2: एक दल के प्रभुत्व का दौर - भारतीय लोकतंत्र की पहली परीक्षा
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना, लेकिन यह आज़ादी अपने साथ चुनौतियों का विशाल अंबार लेकर आई थी। राष्ट्र-निर्माण की कठिन परिस्थितियों के बीच कई नव-स्वतंत्र देशों ने आंतरिक कलह से बचने के लिए लोकतंत्र को त्याग कर तानाशाही या सैनिक शासन का मार्ग चुना। लेकिन भारत के नेताओं ने, जो स्वतंत्रता संग्राम की आग में तपकर निकले थे, लोकतंत्र के प्रति अपनी अटूट निष्ठा दिखाई। उन्होंने राजनीति को सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समस्याओं के समाधान का एक महान माध्यम माना। भारतीय राजनीति के शुरुआती दो दशक (1952-1967) मुख्य रूप से कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमते रहे, जिसे 'एक दल के प्रभुत्व का दौर' कहा जाता है। इस लेख में हम भारत में लोकतंत्र की स्थापना, पहले आम चुनाव की कठिनाइयों और कांग्रेस के उस विशाल साम्राज्य का विश्लेषण करेंगे जिसने भारतीय लोकतंत्र की नींव रखी।
1. भारतीय संविधान का अंगीकरण और अंतरिम शासन
भारतीय संविधान का निर्माण एक लंबी और विचारशील प्रक्रिया थी। 26 नवंबर 1949 को इसे अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को यह पूर्ण रूप से लागू हुआ।
- अंतरिम सरकार: संविधान लागू होने से पहले भारत का शासन एक 'अंतरिम सरकार' चला रही थी।
- लक्ष्य: इस अंतरिम व्यवस्था को एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार में बदलना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराना अनिवार्य था।
2. चुनाव आयोग का गठन और सुकुमार सेन की भूमिका
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संचालन के लिए 'चुनाव आयोग' का प्रावधान किया गया।
- स्थापना: 25 जनवरी 1950 (इसीलिए इस दिन को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' के रूप में मनाया जाता है)।
- प्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त: सुकुमार सेन (एक अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी)।
- कार्य: मतदाता सूची तैयार करना, चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन करना और चुनाव अधिकारियों को प्रशिक्षित करना।
3. प्रथम आम चुनाव (1951-52): चुनौतियाँ और "इतिहास का सबसे बड़ा जुआ"
भारत में पहला चुनाव कराना किसी साहसिक अभियान से कम नहीं था। पश्चिमी देशों के विद्वानों और पत्रिकाओं को भरोसा नहीं था कि एक गरीब और अशिक्षित देश में सार्वभौम वयस्क मताधिकार सफल हो पाएगा।
प्रमुख चुनौतियाँ:
- विशाल मतदाता वर्ग: लगभग 17 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से 85% निरक्षर थे। उन्हें मतदान की प्रक्रिया समझाना एक दुष्कर कार्य था।
- सीटों का गणित: लोकसभा की 489 और विधानसभाओं की 3200 सीटों के लिए चुनाव कराया जाना था।
- मतदाता सूची की गड़बड़ी: पहली बार जब सूची बनी, तो लगभग 40 लाख महिलाओं के नाम "फलां की बीवी" या "फलां की बेटी" के रूप में दर्ज थे। सुकुमार सेन ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया और दोबारा सूची बनाने का आदेश दिया।
- मानव संसाधन: करीब 3 लाख अधिकारियों और चुनाव कर्मियों को कड़ी ट्रेनिंग दी गई।
एक भारतीय संपादक ने इसे 'इतिहास का सबसे बड़ा जुआ' करार दिया। 'ऑर्गनाइजर' जैसी पत्रिकाओं ने लिखा कि जवाहरलाल नेहरू अपने जीते-जी यह देख लेंगे कि सार्वभौम वयस्क मताधिकार भारत में असफल रहा। आलोचकों का मानना था कि लोकतंत्र केवल समृद्ध और शिक्षित देशों की विलासिता है।
नवाचार: फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम
अशिक्षा की समस्या से निपटने के लिए आयोग ने एक विशेष पद्धति अपनाई। हर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी रखी गई जिस पर उसका चुनाव चिन्ह अंकित था। मतदाताओं को केवल खाली मतपत्र (बैलेट पेपर) उठाकर अपनी पसंद के उम्मीदवार की पेटी में डालना था। इस सरलता ने अनपढ़ लोगों के लिए भी मतदान को सुगम बना दिया।
