स्वतंत्र भारत में राजनीति: 6. लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट - आपातकाल (1975-77)

स्वतंत्र भारत में राजनीति: लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट - आपातकाल (1975-77)
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5: लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट - आपातकाल (1975-77)

स्वतंत्र भारत में राजनीति: लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट - आपातकाल (1975-77)

भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में 25 जून 1975 की आधी रात एक ऐसी तारीख है जिसे 'लोकतंत्र का काला अध्याय' माना जाता है। यह वह समय था जब स्वतंत्र भारत में पहली बार नागरिक अधिकारों को पूरी तरह निलंबित कर दिया गया और पूरी सत्ता एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो गई। यह संकट रातों-रात पैदा नहीं हुआ था; इसके पीछे आर्थिक बदहाली, छात्र आंदोलनों की आग और न्यायपालिका के साथ सरकार का बढ़ता टकराव जिम्मेदार था। यह अध्याय न केवल आपातकाल की ज्यादतियों का विवरण देता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि लोकतंत्र की असली रक्षा संस्थाओं की मजबूती और नागरिकों की जागरूकता में निहित है। इस विस्तृत लेख में हम आपातकाल की पृष्ठभूमि, इसके काले दिनों और इसके द्वारा छोड़ी गई अमिट विरासत का विश्लेषण करेंगे।


1. संकट की गहरी जड़ें: आर्थिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि

1971 के चुनावों में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया था और भारी बहुमत हासिल किया था। उसी वर्ष भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीता, जिससे इंदिरा की लोकप्रियता शिखर पर थी। लेकिन जल्द ही स्थितियां बदलने लगीं।

आर्थिक चुनौतियाँ:

  • युद्ध का बोझ: 1971 के युद्ध और बांग्लादेश से आए 80 लाख शरणार्थियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला।
  • तेल संकट (1973): अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई, जिससे भारत में महंगाई दर 1974 तक 30% पहुँच गई। आम जनता का जीवन दूभर हो गया।
  • मानसून की विफलता: कृषि पैदावार में कमी और औद्योगिक विकास की धीमी गति ने बेरोजगारी को चरम पर पहुँचा दिया।
  • वेतन रोक: सरकार ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों पर रोक लगा दी, जिससे मध्य वर्ग में भारी रोष व्याप्त हुआ।
🚩 नक्सलवादी आंदोलन का उभार:
आर्थिक बदहाली के इसी दौर में 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से चारु मजूमदार के नेतृत्व में एक हिंसक आंदोलन शुरू हुआ। इन 'नक्सलवादियों' ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को नकारा और 'गुरिल्ला युद्ध' के जरिए अमीरों की जमीन छीनकर गरीबों में बांटने का रास्ता चुना। इसे दबाने के लिए सरकार ने कड़े सैन्य कदम उठाए।

2. जन-आंदोलनों की ज्वाला: गुजरात और बिहार

आर्थिक संकट ने जनता के सब्र का बाँध तोड़ दिया। इसकी शुरुआत छात्रों के नेतृत्व में हुए दो बड़े आंदोलनों से हुई।

गुजरात आंदोलन (Navnirman Movement):

जनवरी 1974 में गुजरात के छात्रों ने बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। मोरारजी देसाई ने विधानसभा भंग करने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल की। दबाव में आकर सरकार ने विधानसभा भंग की और जून 1975 के चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई।

बिहार आंदोलन और जयप्रकाश नारायण (JP):

गुजरात की तर्ज पर बिहार में भी छात्रों ने आंदोलन शुरू किया और नेतृत्व के लिए गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण को आमंत्रित किया। जेपी ने सक्रिय राजनीति छोड़ दी थी, लेकिन छात्रों के आग्रह पर वे वापस आए।

  • सम्पूर्ण क्रांति (Total Revolution): जेपी ने नारा दिया— "सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है।" उनका लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक ढांचे में आमूलचूल बदलाव था।
  • रेलवे हड़ताल (1974): जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों ने बोनस और सेवा शर्तों के लिए राष्ट्रव्यापी हड़ताल की। सरकार ने इसे गैर-कानूनी घोषित कर हज़ारों कर्मियों को जेल में डाल दिया।

