7: क्षेत्रीय आकांक्षाएँ - विविधता और अखंडता के बीच संतुलन
📅 विस्तृत शैक्षणिक नोट्स | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा इसकी भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता को संजोए रखने में रही है। 1980 के दशक को भारतीय राजनीति के इतिहास में 'स्वायत्तता की माँग का दशक' कहा जाता है। यह वह समय था जब नेहरूवादी युग की केंद्रीय सत्ता कमजोर पड़ रही थी और क्षेत्रीय अस्मिताएँ मुखर होकर सामने आ रही थीं। क्षेत्रीय आकांक्षाएँ केवल अलगाववाद का संकेत नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय संघवाद के भीतर अपनी विशिष्ट पहचान और अधिकारों की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति थीं। इस अध्याय में हम जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे, पंजाब के रक्तरंजित संघर्ष, दक्षिण के द्रविड़ गौरव और पूर्वोत्तर की 'सात बहनों' की जटिल राजनीति का विस्तृत और विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे।
1. क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रति भारतीय राज्य का नजरिया
दुनिया के कई राष्ट्रों (विशेषकर यूरोपीय देशों) ने विविधता को राष्ट्र की एकता के लिए खतरा माना और उसे दबाने की कोशिश की। लेकिन भारत ने एक भिन्न और साहसी मार्ग चुना।
लोकतांत्रिक और समावेशी दृष्टिकोण:
- विविधता एक शक्ति: भारत ने विविधता को कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी शक्ति माना। संविधान निर्माताओं ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को 'संवैधानिक मर्यादा' के भीतर अभिव्यक्त करने की अनुमति दी।
- शक्ति का बँटवारा: भारतीय संघवाद में केंद्र को मजबूत रखते हुए भी राज्यों को स्वायत्तता दी गई, ताकि क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित हो सके।
- वार्ता बनाम दमन: भारत सरकार ने अक्सर क्षेत्रीय विद्रोहों को केवल सैन्य बल से दबाने के बजाय 'राजनैतिक समझौते' (Accords) के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया। मिजोरम और पंजाब के शांति समझौते इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
2. जम्मू और कश्मीर: स्वायत्तता, संघर्ष और एकीकरण
जम्मू और कश्मीर का मुद्दा स्वतंत्र भारत की सबसे जटिल राजनैतिक समस्या रहा है। यह मामला तीन स्तरों पर विभाजित है: अंतरराष्ट्रीय (भारत-पाक विवाद), अंतर-क्षेत्रीय (जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के बीच असंतुलन) और राजनैतिक (स्वायत्तता की माँग)।
विलय का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:
1947 में जब ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ, तो कश्मीर के राजा हरि सिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। उन्हें डर था कि पाकिस्तान में शामिल होने से कश्मीर की संस्कृति (कश्मीरियत) नष्ट हो जाएगी और भारत में शामिल होने से उनकी राजशाही खत्म हो जाएगी।
- अक्टूबर 1947 का संकट: पाकिस्तान ने 'कबायली आक्रमण' के माध्यम से कश्मीर पर कब्जा करने की कोशिश की। संकट की स्थिति में राजा हरि सिंह ने भारत से सैन्य सहायता माँगी। भारत ने शर्त रखी कि सहायता केवल 'विलय' के बाद ही दी जाएगी।
- शेख अब्दुल्ला की भूमिका: नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला ने इस विलय का समर्थन किया क्योंकि वे धर्मनिरपेक्ष थे और पाकिस्तान की 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' के विरोधी थे।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा दिया। इसके तहत राज्य का अपना संविधान, अपना झंडा और आंतरिक प्रशासन में पूर्ण स्वायत्तता थी। रक्षा, विदेशी मामले और संचार के अलावा केंद्र का हस्तक्षेप सीमित था। 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए इस अनुच्छेद को निष्प्रभावी कर दिया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया।
