स्वतंत्र भारत में राजनीति: 1. राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ - स्वतंत्र भारत का उदय

स्वतंत्र भारत में राजनीति: राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ - स्वतंत्र भारत का उदय
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1: राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ - एक नए भारत का उदय

स्वतंत्र भारत में राजनीति: 1. राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ - स्वतंत्र भारत का उदय

14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि भारतीय इतिहास का वह पल था जिसने सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ दिया। जहाँ एक ओर आज़ादी की खुशी थी, वहीं दूसरी ओर विभाजन का गहरा दर्द। जवाहरलाल नेहरू ने अपने ऐतिहासिक भाषण 'ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी' के माध्यम से एक नए भारत के संकल्प की घोषणा की। लेकिन यह आज़ादी अपने साथ चुनौतियों का पहाड़ लेकर आई थी। एक ऐसा देश जो गरीबी, साक्षरता की कमी, साम्प्रदायिक हिंसा और भौगोलिक बिखराव से जूझ रहा था, उसे एक 'राष्ट्र' के रूप में खड़ा करना दुनिया के सबसे कठिन कार्यों में से एक था। इस लेख में हम राष्ट्र-निर्माण की उन तीन मूलभूत चुनौतियों और उनके समाधानों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।


1. राष्ट्र-निर्माण: संकल्पना और सहमतियाँ

राष्ट्र-निर्माण केवल एक भौगोलिक सीमा तय करना नहीं है, बल्कि यह विविध पृष्ठभूमि के लोगों के बीच 'एक होने' की भावना विकसित करने की प्रक्रिया है। स्वतंत्र भारत के नेताओं के सामने एक स्पष्ट विजन था कि भारत को किन मूल्यों पर खड़ा होना है।

राष्ट्र-निर्माण के मुख्य स्तंभ:

  • एकता और साझा पहचान: विविधता में एकता के सूत्र को पिरोना।
  • संस्थागत विकास: संसद, चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी मजबूत संस्थाओं की स्थापना।
  • सामाजिक समावेशन: समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति (दलित, आदिवासी, महिलाएँ) को मुख्यधारा में शामिल करना।
🚩 दो प्रमुख राष्ट्रीय सहमतियाँ:
आज़ादी के आंदोलन के दौरान ही यह तय हो गया था कि भारत का भविष्य दो सिद्धांतों पर टिका होगा:
1. लोकतांत्रिक शासन: भारत में शासन का आधार 'जनता की इच्छा' होगी, न कि कोई तानाशाही या राजतंत्र।
2. कल्याणकारी राज्य: सरकार का कर्तव्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि गरीबी दूर करना और समानता स्थापित करना होगा।

2. विभाजन की त्रासदी: विस्थापन और पुनर्वास

भारत की आज़ादी और विभाजन एक ही सिक्के के दो पहलू थे। विभाजन का आधार 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) था, जिसे मुस्लिम लीग ने पेश किया था। उनका तर्क था कि भारत में दो अलग-अलग कौमें—हिंदू और मुसलमान—रहती हैं, इसलिए मुसलमानों के लिए एक अलग देश 'पाकिस्तान' होना चाहिए।

विभाजन की अबूझ कठिनाइयाँ:

विभाजन केवल नक्शे पर एक लकीर खींचना नहीं था, बल्कि यह परिवारों, भावनाओं और संपत्तियों का क्रूर बँटवारा था। इसमें चार मुख्य समस्याएँ थीं:

  • भौगोलिक अलगाव: कोई एक ऐसा इलाका नहीं था जहाँ केवल मुसलमान हों। पंजाब और बंगाल में मिश्रित आबादी थी, जिससे पाकिस्तान दो हिस्सों (पूर्वी और पश्चिमी) में बँट गया, जिनके बीच हजारों मील का भारतीय भू-भाग था।
  • विरोध के स्वर: पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के गांधीवादी नेता खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) ने इस बँटवारे का अंत तक विरोध किया, लेकिन उनकी आवाज़ को अनसुना कर दिया गया।
  • अल्पसंख्यकों की स्थिति: सीमा के दोनों ओर करोड़ों लोग अचानक 'विदेशी' बन गए। वे अपने ही घरों में असुरक्षित थे। जैसे ही बँटवारे की खबर फैली, साम्प्रदायिक हिंसा का नंगा नाच शुरू हो गया।
⚠️ विभाजन के परिणाम:
विभाजन ने दुनिया का सबसे बड़ा और आकस्मिक विस्थापन देखा। लगभग 80 लाख लोगों को सीमा पार करनी पड़ी और 5 से 10 लाख लोग दंगों में मारे गए। महिलाओं और बच्चों के साथ जो बर्बरता हुई, वह आज भी मानवता के माथे पर कलंक है। 'इज़्ज़त' के नाम पर परिवारों ने अपनी ही बेटियों की जान ली। यह केवल संपत्तियों का बँटवारा नहीं था, बल्कि यह मेज, कुर्सी, टाइपराइटर और यहाँ तक कि पुलिस के वाद्य यंत्रों तक का बँटवारा था।

3. राष्ट्र-निर्माण की तीन प्रमुख चुनौतियाँ

आज़ादी के तुरंत बाद भारत सरकार के सामने तीन मुख्य लक्ष्य थे जो परस्पर जुड़े हुए थे:

I. एकता और अखंडता (चुनौती नंबर एक)

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ हर सौ मील पर भाषा और रीति-रिवाज बदल जाते हैं। अंग्रेजों ने भारत को इस हाल में छोड़ा था कि वह कभी भी बिखर सकता था। 565 रजवाड़ों का स्वतंत्र अस्तित्व भारत के नक्शे में सैकड़ों छोटे-छोटे छेदों जैसा था। पहली प्राथमिकता इन सबको जोड़कर एक मजबूत भौगोलिक इकाई बनाना था।

II. लोकतंत्र की स्थापना (चुनौती नंबर दो)

भारत ने संसदीय लोकतंत्र को अपनाया। लेकिन एक ऐसे देश में जहाँ गरीबी और निरक्षरता चरम पर थी, वहाँ चुनाव कराना और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाना एक 'जुआ' माना जा रहा था। संविधान निर्माण और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को लागू करना एक बड़ा साहस था।

III. आर्थिक विकास और न्याय (चुनौती नंबर तीन)

अंग्रेजों ने भारत को एक खोखली अर्थव्यवस्था दी थी। अकाल और भुखमरी आम थी। ऐसे में कृषि का आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण करना ताकि गरीबी दूर हो सके, एक बड़ी चुनौती थी।


4. रजवाड़ों का विलय: सरदार पटेल की ऐतिहासिक भूमिका

ब्रिटिश इंडिया दो हिस्सों में था—ब्रिटिश प्रांत और देसी रजवाड़े। अंग्रेजों ने जाते-जाते रजवाड़ों को यह विकल्प दिया कि वे भारत या पाकिस्तान में शामिल हों या स्वतंत्र रहें। यह भारत की एकता के लिए 'डेथ वारंट' जैसा था।

लौह पुरुष का कौशल:

सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी कूटनीति और दृढ़ संकल्प से इन रजवाड़ों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए राजी किया। अधिकतर राजाओं ने 'सहमति-पत्र' (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए।

🛡️ विशिष्ट विलय मामले:
  • हैदराबाद: यहाँ के निजाम ने स्वतंत्र रहने की कोशिश की और रजाकारों के माध्यम से जनता पर अत्याचार किया। भारत ने 1948 में 'ऑपरेशन पोलो' चलाया और सैन्य कार्रवाई के जरिए हैदराबाद का विलय किया।
  • मणिपुर: राजा बोधचंद्र सिंह ने पहले चुनाव कराए (मणिपुर आज़ाद भारत का पहला हिस्सा था जहाँ चुनाव हुए), लेकिन 1949 में दबाव में विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • जूनागढ़: यहाँ के नवाब पाकिस्तान भाग गए, लेकिन जनता भारत के साथ रहना चाहती थी। 1948 में जनमत संग्रह के जरिए इसका विलय हुआ।
  • कश्मीर: पाकिस्तान समर्थित कबाइलियों के हमले के बाद राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर किए।

