स्वतंत्र भारत में राजनीति: 4.भारत के विदेश संबंध - स्वतंत्रता के पश्चात्

स्वतंत्र भारत में राजनीति: भारत के विदेश संबंध - स्वतंत्रता के पश्चात्
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4: भारत के विदेश संबंध - स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का विकास

स्वतंत्र भारत में राजनीति: 4.भारत के विदेश संबंध - स्वतंत्रता के पश्चात्

1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब विश्व पटल पर परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध अभी समाप्त ही हुआ था और दुनिया दो वैचारिक गुटों—अमेरिकी नेतृत्व वाला पूँजीवादी गुट और सोवियत संघ के नेतृत्व वाला साम्यवादी गुट—में विभाजित हो रही थी। इसी 'शीतयुद्ध' के साये में भारत को अपनी विदेश नीति का निर्धारण करना था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने न केवल राष्ट्र के निर्माण में बल्कि एक स्वतंत्र और नैतिक विदेश नीति की नींव रखने में भी केंद्रीय भूमिका निभाई। भारत की विदेश नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साथ-साथ वैश्विक शांति और उपनिवेशवाद का विरोध करना था। इस लेख में हम भारत की विदेश नीति के सिद्धांतों, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों और परमाणु नीति का एक अत्यंत विस्तृत और सर्वांगीण विश्लेषण करेंगे।


1. स्वतंत्रता के समय भारत की प्रारंभिक चुनौतियाँ

विदेश नीति शून्य में नहीं बनती; यह आंतरिक परिस्थितियों और विरासत में मिली समस्याओं का प्रतिबिंब होती है। 1947 का भारत चुनौतियों से घिरा था:

  • विभाजन की त्रासदी: भारत-पाकिस्तान बँटवारे के कारण साम्प्रदायिक हिंसा भड़की और लगभग 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए। कश्मीर विवाद ने जन्म लिया, जिसने विदेश नीति को क्षेत्रीय सुरक्षा की ओर मोड़ दिया।
  • आर्थिक खोखलापन: सदियों के औपनिवेशिक शासन ने भारत को गरीब और अशिक्षित बना दिया था। आर्थिक विकास के लिए विदेशी सहायता और निवेश अनिवार्य था, लेकिन किसी गुट की गुलामी स्वीकार किए बिना।
  • सीमा विवाद: अंग्रेजों ने सीमाओं का सीमांकन अधूरा छोड़ा था। मैकमोहन रेखा और अक्साई-चिन जैसे क्षेत्र भविष्य के संघर्षों की जड़ बने।
  • लोकतंत्र का संरक्षण: नव-स्वतंत्र देश के लिए लोकतंत्र की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख बनाना एक बड़ी चुनौती थी।

2. भारतीय विदेश नीति के निर्धारक तत्व

किसी भी देश की विदेश नीति उसके भूगोल, इतिहास और राष्ट्रीय हितों से प्रभावित होती है। भारत की नीति के प्रमुख निर्धारक निम्नलिखित थे:

  1. राष्ट्रीय हित: देश की संप्रभुता, अखंडता और आर्थिक प्रगति को सर्वोपरि रखना।
  2. नेहरू का विजन: नेहरू विश्व शांति के कट्टर समर्थक थे। वे मानते थे कि भारत को एशिया और अफ्रीका के देशों का नेतृत्व करना चाहिए।
  3. गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment): दोनों महाशक्तियों से समान दूरी बनाए रखना ताकि स्वतंत्र निर्णय लिए जा सकें।
  4. क्षेत्रीय स्थिरता: दक्षिण एशिया में एक शांतिपूर्ण वातावरण बनाना ताकि विकास पर ध्यान दिया जा सके।

3. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) और नेहरू की भूमिका

गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता या पलायन नहीं था, बल्कि यह वैश्विक मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राय रखने की नीति थी।

🚀 गुटनिरपेक्षता के ऐतिहासिक मील के पत्थर:
  • 1947: नई दिल्ली में 'एशियाई संबंध सम्मेलन' (Asian Relations Conference) का आयोजन।
  • 1955: इंडोनेशिया में 'बांडुंग सम्मेलन' (Bandung Conference), जहाँ गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वैचारिक नींव पड़ी।
  • 1961: बेलग्रेड में पहला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन हुआ। इसके प्रणेता नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया) और नासिर (मिस्र) थे।

गुटनिरपेक्षता की उपलब्धियाँ और आलोचना:

  • सफलता: भारत ने नव-स्वतंत्र देशों के लिए एक 'तीसरा विकल्प' पेश किया। संयुक्त राष्ट्र में उपनिवेशवाद और रंगभेद के खिलाफ आवाज़ उठाई।
  • आलोचना: 1954 में पाकिस्तान के अमेरिकी सैन्य गठबंधन (CENTO/SEATO) में शामिल होने के बाद भारत का झुकाव सोवियत संघ की ओर बढ़ने लगा। आलोचकों ने इसे 'गुटनिरपेक्षता का पाखंड' कहा, विशेषकर 1956 में हंगरी पर सोवियत हमले पर भारत की चुप्पी के कारण।

4. भारत-चीन संबंध: "हिंदी-चीनी भाई-भाई" से युद्ध तक

नेहरू ने चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाले शुरुआती नेताओं में से एक थे। उन्हें उम्मीद थी कि दो प्राचीन एशियाई सभ्यताएँ मिलकर विश्व की नियति बदलेंगी।

