्व का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अविष्कार है। इसकी स्थापना द्वितीय विश्वयुद्ध की राख से एक शांतिपूर्ण भविष्य के निर्माण के लिए की गई थी।
- अगस्त 1941: रूजवेल्ट और चर्चिल ने 'अटलांटिक चार्टर' पर हस्ताक्षर किए, जिसने UN की वैचारिक नींव रखी।
- याल्टा सम्मेलन (फरवरी 1945): चर्चिल, रूजवेल्ट और स्टालिन ने भविष्य की सुरक्षा परिषद और वीटो के सिद्धांतों पर चर्चा की।
- सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन (1945): अप्रैल से जून तक चली चर्चाओं के बाद 50 संस्थापक सदस्यों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किए।
- 24 अक्टूबर 1945: 51 मूल सदस्यों (पोलैंड सहित) के साथ UN अस्तित्व में आया।
- भारत की भूमिका: भारत 30 अक्टूबर 1945 को इसमें शामिल हुआ। यह ध्यान देने योग्य है कि भारत तब आज़ाद नहीं था, फिर भी वह संस्थापक सदस्यों में शामिल था।
4. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंग: विस्तृत कार्यप्रणाली
UN का ढांचा जटिल है, जिसमें छह मुख्य अंग अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करते हैं।
I. महासभा (General Assembly) - विश्व की संसद
महासभा एकमात्र ऐसा अंग है जहाँ सभी 193 सदस्य देशों को एक समान वोट प्राप्त है। यहाँ छोटे और बड़े राष्ट्रों के बीच समानता का सिद्धांत लागू होता है। प्रतिवर्ष सितंबर में न्यूयॉर्क में इसका विशाल सत्र आयोजित होता है। महासभा शांति, सुरक्षा और नए सदस्यों के प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेती है।
II. सुरक्षा परिषद (Security Council) - विश्व की पुलिस
यह UN का कार्यकारी अंग है। इसमें 5 स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। अस्थायी सदस्यों का चुनाव दो वर्ष के लिए होता है।
सुरक्षा परिषद की असली शक्ति P5 देशों के पास है। 'वीटो' का अर्थ है 'मैं मना करता हूँ'। यदि 15 में से 14 सदस्य किसी प्रस्ताव के समर्थन में हों, लेकिन एक स्थायी सदस्य वीटो कर दे, तो वह प्रस्ताव खारिज हो जाता है। यह शक्ति 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का परिणाम थी, जिसे आज बदलना सबसे बड़ी चुनौती है।
III. आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC)
यह परिषद सतत विकास, मानवाधिकार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार जैसे मुद्दों पर नीति निर्धारण करती है। इसमें 54 सदस्य होते हैं। यह UNESCO, UNICEF और WHO जैसी विशिष्ट एजेंसियों के कार्यों का समन्वय करती है।
IV. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)
यह द हेग (नीदरलैंड) में स्थित है। यह संप्रभु राज्यों के बीच कानूनी विवादों को सुलझाता है। यहाँ 15 न्यायाधीश होते हैं। इसकी भाषा अंग्रेजी और फ्रेंच है। यह केवल राज्यों के बीच विवाद सुनता है, व्यक्तियों के नहीं।
V. सचिवालय (Secretariat)
यह UN का प्रशासनिक ढांचा है। इसका मुखिया 'महासचिव' होता है। महासचिव केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि विश्व का सबसे बड़ा कूटनीतिज्ञ होता है। सचिवालय छः आधिकारिक भाषाओं (अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी, स्पेनिश) में कार्य करता है।
5. संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार: 21वीं सदी की मांग
1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद वैश्विक परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब मांग उठ रही है कि UN को आधुनिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाया जाए।
प्रमुख शिकायतों का स्वरूप (1992 प्रस्ताव):
- सुरक्षा परिषद अब वर्तमान राजनीतिक संतुलन का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
- फैसलों पर पश्चिमी (विशेषकर अमेरिकी) मूल्यों का भारी प्रभाव है।
- अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और उभरते हुए एशिया की उपेक्षा की जा रही है।
पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने प्रस्ताव दिया कि नए स्थायी सदस्यों के लिए ये शर्तें होनी चाहिए: 1. विशाल अर्थव्यवस्था, 2. बड़ी सैन्य शक्ति, 3. बजट में महत्वपूर्ण योगदान, 4. बड़ी आबादी, और 5. लोकतंत्र के प्रति निष्ठा। हालांकि, इन मापदंडों पर भी सदस्य देशों के बीच गहरा मतभेद है।
6. भारत और सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता
भारत सुरक्षा परिषद के विस्तार का प्रबल समर्थक है और स्वयं स्थायी सदस्यता का एक मजबूत दावेदार है।
भारत की दावेदारी के आधार:
- जनसांख्यिकीय शक्ति: भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है (विश्व का हर छठा व्यक्ति भारतीय है)।
- लोकतांत्रिक मूल्य: भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है।
- शांति अभियानों में योगदान: UN शांति सेना (Blue Helmets) में भारत का योगदान किसी भी अन्य देश से अधिक रहा है।
- आर्थिक उभार: भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तेजी से बढ़ रहा है।
बाधाएँ और विरोध:
भारत की दावेदारी के सामने चीन का वीटो सबसे बड़ी बाधा है। इसके अलावा, पाकिस्तान और 'कॉफी क्लब' (इटली, मैक्सिको, तुर्की आदि) जैसे देश भी भारत की दावेदारी का विरोध करते हैं क्योंकि वे स्वयं दावेदार हैं या भारत के प्रभाव को रोकना चाहते हैं।
7. एक-ध्रुवीय विश्व और संयुक्त राष्ट्र की चुनौतियाँ
सोवियत संघ के अंत के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बना। सवाल उठा कि क्या UN अमेरिका के सामने 'बेबस' है?