उग्रवाद और विस्थापन:
1980 के दशक के उत्तरार्ध में कश्मीर की राजनीति में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति अविश्वास बढ़ा। 1987 के चुनावों में धांधली के आरोपों ने युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेला। 1989 के बाद पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद ने घाटी को अपनी चपेट में ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप कश्मीरी पंडितों को भयानक नरसंहार और पलायन का सामना करना पड़ा।
3. द्रविड़ आंदोलन: सांस्कृतिक गौरव और राजनैतिक बदलाव
द्रविड़ आंदोलन उत्तर भारत के राजनैतिक और भाषाई प्रभुत्व के खिलाफ दक्षिण की सबसे सशक्त आवाज़ थी।
पेरियार और आत्मसम्मान आंदोलन:
ई.वी. रामास्वामी नायकर 'पेरियार' ने तर्क दिया कि द्रविड़ सभ्यता आर्य सभ्यता से श्रेष्ठ और प्राचीन है। उन्होंने ब्राह्मणवादी वर्चस्व और हिंदी भाषा को 'उत्तर भारतीय साम्राज्यवाद' का प्रतीक बताया। उनका 'आत्मसम्मान आंदोलन' पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए समर्पित था।
जब 1965 में केंद्र सरकार ने हिंदी को आधिकारिक राजभाषा बनाने का निर्णय लिया, तो तमिलनाडु में आग लग गई। छात्रों ने भीषण विरोध प्रदर्शन किए और कई ने आत्मदाह तक किया। इसी आंदोलन ने सी. अन्नादुरै और उनकी पार्टी DMK को तमिलनाडु की सत्ता के केंद्र में ला खड़ा किया। आज भी तमिलनाडु की राजनीति में राष्ट्रीय दलों के बजाय द्रविड़ दलों (DMK और AIADMK) का ही बोलबाला है।
4. पंजाब संकट: 'खालिस्तान' का साया और शांति की बहाली
पंजाब की समस्या आर्थिक समृद्धि और धार्मिक पहचान के बीच के द्वंद्व का परिणाम थी।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973):
अकाली दल ने पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता और चंडीगढ़ को पूरी तरह पंजाब को सौंपने की माँग की। हालांकि यह एक राजनैतिक माँग थी, लेकिन धीरे-धीरे इसमें 'खालिस्तान' (एक अलग सिख राष्ट्र) की उग्र आवाज़ें जुड़ने लगीं।
ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके परिणाम:
- जरनैल सिंह भिंडरावाले: 1980 के दशक में उग्रवाद बढ़ा और उग्रवादियों ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को अपना मुख्यालय बना लिया।
- जून 1984: स्वर्ण मंदिर को उग्रवादियों से मुक्त कराने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' का आदेश दिया। इस सैन्य कार्रवाई में मंदिर को क्षति पहुँची, जिससे सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं।
- 31 अक्टूबर 1984: इसी आक्रोश के चलते इंदिरा गांधी की उनके ही सिख सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्या कर दी गई, जिसके बाद दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में भीषण सिख-विरोधी दंगे भड़के।
तनाव को कम करने के लिए राजीव गांधी ने अकाली नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ ऐतिहासिक समझौता किया। इसमें चंडीगढ़ को पंजाब को देने, जल विवाद सुलझाने और उग्रवाद प्रभावितों को न्याय देने का वादा किया गया। 1990 के दशक के मध्य तक पंजाब में शांति बहाल हुई और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ पुनः स्थापित हुईं।
5. पूर्वोत्तर भारत: सात बहनों की रणनीतिक और जातीय चुनौतियाँ
