समकालीन विश्व राजनीति: 6.पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन - राजनीति और वैश्विक सरोकार

समकालीन विश्व राजनीति: पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन - राजनीति और वैश्विक सरोकार
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6: पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन - वैश्विक राजनीति का नया आयाम

समकालीन विश्व राजनीति: पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन - राजनीति और वैश्विक सरोकार

पर्यावरण शब्द दो शब्दों 'परि' और 'आवरण' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है वह आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। परंपरागत रूप से पर्यावरण को जीवविज्ञान या भूगोल का विषय माना जाता था, लेकिन 1960 के दशक के बाद यह 'उच्च राजनीति' (High Politics) का हिस्सा बन गया। इसका मुख्य कारण यह था कि अंधाधुंध आर्थिक विकास ने पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों को इस कदर नुकसान पहुँचाया कि अब मानव अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा है। ओजोन परत में छेद, ग्लोबल वार्मिंग और घटते वन क्षेत्रों ने दुनिया के नेताओं को एक मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। इस अध्याय में हम पर्यावरण से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधियों, उत्तर-दक्षिण विवाद, साझी संपदा की सुरक्षा और संसाधनों की भू-राजनीति का व्यापक विश्लेषण करेंगे।


1. राजनीति के विषय के रूप में पर्यावरण: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पर्यावरण को वैश्विक एजेंडे पर लाने के लिए कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर स्थापित किए गए। इन प्रयासों ने दर्शाया कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक वैश्विक अनिवार्य कर्तव्य है।

महत्वपूर्ण संधियाँ और रिपोर्टें:

  • अंटार्कटिका संधि (1959): यह पहली प्रमुख संधि थी जिसने एक पूरे महाद्वीप को सैन्य गतिविधियों से मुक्त कर 'साझी विरासत' घोषित किया। इसे केवल वैज्ञानिक अनुसंधान और शांतिपूर्ण कार्यों तक सीमित रखा गया।
  • क्लब ऑफ रोम (1972): विद्वानों के इस समूह ने 'लिमिट्स टू ग्रोथ' (विकास की सीमाएं) नामक पुस्तक प्रकाशित की। इसने पहली बार चेतावनी दी कि यदि जनसंख्या और संसाधन दोहन की वर्तमान दर जारी रही, तो पृथ्वी के संसाधन जल्द ही समाप्त हो जाएंगे।
  • स्टॉकहोम सम्मेलन (1972): इसे 'मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' कहा जाता है। यहीं से 'एक ही पृथ्वी' का नारा बुलंद हुआ और 5 जून को 'विश्व पर्यावरण दिवस' मनाने की परंपरा शुरू हुई।
🌍 सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development):
1987 की 'बर्टलैंड रिपोर्ट' (अवर कॉमन फ्यूचर) ने इस क्रांतिकारी विचार को जन्म दिया। इसका अर्थ है—ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करे, लेकिन आने वाली पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझौता न करे। इसने आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की वकालत की।

2. रियो सम्मेलन (1992): पृथ्वी सम्मेलन का युग

ब्राजील के रियो डी जनेरियो में आयोजित यह सम्मेलन पर्यावरण राजनीति के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। इसमें 170 देशों के प्रतिनिधियों और हजारों एनजीओ ने भाग लिया।

सम्मेलन की मुख्य उपलब्धियाँ:

  • एजेंडा-21: यह 21वीं सदी के लिए विकास और पर्यावरण के बीच तालमेल बिठाने की एक विस्तृत कार्ययोजना थी। हालांकि यह बाध्यकारी नहीं थी, लेकिन इसने वैश्विक नीति निर्माण को गहराई से प्रभावित किया।
  • जलवायु परिवर्तन नियमाचार (UNFCCC): यहाँ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए एक ढांचा तैयार किया गया।
  • जैव-विविधता और वानिकी सिद्धांत: वनों के संरक्षण और पृथ्वी पर मौजूद विभिन्न प्रजातियों की रक्षा के लिए कुछ नियम तय किए गए।
⚠️ उत्तर-दक्षिण विवाद (North-South Divide):
रियो सम्मेलन में एक गहरा वैचारिक मतभेद उभरा। विकसित देश (उत्तरी गोलार्द्ध) ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन परत जैसे मुद्दों पर चिंतित थे, जबकि विकासशील देश (दक्षिणी गोलार्द्ध) गरीबी उन्मूलन और अपने आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को प्राथमिकता देना चाहते थे। विकासशील देशों का तर्क था कि वर्तमान प्रदूषण के लिए विकसित देश ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार हैं, इसलिए उन्हें सुधार के लिए अधिक वित्तीय बोझ उठाना चाहिए।

3. साझी संपदा और साझी परंतु भिन्न जिम्मेदारियाँ (CBDR)

साझी संपदा (Global Commons) उन संसाधनों को कहते हैं जिन पर किसी एक राष्ट्र का संप्रभु अधिकार नहीं होता, बल्कि वे पूरी मानवता की धरोहर होते हैं। इसमें अंटार्कटिका, बाहरी अंतरिक्ष, समुद्री सतह और पृथ्वी का वायुमंडल शामिल हैं।

CBDR का सिद्धांत (Common But Differentiated Responsibilities):

यह सिद्धांत रियो सम्मेलन में स्वीकार किया गया। इसके दो मुख्य आधार हैं:

  1. साझी जिम्मेदारी: पर्यावरण को बचाना सभी देशों का साझा लक्ष्य है क्योंकि पृथ्वी का पारिस्थितिकी तंत्र एक है।
  2. भिन्न जिम्मेदारी: चूँकि विकसित देशों ने औद्योगिक क्रांति के दौरान सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित की हैं, इसलिए उन्हें पर्यावरण सुधार के लिए अधिक तकनीक और पैसा देना चाहिए। विकासशील देशों (जैसे भारत और चीन) को उनके विकास की जरूरतों को देखते हुए कुछ रियायतें मिलनी चाहिए।
📜 क्योटो प्रोटोकॉल (1997):
यह एक अंतरराष्ट्रीय समझौता था जिसने औद्योगिक देशों के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए 'कानूनी रूप से बाध्यकारी' लक्ष्य निर्धारित किए। भारत और चीन को इसके प्रारंभिक चरण में छूट दी गई थी क्योंकि उनका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में बहुत कम था।

4. पर्यावरण संरक्षण के वैश्विक प्रयास: क्योटो से पेरिस तक

रियो के बाद भी दुनिया भर में पर्यावरण को लेकर कई महत्वपूर्ण बैठकें हुईं:

  • जोहांसबर्ग सम्मेलन (2002): इसे 'रियो+10' भी कहा जाता है। इसमें गरीबी उन्मूलन और सतत विकास पर विशेष जोर दिया गया।
  • पेरिस समझौता (2015): यह एक ऐतिहासिक समझौता है जिसका लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक काल के पूर्व के स्तर से 2°C (अधिमानतः 1.5°C) से अधिक नहीं बढ़ने देना है। भारत ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और 2016 में इस पर हस्ताक्षर किए।
  • माराकेश सम्मेलन (2016): इसमें पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विकासशील देशों को वित्तीय सहायता देने के तौर-तरीकों पर चर्चा हुई।

5. पर्यावरण सुरक्षा में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका

भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझी परंतु भिन्न जिम्मेदारियों के सिद्धांत की वकालत की है। घरेलू स्तर पर भी भारत ने कई कड़े कदम उठाए हैं:

भारत की प्रमुख पहलें:

  • ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (2001): बिजली के किफायती उपयोग के लिए कानूनी ढांचा तैयार किया गया।
  • राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT - 2010): पर्यावरण से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए एक विशेष अदालत की स्थापना की गई।
  • अक्षय ऊर्जा मंत्रालय: भारत दुनिया का पहला देश है जिसने नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया।
  • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): भारत और फ्रांस ने मिलकर कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित धूप वाले देशों का एक संगठन बनाया है, जिसका मुख्यालय गुरुग्राम (भारत) में है।
  • इलेक्टिक वाहन और स्वच्छ ईंधन: भारत ने 2030 तक अपनी उत्सर्जन तीव्रता को 33-35% तक कम करने का संकल्प लिया है।

6. संसाधनों की भू-राजनीति (Resource Geopolitics)

भू-राजनीति का अर्थ है—"किसे, क्या, कब और कैसे हासिल होता है।" इतिहास गवाह है कि अधिकांश वैश्विक संघर्ष प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए हुए हैं।

संसाधनों के आधार पर संघर्ष:

  • इमारती लकड़ी (Timber): औपनिवेशिक काल में यूरोपीय देशों ने अपनी नौसेना को मजबूत करने के लिए एशिया और अफ्रीका के घने जंगलों पर कब्जा किया।
  • तेल (Oil): 20वीं सदी की राजनीति 'तेल की राजनीति' रही है। खाड़ी देशों में तेल के विशाल भंडारों पर नियंत्रण के लिए महाशक्तियों ने कई बार सैन्य हस्तक्षेप किया है। तेल की निर्बाध आपूर्ति आज भी वैश्विक सुरक्षा का मुख्य मुद्दा है।
  • जल (Water): भविष्य में युद्ध पानी के लिए होने की आशंका है। इसे 'जल युद्ध' (Water Wars) कहा जाता है। जॉर्डन नदी के पानी के लिए इजराइल, जॉर्डन और सीरिया के बीच विवाद, और सिंधु व ब्रह्मपुत्र के जल को लेकर दक्षिण एशिया में तनाव इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

7. मूलवासी (Indigenous People) और उनके अधिकार

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, मूलवासी वे लोग हैं जो किसी क्षेत्र में सदियों से रहते आ रहे हैं और जिनकी एक विशिष्ट संस्कृति और जीवन शैली है, लेकिन बाद में वे बाहरी लोगों के अधीन हो गए। भारत में इनके लिए 'आदिवासी' या 'जनजाति' शब्द का प्रयोग किया जाता है।

मूलवासियों की प्रमुख मांगें:

  1. स्वतंत्र पहचान: उन्हें उनकी विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं के साथ जीने का अधिकार मिलना चाहिए।
  2. भूमि पर अधिकार: वे जंगल और जमीन को अपनी माँ मानते हैं। विकास परियोजनाओं (बाँध, खदान) के कारण उनका विस्थापन उनकी संस्कृति का विनाश है।
  3. प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन: मूलवासी प्रकृति के सबसे अच्छे रक्षक होते हैं। उन्हें संसाधनों के प्रबंधन में हिस्सेदारी दी जानी चाहिए।
💡 निष्कर्ष: पर्यावरण की समस्या अब केवल 'पेड़ लगाने' तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक न्याय, समानता और संसाधनों के बँटवारे की समस्या है। जब तक विकसित देश अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी नहीं समझेंगे और विकासशील देशों को तकनीक हस्तांतरण नहीं करेंगे, तब तक पृथ्वी को बचाना मुश्किल होगा। पर्यावरण राजनीति हमें याद दिलाती है कि हम सब एक ही नाव में सवार हैं—यदि नाव डूबी, तो कोई भी नहीं बचेगा।