3. न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका: संवैधानिक संघर्ष

आपातकाल से पहले सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तीन मुख्य मुद्दों पर खींचतान चल रही थी:

  1. क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? (सुप्रीम कोर्ट ने कहा— नहीं)।
  2. क्या संसद संपत्ति के अधिकार में संशोधन कर सकती है? (सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ भी रोक लगाई)।
  3. संसद ने तर्क दिया कि 'नीति निर्देशक तत्वों' को लागू करने के लिए मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।
⚖️ प्रतिबद्ध न्यायपालिका (Committed Judiciary):
1973 में सरकार ने 'केशवानंद भारती' केस के बाद वरिष्ठता के सिद्धांत को दरकिनार करते हुए न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। सरकार का मानना था कि न्यायपालिका को सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीतियों के प्रति 'प्रतिबद्ध' होना चाहिए। इस कदम की भारी आलोचना हुई।

राज नारायण मामला: अंतिम प्रहार

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। उन्होंने राज नारायण की याचिका पर इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को 'असंवैधानिक' करार दिया क्योंकि उन्होंने चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था। इसका अर्थ था कि अब वे प्रधानमंत्री पद पर नहीं रह सकती थीं।


4. आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975)

हाईकोर्ट के फैसले और जेपी द्वारा रामलीला मैदान में दी गई इस्तीफे की चेतावनी के बाद, इंदिरा गांधी ने कड़ा रुख अपनाया। 25 जून की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को सिफारिश भेजकर **अनुच्छेद 352** के तहत 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) के आधार पर देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।

आपातकाल की काली रात और ज्यादतियां:

  • नेताओं की गिरफ्तारी: जेपी, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी जैसे हज़ारों नेताओं को रातभर में 'निवारक नजरबंदी' (Preventive Detention) के तहत जेलों में ठूँस दिया गया।
  • प्रेस सेंसरशिप: अखबारों की बिजली काट दी गई। अब कुछ भी छापने से पहले सरकार की अनुमति अनिवार्य थी। 'इंडियन एक्सप्रेस' और 'स्टेट्समैन' ने सेंसरशिप के विरोध में अपने संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिए।
  • संजय गांधी का 5-सूत्री कार्यक्रम: इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी ने बिना किसी संवैधानिक पद के सत्ता का संचालन किया। उन्होंने 'जबरन नसबंदी' और दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों (तुर्कमान गेट) के विध्वंस जैसे विवादास्पद कार्यक्रम चलाए।
  • प्रतिबंध: RSS और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

5. शाह जाँच आयोग और आपातकाल के सबक

1977 में जब नई सरकार आई, तो उसने आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच के लिए **जस्टिस जे.सी. शाह** की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया।

आयोग के निष्कर्ष:

  • आपातकाल लागू करने के लिए कोई वास्तविक 'आंतरिक खतरा' मौजूद नहीं था।
  • सत्ता का दुरुपयोग केवल एक व्यक्ति की कुर्सी बचाने के लिए किया गया था।
  • सेंसरशिप और पुलिस की बर्बरता पूरी तरह से गैर-वाजिब थी।
💡 लोकतंत्र के सबक:
1. भारत में लोकतंत्र को खत्म करना अब लगभग असंभव है क्योंकि जनता ने इसकी कीमत जान ली है।
2. 44वां संविधान संशोधन: संविधान में 'आंतरिक अशांति' की जगह 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द जोड़ा गया ताकि भविष्य में कोई इसका दुरुपयोग न कर सके। साथ ही, आपातकाल के लिए कैबिनेट की लिखित सलाह अनिवार्य की गई।
3. नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी और 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' (PUCL) जैसे संगठनों का जन्म हुआ।

6. 1977 का चुनाव: भारतीय लोकतंत्र का 'जनमत संग्रह'

18 महीने बाद, जनवरी 1977 में चुनाव घोषित हुए। यह चुनाव साधारण चुनाव नहीं था, बल्कि इंदिरा गांधी के शासन पर जनता का फैसला था।

जनता पार्टी का गठन:

