3: समकालीन दक्षिण एशिया - राजनीति, संघर्ष और सहयोग
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
दक्षिण एशिया विश्व राजनीति का एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उत्तर में हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखलाओं और दक्षिण में हिंद महासागर से घिरा यह क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक विविधता और जटिल राजनीतिक इतिहास के लिए जाना जाता है। यहाँ जहाँ एक ओर लोकतंत्र की गहरी जड़ें हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्य शासन, जातीय संघर्ष और सीमा विवादों ने इसे सुरक्षा के लिहाज से एक 'खतरे की आशंका वाला क्षेत्र' बना दिया है। इसके बावजूद, इस क्षेत्र की सबसे बड़ी शक्ति यहाँ के लोगों की सामूहिक चेतना और आपसी सहयोग की संभावनाओं में निहित है। इस अध्याय में हम दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों की आंतरिक राजनीति, उनके आपसी संबंधों और वैश्विक शक्तियों की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
1. दक्षिण एशिया क्या है? भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान
दक्षिण एशिया केवल देशों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह एक साझी विरासत और भूगोल का नाम है। इसमें मुख्य रूप से सात देश शामिल हैं—बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका।
क्षेत्रीय विस्तार:
- प्राकृतिक सीमाएँ: पश्चिम में अरब सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और उत्तर में हिमालय इस क्षेत्र को एक विशिष्ट भौगोलिक पहचान देते हैं।
- विस्तारित धारणा: आधुनिक संदर्भों में अफगानिस्तान और म्यांमार को भी अक्सर दक्षिण एशिया का हिस्सा माना जाता है।
- चीन की स्थिति: चीन इस क्षेत्र का हिस्सा नहीं है, क्योंकि वह मुख्य रूप से पूर्वी एशिया का हिस्सा है और उसकी सांस्कृतिक व राजनीतिक दिशा दक्षिण एशिया से भिन्न रही है।
1830 में फ्रांसीसी चित्रकार येगेनी डेलाक्रो ने ‘लिबर्टी लीडिंग द पीपल’ पेंटिंग बनाई थी, जो स्वतंत्रता की देवी का चित्रण करती है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में सुभाष राय द्वारा किया गया इसका रूपांतरण यहाँ की जनता की लोकतंत्र और आज़ादी के प्रति अदम्य आकांक्षा को दर्शाता है। यह पेंटिंग याद दिलाती है कि दक्षिण एशिया का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी देश का हो, लोकतंत्र के लिए संघर्षरत रहा है।
2. पाकिस्तान: सेना और लोकतंत्र का द्वंद्व
पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास 'म्यूजिकल चेयर' जैसा रहा है, जहाँ सत्ता कभी निर्वाचित नेताओं के पास रही तो कभी सैन्य तानाशाहों के पास।
सत्ता परिवर्तन का घटनाक्रम:
- प्रारंभिक दौर: 1947 में आज़ादी के बाद जिन्ना और लियाकत अली खान की असमय मृत्यु ने देश में नेतृत्व का संकट पैदा किया। 1958 में जनरल अयूब खान ने सत्ता संभाली और सैन्य शासन की नींव रखी।
- 1971 का संकट: जनरल याहिया खान के समय में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) अलग हो गया, जिससे सेना की प्रतिष्ठा गिरी और जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में लोकतांत्रिक सरकार बनी।
- जियाउल हक से मुशर्रफ तक: 1977 में जियाउल हक ने तख्तापलट किया। 1988 में बेनजीर भुट्टो (पहली महिला पीएम) के साथ लोकतंत्र लौटा, लेकिन 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने फिर से सैन्य शासन थोप दिया।
- वर्तमान स्थिति: 2008 के बाद से पाकिस्तान में नागरिक सरकारें चल रही हैं, लेकिन पर्दे के पीछे सेना का प्रभाव आज भी बना हुआ है।
पाकिस्तान में लोकतंत्र की विफलता के पीछे तीन बड़े कारण हैं: 1. सेना, कट्टरपंथी धर्मगुरुओं और बड़े भूस्वामियों का सामाजिक दबदबा। 2. भारत के साथ निरंतर तनाव, जिसका फायदा उठाकर सेना 'देश की सुरक्षा' के नाम पर सत्ता पर कब्जा करती है। 3. अंतरराष्ट्रीय समर्थन का अभाव, जहाँ अमेरिका जैसे देशों ने अपने स्वार्थ के लिए सैन्य तानाशाहों को बढ़ावा दिया।
3. बांग्लादेश: भाषा के संघर्ष से आज़ादी तक
1947 से 1971 तक बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था, जिसे 'पूर्वी पाकिस्तान' कहा जाता था।
संघर्ष की जड़ें:
पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान पर अपनी भाषा (उर्दू) और संस्कृति थोपने की कोशिश की। इसके विरोध में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग ने स्वायत्तता का आंदोलन छेड़ा। 1970 के चुनाव में मुजीब को बहुमत मिला, लेकिन उन्हें जेल में डाल दिया गया।
