5: समकालीन विश्व में सुरक्षा - चुनौतियाँ और रणनीतियाँ
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
सुरक्षा एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही हमारे मन में सीमाओं पर तैनात सैनिकों, टैंकों और मिसाइलों की छवि उभरती है। लेकिन समकालीन विश्व में सुरक्षा की यह परिभाषा संकुचित साबित हो रही है। आज सुरक्षा केवल युद्धों से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भूख, बीमारी, प्राकृतिक आपदा और मानवाधिकारों के संरक्षण जैसे वैश्विक मुद्दे भी शामिल हैं। तकनीकी प्रगति और वैश्वीकरण ने जहाँ दूरियों को कम किया है, वहीं खतरों को 'अदृश्य' और 'वैश्विक' बना दिया है। इस अध्याय में हम सुरक्षा की पारंपरिक और अपारंपरिक धारणाओं, खतरे के नए स्रोतों और भारत की सुरक्षा रणनीतियों का एक विस्तृत और सर्वांगीण विश्लेषण करेंगे।
1. सुरक्षा का अर्थ: केंद्रीय मूल्यों का संरक्षण
सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है "खतरे से आज़ादी"। हालाँकि, मानव जीवन हमेशा किसी न किसी खतरे से घिरा रहता है—चाहे वह सड़क दुर्घटना हो या बीमारी। राजनीति विज्ञान के संदर्भ में, केवल उन्हीं खतरों को 'सुरक्षा का विषय' माना जाता है जो किसी राष्ट्र या मानवता के "केंद्रीय मूल्यों" (Central Values) को प्रभावित करते हैं।
केंद्रीय मूल्य क्या हैं?
- एक राष्ट्र के लिए उसके केंद्रीय मूल्य उसकी संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता हैं।
- एक व्यक्ति के लिए उसके केंद्रीय मूल्य उसका जीवन, गरिमा और मौलिक अधिकार हैं।
- एक सरकार के लिए केंद्रीय मूल्य सत्ता की स्थिरता और कानून-व्यवस्था का पालन हो सकता है।
2. सुरक्षा की पारंपरिक धारणा: बाहरी और आंतरिक आयाम
सुरक्षा की पारंपरिक धारणा का मुख्य सरोकार सैन्य खतरे से होता है। यह अवधारणा मानती है कि किसी भी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा पड़ोसी देश की सैन्य शक्ति से होता है, जो उसकी स्वतंत्रता और संप्रभुता को चुनौती दे सकता है।
A. बाहरी सुरक्षा (External Security)
बाहरी सुरक्षा में सरकार के पास युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प होते हैं: 1. आत्मसमर्पण करना (बिना लड़े घुटने टेक देना), 2. युद्ध की लागत को इतना बढ़ा देना कि शत्रु आक्रमण न करे (इसे 'अवरोध' या Deterrence कहते हैं), और 3. युद्ध छिड़ जाने पर अपनी रक्षा करना ताकि शत्रु सफल न हो सके।
B. आंतरिक सुरक्षा (Internal Security)
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद विकसित देशों ने माना कि उनकी सीमाओं के अंदर शांति है, इसलिए उनका ध्यान बाहरी खतरों पर रहा। लेकिन विकासशील देशों (एशिया और अफ्रीका के नए स्वतंत्र देश) के लिए आंतरिक सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी रही क्योंकि वहाँ अलगाववादी आंदोलन और गृहयुद्ध जैसी स्थितियां मौजूद थीं।
पारंपरिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 'शक्ति संतुलन' है। कोई भी देश अपने पड़ोसी की बढ़ती शक्ति को देखकर सतर्क हो जाता है और अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर या अन्य देशों के साथ गठबंधन बनाकर संतुलन स्थापित करने की कोशिश करता है।
3. पारंपरिक सुरक्षा के तरीके: न्याय-युद्ध और संधियाँ
परंपरागत सुरक्षा यह मानती है कि सैन्य शक्ति का उपयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए और इसे कुछ नैतिक व कानूनी नियमों के तहत संचालित किया जाना चाहिए।
I. न्याय-युद्ध (Just War) का सिद्धांत
यूरोपीय परंपरा के अनुसार, युद्ध तभी न्यायसंगत है जब वह आत्मरक्षा के लिए हो या जनसंहार (Genocide) रोकने के लिए। इसमें यह भी अनिवार्य है कि युद्ध के दौरान निहत्थे नागरिकों और घायल सैनिकों को निशाना न बनाया जाए।