कांग्रेस के विरोध में सभी प्रमुख दल (जनसंघ, सोशलिस्ट, भारतीय लोकदल, कांग्रेस-ओ) एकजुट हुए और **'जनता पार्टी'** बनाई। कांग्रेस के दिग्गज नेता जगजीवन राम ने भी अपनी अलग पार्टी बनाई जो बाद में इसमें शामिल हो गई।

  • नारा: विपक्ष ने एक ही शक्तिशाली नारा दिया— "लोकतंत्र बचाओ"
  • मुद्दा: चुनाव का मुख्य मुद्दा नसबंदी, गिरफ्तारी और प्रेस की आज़ादी थी।
📊 1977 के परिणाम:
परिणाम ऐतिहासिक थे। आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस केंद्र में हारी। उसे मात्र 154 सीटें मिलीं। जनता पार्टी ने 295 सीटें (सहयोगियों के साथ 330) जीतकर स्पष्ट बहुमत पाया। इंदिरा गांधी रायबरेली से और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए।

7. पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का उत्थान और पतन

मार्च 1977 में मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। उनके साथ दो उप-प्रधानमंत्री बनाए गए— चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम।

विफलता के कारण:

  • नेतृत्व की होड़: तीनों दिग्गजों के बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर निरंतर खींचतान चलती रही।
  • साझे विजन का अभाव: यह गठबंधन केवल 'इंदिरा विरोध' पर टिका था। इनके पास देश के विकास के लिए कोई ठोस योजना नहीं थी।
  • पतन: 18 महीने में देसाई सरकार गिर गई। इसके बाद चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से पीएम बने, लेकिन 4 महीने बाद इंदिरा ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार ढह गई।
🔄 1980 की वापसी: 1980 के मध्यावधि चुनावों में जनता ने 'गठबंधन की अस्थिरता' को नकार दिया। इंदिरा गांधी ने नारा दिया— "वह चुनो जो सरकार चला सके" और वे 353 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत से वापस आईं।

8. आपातकाल की नई राजनैतिक विरासत

1975-77 के दौर ने भारतीय राजनीति के ढांचे को हमेशा के लिए बदल दिया:

  1. पिछड़े वर्गों का उदय (OBC Politics): जनता पार्टी के शासन के दौरान ही **मंडल आयोग** की नियुक्ति हुई। उत्तर भारत में पिछड़ी जातियों के नेताओं का राजनीतिक दबदबा बढ़ गया।
  2. कांग्रेस की प्रकृति में बदलाव: कांग्रेस अब एक 'समावेशी मंच' के बजाय एक 'व्यक्तिगत विचारधारा' वाली पार्टी बन गई। वह केवल इंदिरा गांधी के नाम और छवि पर टिक गई।
  3. गैर-कांग्रेसवाद का सूत्र: विपक्षी दलों ने सीख लिया कि यदि कांग्रेस को हराना है, तो उनके वोटों का बिखराव रुकना चाहिए। आज के आधुनिक गठबंधनों की नींव यहीं रखी गई थी।
  4. प्रेस की आज़ादी: मीडिया ने महसूस किया कि उसे सत्ता के सामने झुकना नहीं चाहिए। यह दौर पत्रकारिता के लिए एक बड़ा सबक साबित हुआ।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की मज़बूत जड़ें

आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक 'टीका' (Vaccine) साबित हुआ। इसने थोड़े समय के लिए शरीर (सिस्टम) को बीमार किया, लेकिन भविष्य के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा दी। इस संकट ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत जैसे विविध देश में तानाशाही टिक नहीं सकती। 1977 का चुनाव यह संदेश देता है कि जब शासक जनता की आवाज़ सुनना बंद कर देते हैं, तो जनता बैलेट बॉक्स (मतपेटी) के माध्यम से उन्हें उनकी जगह दिखा देती है।

💡 सारांश: लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट केवल एक राजनैतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह भारतीय नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा थी। आज हम जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं, वह उन लाखों लोगों के संघर्ष का परिणाम है जिन्होंने 1975 के अंधेरे में लोकतंत्र की मशाल जलाए रखी।