4. चुनाव के परिणाम और लोकतंत्र की जीत
चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 तक चले। जब परिणाम आए, तो वे न केवल निष्पक्ष थे, बल्कि उन्होंने दुनिया के मुँह पर ताला लगा दिया।
- सफलता: हारने वाले उम्मीदवारों ने भी परिणामों की निष्पक्षता को स्वीकार किया।
- वैश्विक प्रभाव: भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि लोकतंत्र के लिए अमीरी या साक्षरता अनिवार्य शर्त नहीं है, बल्कि 'लोकतांत्रिक चेतना' अधिक महत्वपूर्ण है।
- पत्रिकाओं के सुर बदले: 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'हिंदुस्तान टाइम्स' ने इसे भारतीय जनता की राजनीतिक परिपक्वता का प्रमाण बताया।
5. कांग्रेस का प्रभुत्व: पहले तीन आम चुनाव (1952, 1957, 1962)
आजादी के बाद के शुरुआती तीन चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय राजनीति पर अपनी एकछत्र सत्ता जमाए रखी।
| चुनाव वर्ष | कांग्रेस की सीटें (लोकसभा) | विपक्ष की स्थिति |
|---|---|---|
| 1952 (प्रथम) | 364 / 489 | सीपीआई 16 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर। |
| 1957 (द्वितीय) | 371 / 494 | केरल में कम्युनिस्टों ने सरकार बनाई (अपवाद)। |
| 1962 (तृतीय) | 361 / 494 | कांग्रेस का तीन-चौथाई बहुमत कायम रहा। |
कांग्रेस की लोकप्रियता का राज: कांग्रेस केवल एक पार्टी नहीं थी, बल्कि यह 'स्वतंत्रता आंदोलन की उत्तराधिकारी' थी। इसके पास नेहरू जैसा करिश्माई नेतृत्व और गाँवों तक फैला हुआ एक मजबूत संगठन था। अन्य पार्टियाँ तब अभी शैशवावस्था में थीं।
6. कांग्रेस प्रणाली (The Congress System) और इसके प्रभुत्व के कारण
राजनीतिक विश्लेषक रजनी कोठारी ने इस दौर को 'कांग्रेस प्रणाली' का नाम दिया। इसका अर्थ था कि कांग्रेस के भीतर ही विभिन्न विचारधाराओं के 'गुट' मौजूद थे, जो विपक्षी की भूमिका भी निभाते थे।
प्रभुत्व के प्रमुख कारण:
- स्वतंत्रता संग्राम की विरासत: जनता कांग्रेस को राष्ट्र की आज़ादी का प्रतीक मानती थी।
- देशव्यापी नेटवर्क: कांग्रेस का संगठन पंचायत स्तर तक फैला था, जो किसी और पार्टी के पास नहीं था।
- समावेशी स्वभाव (Rainbow Coalition): कांग्रेस में किसान, उद्योगपति, दक्षिणपंथी, वामपंथी, रूढ़िवादी और आधुनिकतावादी—सबके लिए जगह थी। यह एक 'सराय' की तरह थी जहाँ हर कोई आकर ठहर सकता था।
- करिश्माई नेतृत्व: नेहरू की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि लोग केवल उन्हें देखकर ही कांग्रेस को वोट दे देते थे।
- FPTP प्रणाली का लाभ: भारत की चुनाव प्रणाली में जिसे सबसे अधिक वोट मिलते हैं, वह जीत जाता है। कांग्रेस को अक्सर 45% वोट मिलते थे, लेकिन सीटों के मामले में वह 75% ले जाती थी क्योंकि विपक्षी वोट आपस में बँट जाते थे।
भारत में कांग्रेस का प्रभुत्व चीन या सीरिया जैसा नहीं था। चीन में संविधान केवल एक पार्टी की अनुमति देता है, जबकि भारत में बहुदलीय लोकतंत्र था। कांग्रेस ने अपना प्रभुत्व 'निष्पक्ष लोकतांत्रिक चुनावों' के माध्यम से प्राप्त किया था, न कि बलपूर्वक या कानूनी प्रतिबंधों से। इसकी तुलना दक्षिण अफ्रीका की ANC (रंगभेद के बाद) से की जा सकती है।
7. मैक्सिको की PRI: एक 'परिपूर्ण तानाशाही' का उदाहरण
कांग्रेस के प्रभुत्व को समझने के लिए मैक्सिको की **इंस्टीट्यूशनल रिवोल्यूशनरी पार्टी (PRI)** का उदाहरण देखना जरूरी है। 1929 में स्थापित इस पार्टी ने 60 वर्षों तक शासन किया।
- पद्धति: PRI ने चुनावों में धांधली, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग और विपक्षी नेताओं के दमन का सहारा लिया।
- परिणाम: हालांकि वहाँ चुनाव होते थे, लेकिन वे न तो स्वतंत्र थे और न ही निष्पक्ष। इसीलिए वहां के शासन को 'परिपूर्ण तानाशाही' (Perfect Dictatorship) कहा गया।
- भारतीय अंतर: भारत में कांग्रेस के दौर में चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष थे और विपक्षी पार्टियाँ आज़ादी से अपनी बात रख सकती थीं।