II. अस्त्र-नियंत्रण (Arms Control)
अस्त्र-नियंत्रण का अर्थ यह नहीं है कि हथियार खत्म कर दिए जाएँ, बल्कि इसका अर्थ है कि हथियारों के विकास और विस्तार को 'विनियमित' किया जाए ताकि युद्ध की भयावहता कम हो सके।
- SALT (सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता): 1972 और 1979 में अमेरिका-सोवियत संघ के बीच मिसाइलों को सीमित करने हेतु।
- NPT (परमाणु अप्रसार संधि - 1968): यह संधि केवल उन देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति देती है जिन्होंने 1967 से पहले परीक्षण कर लिया था (भारत इसे भेदभावपूर्ण मानता है)।
- BWC (जैविक हथियार संधि - 1972): जैविक हथियारों के विकास और भंडारण पर पूर्ण प्रतिबंध। 155 से अधिक देशों की सहमति।
- CWC (रासायनिक हथियार संधि - 1992): रासायनिक हथियारों के उन्मूलन के लिए वैश्विक समझौता।
4. सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा: 'मानवता की सुरक्षा'
21वीं सदी में सुरक्षा का दायरा राज्य से बढ़कर व्यक्ति तक पहुँच गया है। अपारंपरिक धारणा यह मानती है कि केवल सीमाओं की रक्षा करने से लोग सुरक्षित नहीं हो जाते। यदि कोई नागरिक भूख, बीमारी या मानवाधिकार हनन का शिकार है, तो वह 'असुरक्षित' है।
मानवता की सुरक्षा बनाम विश्व सुरक्षा
- मानवता की सुरक्षा (Human Security): इसका अर्थ है 'अभाव से मुक्ति' (Freedom from Want) और 'भय से मुक्ति' (Freedom from Fear)। इसमें व्यक्ति की गरिमा और उसके जीवन की गुणवत्ता सर्वोपरि है।
- विश्व सुरक्षा (Global Security): इसमें वे खतरे शामिल हैं जो पूरी पृथ्वी के अस्तित्व को चुनौती देते हैं, जैसे ग्लोबल वार्मिंग या ओजोन परत का क्षरण। ये खतरे किसी एक देश की सीमा में नहीं बांधे जा सकते।
5. खतरे के नए स्रोत: समकालीन चुनौतियां
आज विश्व के सामने ऐसे खतरे मौजूद हैं जिनसे निपटने के लिए सेना और टैंक नाकाफी हैं।
I. आतंकवाद (Terrorism)
आतंकवाद राजनीतिक उद्देश्यों के लिए आम नागरिकों के मन में भय पैदा करने की एक रणनीति है। 11 सितंबर 2001 (9/11) को अमेरिका पर हुए हमले ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब दुनिया का कोई भी हिस्सा, यहाँ तक कि महाशक्तियाँ भी, आतंकवाद से सुरक्षित नहीं हैं। यह एक 'अदृश्य' शत्रु है जो सीमाओं को नहीं मानता।
II. महामारियाँ और स्वास्थ्य संकट
कोविड-19, एचआईवी-एड्स, बर्ड फ्लू और इबोला जैसी महामारियों ने दिखाया है कि एक वायरस किसी भी परमाणु बम से अधिक खतरनाक हो सकता है। वैश्वीकरण के कारण लोग एक देश से दूसरे देश तेजी से यात्रा करते हैं, जिससे बीमारियां भी तेजी से फैलती हैं। गरीब देशों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव इन खतरों को और बढ़ा देता है।
III. पर्यावरणीय खतरे और जलवायु परिवर्तन
ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। यदि मालदीव जैसा देश डूब जाता है या बांग्लादेश का 20% हिस्सा जलमग्न हो जाता है, तो यह केवल भौगोलिक घटना नहीं, बल्कि एक 'सुरक्षा संकट' होगा क्योंकि इससे करोड़ों 'पर्यावरणीय शरणार्थी' पैदा होंगे।
IV. वैश्विक निर्धनता और असमानता
विश्व की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आज भी अत्यधिक गरीबी में जी रहा है। उत्तरी गोलार्द्ध (विकसित देश) अमीर हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध (विकासशील देश) गरीब। गरीबी अक्सर गृहयुद्ध, अपराध और कट्टरपंथ को जन्म देती है, जो अंततः वैश्विक सुरक्षा को प्रभावित करता है।