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र (Seven Sisters) जातीय विविधता और भौगोलिक अलगाव के कारण हमेशा से संवेदनशील रहा है। यहाँ की राजनीति तीन मुख्य स्तंभों पर टिकी है: स्वायत्तता, अलगाववाद और बाहरी लोगों का विरोध।
I. स्वायत्तता की माँग (मिजोरम और मेघालय):
जब असम सरकार ने गैर-असमी क्षेत्रों पर असमी भाषा थोपने की कोशिश की, तो जनजातीय समुदायों ने विरोध किया। 1960 के 'ऑल पार्टी हिल्स कॉन्फ्रेंस' के कारण मेघालय और बाद में मिजोरम व अरुणाचल प्रदेश जैसे नए राज्यों का जन्म हुआ।
II. अलगाववाद (नगालैंड और मिजोरम):
- नगालैंड: 1951 से ही अंगमी जापू फिज़ो के नेतृत्व में नगा लोग आज़ादी की माँग कर रहे थे। यह भारत का सबसे पुराना अलगाववादी आंदोलन है।
- मिजोरम: लालडेंगा के नेतृत्व में MNF (मिजो नेशनल फ्रंट) ने दशकों तक सशस्त्र युद्ध लड़ा। लेकिन 1986 में राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच हुए समझौते ने मिजोरम को भारत का सबसे शांत और विकसित राज्य बना दिया।
III. बाहरी लोगों के खिलाफ आंदोलन (असम):
असम के लोगों को डर था कि बांग्लादेश से आ रहे अवैध प्रवासियों के कारण वे अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक हो जाएंगे। छात्र संगठन AASU ने 1979-1985 तक विशाल आंदोलन चलाया। अंततः 1985 के 'असम समझौते' के तहत 1971 के बाद आए लोगों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने का निर्णय लिया गया।
6. सिक्किम और गोवा: भारतीय संघ की पूर्णता
आज़ादी के समय भारत की सीमाओं के भीतर कुछ ऐसे क्षेत्र थे जो तकनीकी रूप से भारत का हिस्सा नहीं थे।
- सिक्किम (1975): सिक्किम भारत का एक 'संरक्षित राज्य' (Protectorate) था। यहाँ के राजा चोग्याल के दमनकारी शासन के विरुद्ध जनता ने विद्रोह किया। 1974 के चुनाव में 'सिक्किम कांग्रेस' की भारी जीत और जनमत संग्रह के बाद, सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना।
- गोवा (1961): गोवा पुर्तगाली शासन के अधीन था। जब कूटनीति विफल रही, तो भारत सरकार ने 'ऑपरेशन विजय' चलाकर सैन्य कार्रवाई की और गोवा को आज़ाद कराया। 1987 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
7. क्षेत्रीय आकांक्षाओं से मिले ऐतिहासिक सबक
भारत की क्षेत्रीय राजनीति हमें पाँच महत्वपूर्ण शिक्षाएँ देती है:
- क्षेत्रीय माँगे लोकतंत्र का हिस्सा हैं: इन्हें दबाना नहीं, बल्कि समझना चाहिए।
- संवैधानिक लचीलापन: भारत के संविधान में राज्यों को विशेष अधिकार (जैसे नगालैंड को 371 के तहत) देने की व्यवस्था ने देश को टूटने से बचाया है।
- सत्ता की साझेदारी: केंद्र में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका (Coalition Era) ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है।
- वार्ता की शक्ति: हिंसा का समाधान बंदूकों में नहीं, बल्कि मेज पर बैठकर बातचीत करने में है।
- आर्थिक विकास: अलगाववाद की जड़ें अक्सर गरीबी और पिछड़ेपन में होती हैं। संतुलित क्षेत्रीय विकास ही अलगाववाद का सबसे बड़ा इलाज है।
निष्कर्ष: एक जीवंत और सशक्त भारत
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ भारत के टूटने का संकेत नहीं, बल्कि हमारे परिपक्व होते लोकतंत्र का प्रमाण हैं। भारत की खूबसूरती इसी में है कि यहाँ एक व्यक्ति गर्व से कह सकता है कि वह 'कश्मीरी' भी है और 'भारतीय' भी, 'तमिल' भी है और 'भारतीय' भी। हमारी संघीय प्रणाली ने यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय गौरव एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। भविष्य की चुनौती यह है कि हम क्षेत्रीय पहचान को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय अखंडता को और अधिक सुदृढ़ करें।