8. विचारधारात्मक और सामाजिक गठबंधन के रूप में कांग्रेस
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका 'गठबंधन' स्वरूप था। यह केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक मंच था।
सामाजिक गठबंधन:
कांग्रेस ने हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और दलितों के हितों को साथ जोड़ा। गांधीजी के 'हरिजन' अभियान ने पिछड़े वर्गों को पार्टी के करीब लाया। शहरी बुद्धिजीवियों से लेकर ग्रामीण किसानों तक, कांग्रेस का आधार सर्वव्यापी था।
विचारधारात्मक गठबंधन:
कांग्रेस के भीतर नरमपंथियों और गरमपंथियों का मेल था। नेहरू की समाजवादी सोच के साथ-साथ सरदार पटेल की यथार्थवादी और रूढ़िवादी सोच भी पार्टी का हिस्सा थी। यदि कोई समूह पार्टी से असंतुष्ट होता था, तो वह पार्टी छोड़ने के बजाय पार्टी के भीतर ही अपना एक 'गुट' बना लेता था। इसी 'आंतरिक गुटबाजी' ने कांग्रेस को लचीला और मजबूत बनाया।
9. विपक्षी दलों का उदय और उनकी भूमिका
भले ही कांग्रेस सत्ता में थी, लेकिन 1950 के दशक में भारत में विपक्षी दलों की उपस्थिति बहुत जीवंत थी।
प्रमुख विपक्षी दल:
- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI): 1952 में 16 सीटें जीतकर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी। 1957 में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनाई (ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में)।
- भारतीय जनसंघ (BJS): 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित। इनकी विचारधारा 'एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र' और 'अखंड भारत' पर आधारित थी। इन्होंने हिंदी को राजभाषा बनाने और परमाणु हथियार बनाने की वकालत की।
- स्वतंत्र पार्टी (1959): सी. राजगोपालाचारी और मीनू मसानी द्वारा स्थापित। यह पार्टी 'निजी क्षेत्र' (Private Sector) की स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण की समाप्ति की पक्षधर थी। इसे राजे-महाराजों और उद्योगपतियों का समर्थन प्राप्त था।
- सोशलिस्ट पार्टी: जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने समाजवाद और समतामूलक समाज की वकालत की।
शुरुआती वर्षों में कांग्रेस के नेता विपक्षी नेताओं का बहुत सम्मान करते थे। नेहरू ने अपनी कैबिनेट में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ. अंबेडकर जैसे विपक्षी विचारधारा के लोगों को शामिल किया था। विपक्ष ने कांग्रेस की तानाशाही प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया और भविष्य के वैकल्पिक नेतृत्व को तैयार किया।
10. प्रमुख व्यक्तित्व: भारतीय राजनीति के शिल्पकार
- सुकुमार सेन: भारत की चुनाव मशीनरी के निर्माता।
- जवाहरलाल नेहरू: आधुनिक भारत के निर्माता और कांग्रेस के करिश्माई नेता।
- सी. राजगोपालाचारी: स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर जनरल और स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक।
- श्यामा प्रसाद मुखर्जी: जनसंघ के संस्थापक, जिन्होंने 'एक विधान, एक निशान, एक प्रधान' का नारा दिया।
- ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद: केरल में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की मज़बूत नींव
भारतीय राजनीति का 'एक दल के प्रभुत्व का दौर' तानाशाही का दौर नहीं, बल्कि 'लोकतांत्रिक सर्वसम्मति' का दौर था। कांग्रेस ने एक ऐसे बरगद के पेड़ की तरह काम किया जिसके नीचे भारतीय लोकतंत्र की छोटी-छोटी पौध (विपक्षी दल) सुरक्षित रहीं और फली-फूलीं। इस दौर ने भारत को एक स्थिर शासन दिया, जिसने राष्ट्र-निर्माण के कठिन कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया। 1967 के बाद यह प्रभुत्व टूटने लगा, लेकिन इस कालखंड ने भारतीय लोकतंत्र के चरित्र को जो मजबूती दी, वह आज भी हमारी राजनीतिक व्यवस्था का आधार है।
