3: नियोजित विकास की राजनीति - आधुनिक भारत का आर्थिक खाका
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करना था जो सदियों के औपनिवेशिक शोषण से जर्जर हो चुकी थी। राष्ट्र-निर्माण और लोकतंत्र की स्थापना के साथ-साथ 'विकास' एक ऐसा साझा सपना था जिसे हर भारतीय साकार होते देखना चाहता था। लेकिन विकास का अर्थ क्या है? क्या यह केवल सड़कों और उद्योगों का निर्माण है या फिर समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा और स्वास्थ्य पहुँचाना? इन्हीं बुनियादी सवालों ने 'नियोजित विकास की राजनीति' को जन्म दिया। भारत ने विकास के लिए किसी एक पश्चिमी मॉडल को आँख मूँदकर अपनाने के बजाय 'नियोजन' (Planning) का कठिन लेकिन समावेशी मार्ग चुना। इस लेख में हम भारत की आर्थिक यात्रा, योजना आयोग से नीति आयोग तक के सफर और कृषि बनाम उद्योग जैसे महत्वपूर्ण वैचारिक संघर्षों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
1. विकास की अवधारणा: अर्थ और आधुनिकता
विकास एक बहुआयामी और सापेक्ष अवधारणा है। सामान्य शब्दों में इसका अर्थ है— स्थितियों का पहले से बेहतर होना। लेकिन यह 'बेहतरी' किसके लिए है, यह राजनीति का मुख्य प्रश्न है।
विकास के विभिन्न आयाम:
- आर्थिक वृद्धि: जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय और औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि।
- सामाजिक न्याय: संसाधनों का समान वितरण और गरीबी उन्मूलन।
- आधुनिकीकरण: तकनीक का उपयोग और पारंपरिक सामाजिक रूढ़ियों का अंत।
एक व्यक्ति के लिए जो विकास है (जैसे—नदी पर बड़ा बाँध बनाना), वह दूसरे के लिए विनाशकारी हो सकता है (जैसे—बाँध के कारण विस्थापित होने वाले ग्रामीण और आदिवासी)। इसलिए विकास की राजनीति हमेशा 'हितों के टकराव' की राजनीति होती है।
2. विकास के दो मॉडल और भारत का चुनाव
आज़ादी के समय विश्व वैचारिक रूप से दो गुटों में बंटा था, और दोनों के पास विकास के अलग-अलग मॉडल थे:
I. उदारवादी-पूँजीवादी मॉडल (Capitalist Model)
यह अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में प्रचलित था। इसमें निजी संपत्ति, मुक्त व्यापार और कम-से-कम सरकारी हस्तक्षेप पर जोर दिया गया था। माना जाता था कि बाज़ार की शक्तियाँ अपने आप विकास सुनिश्चित कर देंगी।
II. समाजवादी मॉडल (Socialist Model)
यह सोवियत संघ (USSR) का मॉडल था। इसमें निजी संपत्ति का अभाव था और पूरी अर्थव्यवस्था राज्य के नियंत्रण में थी। भारत के कई नेता, जिनमें जवाहरलाल नेहरू प्रमुख थे, इस मॉडल से प्रभावित थे क्योंकि यह सामाजिक समानता और निर्धनता निवारण को प्राथमिकता देता था।
भारत ने न तो पूरी तरह पूँजीवाद को अपनाया और न ही साम्यवाद को। हमने एक बीच का रास्ता चुना जिसे 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' कहा गया। इसके तहत खेती, व्यापार और लघु उद्योग निजी हाथों में रहे, जबकि भारी उद्योग, रक्षा, और बुनियादी ढांचा सरकार (सार्वजनिक क्षेत्र) के नियंत्रण में रखा गया।
3. नियोजन (Planning) और उसकी अनिवार्यता
नियोजन का अर्थ है— उपलब्ध संसाधनों का कुशलतापूर्वक अनुमान लगाना और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न लक्ष्यों के लिए आवंटित करना।
भारत में नियोजन की प्रेरणा:
- औपनिवेशिक विरासत: अंग्रेजों ने भारतीय धन का निष्कासन किया था, जिससे उबरने के लिए सुनियोजित प्रयास जरूरी थे।
- सोवियत प्रभाव: 1930 की वैश्विक मंदी के समय सोवियत संघ ने नियोजन के बल पर शानदार प्रगति की थी।
- बॉम्बे प्लान (1944): भारत के आठ बड़े उद्योगपतियों ने मिलकर एक प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें कहा गया था कि सरकार को अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। यह आश्चर्यजनक था कि उद्योगपति स्वयं सरकारी नियंत्रण की मांग कर रहे थे।
4. योजना आयोग और पंचवर्षीय योजनाएँ
विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए 15 मार्च 1950 को एक 'गैर-संवैधानिक' और 'परामर्शदात्री' निकाय के रूप में **योजना आयोग** की स्थापना की गई।
- प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56): इसका मुख्य जोर कृषि पर था। के.एन. राज जैसे युवा अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया कि भारत को पहले अपनी खेती मजबूत करनी चाहिए। भाखड़ा-नंगल जैसे बड़े बाँध इसी दौरान बने।
- द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61): इसका मुख्य लक्ष्य तीव्र औद्योगिकीकरण था। पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में भारी उद्योगों (जैसे इस्पात संयंत्र) पर निवेश किया गया। विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाए गए।
- तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66): इसमें कृषि और उद्योग दोनों को संतुलित करने की कोशिश की गई, लेकिन चीन युद्ध (1962) और पाकिस्तान युद्ध (1965) के कारण यह योजना विफल रही।
5. वैचारिक बहस: कृषि बनाम उद्योग
नियोजन के शुरुआती वर्षों में एक बड़ा विवाद उठा कि संसाधनों का बड़ा हिस्सा खेती को मिलना चाहिए या कारखानों को?