5. राज्यों का पुनर्गठन: भाषा और पहचान की राजनीति

रजवाड़ों के विलय के बाद अगली चुनौती आंतरिक प्रशासनिक सीमाओं को तय करना था। औपनिवेशिक काल की सीमाएँ तर्कहीन थीं।

भाषाई आधार की मांग:

आज़ादी के आंदोलन के समय कांग्रेस ने वादा किया था कि आज़ादी के बाद राज्य भाषा के आधार पर बनेंगे। लेकिन विभाजन की हिंसा के बाद नेहरू और पटेल को डर था कि भाषा के आधार पर बँटवारा देश को और कमजोर कर देगा। इसलिए उन्होंने इस मुद्दे को टालना चाहा।

पोट्टी श्रीरामुलु और आंध्र आंदोलन:

तेलुगुभाषी क्षेत्रों में अलग राज्य की मांग ने उग्र रूप ले लिया। गांधीवादी नेता पोट्टी श्रीरामुलु 56 दिनों के अनशन के बाद शहीद हो गए। उनकी मृत्यु के बाद भड़की हिंसा ने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर किया और 1952 में 'आंध्र प्रदेश' के रूप में पहला भाषाई राज्य बना।

📑 राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC - 1953):
आंध्र प्रदेश के गठन के बाद पूरे देश में मांग उठने लगी। सरकार ने फज़ल अली की अध्यक्षता में SRC बनाया। इसकी रिपोर्ट के आधार पर 1956 में 'राज्य पुनर्गठन अधिनियम' पारित हुआ, जिसके तहत 14 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों का गठन हुआ। इसने यह साबित किया कि विविधता को स्वीकार करने से देश टूटता नहीं, बल्कि और मजबूत होता है।

6. 1956 के बाद राज्यों का क्रमिक विकास

समय के साथ केवल भाषा ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक विकास के आधार पर भी नए राज्य बने:

  • 1960: बम्बई प्रांत को बांटकर गुजरात और महाराष्ट्र बनाया गया।
  • 1966: पंजाब से हरियाणा और हिमाचल प्रदेश अलग हुए।
  • 2000: विकास और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर छत्तीसगढ़ (MP), उत्तराखंड (UP) और झारखंड (Bihar) बने।
  • 2014: आंध्र प्रदेश से अलग होकर 'तेलंगाना' भारत का 29वाँ राज्य बना (वर्तमान में 28 राज्य हैं)।

7. महत्वपूर्ण व्यक्तित्व और साहित्यिक स्मृतियाँ

राष्ट्र-निर्माण केवल राजनेताओं का कार्य नहीं था, कवियों और लेखकों ने भी उस दर्द और संकल्प को शब्दों में पिरोया।

  • फ़ैज़ अहमद फ़ैज़: उनकी कविता 'सुब्ह-ए-आज़ादी' विभाजन के अधूरे सपनों को दर्शाती है।
  • अमृता प्रीतम: उनकी प्रसिद्ध कविता 'वारिस शाह' विभाजन की हिंसा में महिलाओं की त्रासदी का मार्मिक चित्रण है।
  • सरदार पटेल: जिन्हें 'बिस्मार्क ऑफ इंडिया' कहा जाता है, जिन्होंने भारत के राजनीतिक एकीकरण का असम्भव कार्य संभव कर दिखाया।

निष्कर्ष: एक जीवंत राष्ट्र का निर्माण

भारत के राष्ट्र-निर्माण की यात्रा यह सिखाती है कि लोकतंत्र और विविधता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विभाजन की भीषण त्रासदी और रजवाड़ों की चुनौतियों के बावजूद, भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है। राज्यों के भाषाई पुनर्गठन ने क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान के साथ जोड़ा। हालांकि गरीबी और साम्प्रदायिक तनाव जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं, लेकिन 1947 में जो नींव रखी गई थी, वह आज भी अडिग है।

💡 सारांश: स्वतंत्र भारत का जन्म अत्यंत कठिन परिस्थितियों में हुआ था। एकता की स्थापना, रजवाड़ों का विलय और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण ने भारत को एक सूत्र में बांधा। आज भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक साझा भावना और संकल्प का नाम है।