अमेरिकी प्रभुत्व के कारण:
- वित्तीय नियंत्रण: UN के कुल बजट का लगभग 22% हिस्सा अकेले अमेरिका देता है। कई विकास एजेंसियां अमेरिकी फंड पर निर्भर हैं।
- प्रशासनिक शक्ति: UN मुख्यालय न्यूयॉर्क में होने के कारण अमेरिकी नौकरशाही का प्रभाव गहरा है।
- वीटो की शक्ति: अमेरिका किसी भी ऐसे प्रस्ताव को रोक देता है जो उसके या उसके सहयोगियों (जैसे इजरायल) के खिलाफ हो।
भले ही UN अमेरिका को पूरी तरह नियंत्रित न कर पाए, लेकिन यह उसे 'नैतिक रूप से जवाबदेह' जरूर ठहराता है। 2003 के इराक युद्ध में जब UN ने अमेरिका को अनुमति नहीं दी, तो अमेरिका को वैश्विक स्तर पर नैतिक हार का सामना करना पड़ा। UN एक ऐसा मंच है जहाँ अमेरिका को भी बाकी दुनिया के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है।
8. अन्य महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और उनकी भूमिका
वैश्विक शासन में UN के अलावा भी कई विशेषीकृत संस्थाएं सक्रिय हैं:
| संस्था | स्थापना | मुख्य उद्देश्य / विशेषता |
|---|---|---|
| विश्व बैंक (World Bank) | 1944 | विकासशील देशों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए ऋण देना। |
| विश्व व्यापार संगठन (WTO) | 1995 | वैश्विक व्यापार के नियम बनाना। P3 (अमेरिका, EU, जापान) का प्रभाव अधिक। |
| IAEA | 1957 | परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना (निगरानी करना)। |
| एमनेस्टी इंटरनेशनल | 1961 | मानवाधिकार रिपोर्ट तैयार करना। सरकारों की आलोचना के लिए प्रसिद्ध। |
| ह्यूमन राइट्स वॉच | 1978 | बाल सैनिकों और बारूदी सुरंगों के खिलाफ अभियान। अमेरिका आधारित। |
9. संयुक्त राष्ट्र के महासचिवों का गौरवशाली इतिहास
महासचिव संगठन की आत्मा होते हैं। वे विश्व शांति के प्रतीक के रूप में कार्य करते हैं।
| नाम | देश | कार्यकाल | मुख्य योगदान |
|---|---|---|---|
| ट्राइग्व ली | नॉर्वे | 1946-52 | कश्मीर और कोरियाई युद्ध के समय शांति प्रयास। |
| डैग हैमरसोल्ड | स्वीडन | 1953-61 | स्वेज नहर संकट का समाधान। कांगो में शहीद हुए। |
| यू थां | बर्मा | 1961-71 | क्यूबा मिसाइल संकट के समय परमाणु युद्ध रोका। |
| कोफी अन्नान | घाना | 1997-06 | मानवाधिकार परिषद और 'मिलेनियम गोल्स' की शुरुआत। |
| एंटोनियो गुटेरेस | पुर्तगाल | 2017-वर्तमान | जलवायु परिवर्तन और यूक्रेन संकट में मध्यस्थता। |
निष्कर्ष: भविष्य की राह
संयुक्त राष्ट्र संघ एक 'अपूर्ण' संगठन हो सकता है, लेकिन यह वर्तमान विश्व व्यवस्था का 'अनिवार्य' हिस्सा है। इसकी विफलता का अर्थ होगा वैश्विक अराजकता। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वे स्वर्ग बना सकते हैं या नहीं, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वे दुनिया को नरक (युद्ध) में गिरने से बचा सकते हैं या नहीं। भारत जैसे उभरते हुए राष्ट्रों की भागीदारी और वीटो पावर का लोकतांत्रिकरण ही इस संस्था को भविष्य के लिए प्रासंगिक बनाए रखेगा।