कृषि के समर्थक (चौधरी चरण सिंह):
उनका तर्क था कि भारत गाँवों का देश है। यदि सरकार उद्योगों पर अधिक खर्च करेगी, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी और केवल शहरी मध्यम वर्ग समृद्ध होगा। उन्होंने 'ग्रामीण औद्योगिकीकरण' की वकालत की।
उद्योग के समर्थक:
नेहरूवादी समर्थकों का मानना था कि बिना भारी उद्योगों के भारत कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगा। गरीबी का चक्र तोड़ने के लिए आधुनिक तकनीक और बड़े कारखाने अनिवार्य हैं। उनका मानना था कि औद्योगिक विकास से होने वाला लाभ अंततः कृषि क्षेत्र तक भी पहुँचेगा (Trickle-down effect)।
6. विकेंद्रित नियोजन: केरल मॉडल
नियोजन केवल दिल्ली में बैठकर नहीं किया जा सकता। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण 'केरल मॉडल' है। केरल ने बड़ी विकास परियोजनाओं के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य और भूमि सुधार को प्राथमिकता दी।
- केरल में प्रति व्यक्ति आय कम होने के बावजूद साक्षरता दर 100% के करीब है।
- यहाँ शिशु मृत्यु दर और जन्म दर विकसित देशों के समान कम है।
- 1987-91 के बीच 'नव लोकतांत्रिक पहल' के जरिए पंचायत स्तर पर योजनाओं को तैयार करने में जनता की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की गई।
7. भूमि सुधार और खाद्यान्न संकट
आज़ादी के बाद कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए भूमि सुधारों की घोषणा की गई। इसके तीन मुख्य अंग थे:
- ज़मींदारी उन्मूलन: सदियों पुरानी शोषक प्रथा का अंत।
- चकबंदी: छोटे और बिखरे हुए खेतों को एक जगह इकट्ठा करना ताकि खेती वैज्ञानिक तरीके से हो सके।
- हदबंदी (Land Ceiling): एक व्यक्ति के पास अधिकतम जमीन की सीमा तय करना।
हालांकि, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण हदबंदी कानून कागजों तक ही सीमित रहा, क्योंकि बड़े भू-स्वामियों ने अपनी जमीनें रिश्तेदारों के नाम करवा दीं।
1965 और 1966 में भयंकर सूखे के कारण भारत में अकाल जैसी स्थिति पैदा हो गई। भारत को अमेरिका से पीएल-480 (PL-480) योजना के तहत गेहूं आयात करना पड़ा। अमेरिका ने इसके बदले भारत पर अपनी विदेश नीति बदलने का दबाव बनाया। इस अपमान ने भारत को कृषि क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर' बनने के लिए प्रेरित किया।
8. हरित क्रांति (Green Revolution): एक नया मोड़
खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए सरकार ने कृषि में एक नई रणनीति अपनाई। एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में उच्च उत्पादकता वाले बीजों (HYV), उर्वरकों और सिंचाई पर ध्यान दिया गया।
हरित क्रांति के परिणाम:
- सकारात्मक: भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की आय में भारी वृद्धि हुई।
- नकारात्मक: क्षेत्रीय असमानता बढ़ी (उत्तर भारत अमीर हुआ, पूर्वी भारत पिछड़ गया)। सामाजिक असमानता भी बढ़ी क्योंकि बड़े किसानों को अधिक लाभ हुआ। अत्यधिक रसायनों के उपयोग से मिट्टी और पानी की गुणवत्ता खराब हुई।
9. श्वेत क्रांति (White Revolution) और डॉ. वर्गीज कूरियन
भारत में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में आई क्रांति को श्वेत क्रांति कहा जाता है। इसे 'ऑपरेशन फ्लड' के नाम से भी जाना जाता है।
- मिल्कमैन ऑफ इंडिया: डॉ. वर्गीज कूरियन ने गुजरात के 'आनंद' में 'अमूल' (Amul) की नींव रखी।
- सहकारी मॉडल: इसमें लाखों दूध उत्पादक किसानों को एक साथ जोड़ा गया, जिससे बिचौलियों का अंत हुआ और किसानों को उचित मूल्य मिला। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।
10. योजना आयोग से नीति आयोग तक का सफर
समय के साथ महसूस किया गया कि पुराने योजना आयोग का ढांचा 21वीं सदी की बदलती जरूरतों के अनुकूल नहीं है।
1 जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर 'नीति आयोग' (National Institution for Transforming India) बनाया गया। यह सरकार के लिए एक 'थिंक टैंक' के रूप में काम करता है। जहाँ योजना आयोग 'ऊपर से नीचे' (Top-down) चलता था, वहीं नीति आयोग 'नीचे से ऊपर' (Bottom-up) दृष्टिकोण और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) पर जोर देता है।
निष्कर्ष: नियोजित विकास का मूल्यांकन
भारत की नियोजित विकास की यात्रा सफलताओं और विफलताओं का मिश्रण रही है। जहाँ हम खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बने और अंतरिक्ष व परमाणु शक्ति जैसी ऊंचाइयों को छुआ, वहीं गरीबी और क्षेत्रीय असमानता आज भी गंभीर चुनौतियाँ हैं। नियोजन ने भारत को एक मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र दिया, जिसने निजी क्षेत्र को भी फलने-फूलने का आधार प्रदान किया। आज जब हम 'विकसित भारत' का सपना देखते हैं, तो हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय को कितनी मजबूती से जोड़ पाते हैं।