📜 पंचशील समझौता (1954):
नेहरू और चाऊ एन लाई ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांतों की घोषणा की:
1. एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान।
2. अनाक्रमण (एक-दूसरे पर हमला न करना)।
3. आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
4. समानता और पारस्परिक लाभ।
5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

संबंधों में खटास और 1962 का युद्ध:

1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा और 1959 में दलाई लामा को भारत में शरण मिलने से चीन क्रोधित हो गया। सीमा विवाद (अक्साई-चिन और अरुणाचल प्रदेश) ने आग में घी का काम किया।

  • युद्ध (अक्टूबर 1962): चीन ने अचानक भारत पर हमला किया। भारतीय सेना पहाड़ी युद्ध के लिए तैयार नहीं थी। भारत की करारी हार हुई।
  • परिणाम: नेहरू की विदेश नीति को गहरा धक्का लगा। रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णमेनन को इस्तीफा देना पड़ा। भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों को आधुनिक बनाने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन से मदद ली, जिससे गुटनिरपेक्षता की छवि प्रभावित हुई।

5. भारत-पाकिस्तान संबंध: संघर्षों का लंबा इतिहास

भारत और पाकिस्तान के संबंध जन्म से ही तनावपूर्ण रहे हैं। कश्मीर मुद्दा इस दुश्मनी का केंद्र बिंदु रहा है।

प्रमुख युद्ध और समझौते:

  • 1948 का युद्ध: कश्मीर के विलय को लेकर हुआ। संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से युद्धविराम हुआ, लेकिन कश्मीर विभाजित हो गया।
  • सिंधु जल संधि (1960): विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ यह समझौता आज भी दोनों देशों के बीच सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • 1965 का युद्ध: कच्छ के रन और कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ के कारण शुरू हुआ। इसके बाद सोवियत मध्यस्थता में 'ताशकंद समझौता' (1966) हुआ।
  • 1971 का युद्ध और बांग्लादेश का उदय: पूर्वी पाकिस्तान में दमन के कारण 80 लाख शरणार्थी भारत आए। भारत ने सैन्य हस्तक्षेप किया, पाकिस्तान के 90,000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद 'शिमला समझौता' (1972) हुआ, जिसमें इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो ने द्विपक्षीय समाधान पर सहमति जताई।

6. भारत की परमाणु नीति: शांतिपूर्ण से प्रतिरोधक तक

भारत की परमाणु नीति का विकास राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक नैतिकता के बीच संतुलन का परिणाम है।

🔬 परमाणु यात्रा के प्रमुख पड़ाव:
1. शुरुआत: 1940 के दशक में होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में परमाणु कार्यक्रम शुरू हुआ। नेहरू ने इसे 'शांतिपूर्ण उद्देश्यों' (ऊर्जा) तक सीमित रखने पर जोर दिया।
2. पोखरण-I (1974): इंदिरा गांधी के समय 'स्माइलिंग बुद्धा' परीक्षण हुआ। इसे "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट" कहा गया।
3. पोखरण-II (1998): अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पाँच परमाणु परीक्षण हुए। भारत ने आधिकारिक रूप से 'परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र' की घोषणा की।

भारत की परमाणु सिद्धांत (Nuclear Doctrine):

  • No First Use (पहले प्रयोग नहीं): भारत किसी भी देश पर पहले परमाणु हमला नहीं करेगा।
  • न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोध: भारत केवल उतनी परमाणु क्षमता रखेगा जो शत्रु को हमला करने से रोकने के लिए पर्याप्त हो।
  • NPT/CTBT का विरोध: भारत इन संधियों को भेदभावपूर्ण मानता है क्योंकि ये केवल परमाणु शक्तियों के एकाधिकार को बचाती हैं।

7. वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका और प्रभाव

भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों की आवाज़ बुलंद की है।

  • एफ्रो-एशियाई एकता: 1955 का बांडुंग सम्मेलन भारत के नेतृत्व का प्रतीक था। भारत ने अफ्रीका और एशिया के अनौपनीवेशीकरण (Decolonization) में मदद की।
  • संयुक्त राष्ट्र (UN): भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों (Peacekeeping) में सबसे अधिक सैनिक भेजने वाले देशों में से एक है। वर्तमान में भारत सुरक्षा परिषद में 'स्थायी सदस्यता' का प्रबल दावेदार है।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन: शीतयुद्ध के बाद भी भारत ने NAM को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश की है, हालाँकि अब भारत 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) की ओर बढ़ रहा है।

निष्कर्ष: एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति

स्वतंत्रता के बाद से भारत की विदेश नीति ने एक लंबी और गौरवमयी यात्रा तय की है। नेहरू के 'आदर्शवाद' से लेकर वर्तमान के 'यथार्थवाद' तक, भारत ने अपने सिद्धांतों से समझौता किए बिना वैश्विक राजनीति में अपना स्थान बनाया है। जहाँ 1962 की हार ने हमें सैन्य रूप से सचेत किया, वहीं 1971 की जीत ने हमें दक्षिण एशिया की अजेय शक्ति के रूप में स्थापित किया। आज भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसकी विदेश नीति 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन के साथ 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प को लेकर आगे बढ़ रही है।

💡 सारांश: भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और संप्रभुता के सम्मान पर टिकी है। पड़ोसी देशों के साथ संघर्षों के बावजूद भारत ने कभी भी आक्रामक नीति नहीं अपनाई, बल्कि हमेशा कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को प्राथमिकता दी है।