पाकिस्तानी सेना के दमन से बचने के लिए लाखों शरणार्थी भारत आए। भारत ने सैन्य और नैतिक रूप से बांग्लादेश की मदद की, जिसके परिणामस्वरूप दिसंबर 1971 में पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण किया और एक नया देश 'बांग्लादेश' अस्तित्व में आया। हाल के वर्षों में (2024), बांग्लादेश फिर से छात्र आंदोलनों और राजनीतिक अस्थिरता (शेख हसीना का इस्तीफा) के कारण चर्चा में है।
4. नेपाल: हिंदू राजतंत्र से लोकतांत्रिक गणराज्य तक
नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राज्य था जहाँ लंबे समय तक राजा का शासन रहा।
- माओवादी विद्रोह: 1990 के दशक में माओवादियों ने राजा के शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह शुरू किया।
- 2006 का आंदोलन: राजा ज्ञानेंद्र द्वारा लोकतंत्र को खत्म करने के बाद 'सेवेन पार्टी अलायंस' और माओवादियों ने ऐतिहासिक जन-आंदोलन किया।
- गणराज्य की स्थापना: 2008 में राजतंत्र खत्म हुआ और नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बना। 2015 में इसने अपना नया संविधान अपनाया।
5. श्रीलंका: जातीय संघर्ष और लिट्टे का अंत
श्रीलंका (पुराना नाम सिलोन) में लोकतंत्र तो स्थिर रहा, लेकिन वहाँ का समाज 'जातीय संघर्ष' की आग में झुलसता रहा।
सिंहली बनाम तमिल:
- विवाद: बहुसंख्यक सिंहली समुदाय ने तमिलों के अधिकारों की उपेक्षा की। इसके विरोध में उग्र संगठन **लिट्टे (LTTE)** का जन्म हुआ, जो एक अलग 'तमिल ईलम' की मांग कर रहा था।
- भारतीय हस्तक्षेप (1987): भारत ने अपनी 'शांति सेना' (IPKF) भेजी, जो बिना लक्ष्य हासिल किए 1989 में वापस लौट आई। यह भारत की विदेश नीति की एक बड़ी चूक मानी जाती है।
- युद्ध का अंत: 2009 में श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे को पूरी तरह खत्म कर दिया। आज श्रीलंका आर्थिक संकटों से जूझ रहा है लेकिन जातीय शांति की ओर अग्रसर है।
6. भारत के पड़ोसियों के साथ संबंध: संघर्ष और सहयोग
भारत दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश है, इसलिए सभी देशों के साथ उसके संबंध इस क्षेत्र की नियति तय करते हैं।
भारत-पाकिस्तान:
कश्मीर मुद्दा, सियाचिन विवाद, कच्छ के रन में सरक्रीक विवाद और सीमा पार आतंकवाद दोनों देशों के बीच तनाव के मुख्य बिंदु हैं। 1998 के परमाणु परीक्षणों ने इस दुश्मनी को और अधिक घातक बना दिया है।
- सिंधु जल संधि (1960): कई युद्धों के बावजूद यह संधि आज भी काम कर रही है।
- गंगा-ब्रह्मपुत्र समझौता: भारत-बांग्लादेश के बीच जल बँटवारे का समाधान।
- भूटान के साथ मित्रता: भारत भूटान के विकास का सबसे बड़ा साझेदार है।
- मालदीव: 1988 के सैन्य तख्तापलट के प्रयास को भारतीय सेना ने नाकाम कर मालदीव की रक्षा की थी।
7. क्षेत्रीय सहयोग: सार्क (SAARC) और साफ्टा (SAFTA)
दक्षिण एशिया के देशों ने महसूस किया कि आपसी झगड़ों के बजाय आर्थिक सहयोग पर ध्यान देना चाहिए।
- दक्षेस (SAARC): 1985 में ढाका में इसकी स्थापना हुई। हालांकि भारत-पाक तनाव के कारण यह संगठन अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाया है।
- साफ्टा (SAFTA): 2006 में मुक्त व्यापार के लिए इसे लागू किया गया। छोटे देशों को डर है कि भारत उनके बाजारों पर कब्जा कर लेगा, जबकि भारत का मानना है कि इससे पूरे क्षेत्र की गरीबी दूर होगी।
8. बाहरी शक्तियों की भूमिका: चीन और अमेरिका
दक्षिण एशिया केवल इन सात देशों का मैदान नहीं है, यहाँ महाशक्तियों की भी गहरी रुचि है।
- चीन का प्रभाव: पाकिस्तान के साथ रणनीतिक साझेदारी और नेपाल-श्रीलंका में निवेश के जरिए चीन भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है।
- अमेरिका का हित: शीतयुद्ध के बाद अमेरिका के संबंध भारत और पाकिस्तान दोनों से बेहतर हुए हैं। वह इस क्षेत्र को आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और एक बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में देखता है।
निष्कर्ष: एक साझा भविष्य की ओर
दक्षिण एशिया एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ चुनौतियां और अवसर साथ-साथ चलते हैं। यदि यहाँ के देश अपने पुराने विवादों को छोड़कर आर्थिक एकीकरण की ओर बढ़ें, तो यह क्षेत्र 21वीं सदी का वैश्विक आर्थिक पावरहाउस बन सकता है। भारत को एक 'बड़े भाई' की भूमिका निभाते हुए उदारता दिखानी होगी, और छोटे देशों को भारत की नियत पर भरोसा करना होगा।