शरणार्थी: वे जो युद्ध, प्राकृतिक आपदा या धार्मिक उत्पीड़न के कारण 'मजबूरी' में अपना देश छोड़ते हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत सुरक्षा मिलती है।
आप्रवासी: वे जो बेहतर जीवन, शिक्षा या नौकरी के लिए 'स्वेच्छा' से दूसरे देश जाते हैं। राज्यों को अधिकार है कि वे इन्हें स्वीकार करें या न करें।
6. सहयोगमूलक सुरक्षा (Cooperative Security)
अपारंपरिक खतरों की प्रकृति ऐसी है कि उनसे कोई भी देश अकेले नहीं लड़ सकता। क्या अमेरिका अकेले ग्लोबल वार्मिंग रोक सकता है? क्या भारत अकेले पोलियो या कोरोना खत्म कर सकता है? जवाब है—नहीं।
सहयोग के प्रमुख आयाम:
- अंतरराष्ट्रीय संगठन: UN, WHO, विश्व बैंक और IMF की सक्रिय भागीदारी।
- स्वयंसेवी संगठन (NGOs): एमनेस्टी इंटरनेशनल और रेड क्रॉस जैसे संगठनों का मानवीय कार्यों में योगदान।
- अंतिम विकल्प के रूप में बल-प्रयोग: सहयोगमूलक सुरक्षा में बल-प्रयोग तभी होना चाहिए जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सामूहिक सहमति हो, जैसे किसी देश में हो रहे नरसंहार को रोकने के लिए।
7. भारत की सुरक्षा रणनीति: चार स्तंभ
भारत एक ऐसा देश है जिसे पारंपरिक (पाकिस्तान-चीन के साथ युद्ध) और अपारंपरिक (आतंकवाद, गरीबी) दोनों तरह के खतरों का सामना करना पड़ा है। भारत की सुरक्षा नीति के चार मुख्य घटक हैं:
I. सैन्य क्षमता का सुदृढ़ीकरण
भारत ने 1962, 1965, 1971 और 1999 के युद्धों से सीखा है कि सैन्य मजबूती अनिवार्य है। 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों ने भारत को एक 'प्रतिरोधक' (Deterrent) शक्ति के रूप में स्थापित किया। भारत की 'No First Use' (पहले प्रयोग नहीं) की नीति उसकी शांतिपूर्ण मंशा को दर्शाती है।
II. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और नियमों को मजबूत करना
भारत हमेशा से ही एक बहुध्रुवीय विश्व का समर्थक रहा है। भारत ने UN के शांति मिशनों में दुनिया में सबसे अधिक सैनिक भेजे हैं। भारत 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' (NAM) के माध्यम से विकासशील देशों की आवाज़ उठाता रहा है ताकि वैश्विक स्तर पर शक्तियों का संतुलन बना रहे।
III. आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां
भारत ने कश्मीर, उत्तर-पूर्व और पंजाब जैसे क्षेत्रों में अलगाववाद और उग्रवाद का सामना किया है। भारत की रणनीति यहाँ 'शक्ति' और 'लोकतंत्र' का मिश्रण रही है। भारत मानता है कि राष्ट्रीय एकता को केवल हथियारों से नहीं, बल्कि लोगों की लोकतांत्रिक भागीदारी और विकास से सुरक्षित किया जा सकता है।
IV. आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन
भारत की सुरक्षा का एक बड़ा हिस्सा उसकी अर्थव्यवस्था में छिपा है। यदि देश में गरीबी और असमानता बनी रहेगी, तो आंतरिक विद्रोह का खतरा हमेशा बना रहेगा। इसलिए, भारत सुरक्षा को 'टिकाऊ विकास' और 'सामाजिक न्याय' से जोड़कर देखता है।
- 1962: चीन के साथ युद्ध; रक्षा बजट में भारी वृद्धि की आवश्यकता महसूस हुई।
- 1974: पोखरण-1 (Smiling Buddha); शांतिपूर्ण परमाणु क्षमता का प्रदर्शन।
- 1998: पोखरण-2; पूर्ण परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र की घोषणा।
- 2020: कोविड-19 महामारी; स्वास्थ्य सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बनाया गया।
निष्कर्ष: सुरक्षा का बदलता परिदृश्य
सुरक्षा अब केवल सेनापतियों का विषय नहीं रह गई है। आज का युग 'समग्र सुरक्षा' (Comprehensive Security) का है। यदि हम सीमाओं को बचा लें लेकिन अपनी हवा, पानी और नागरिकों के स्वास्थ्य को न बचा सकें, तो वह सुरक्षा व्यर्थ है। भविष्य में सुरक्षा का अर्थ अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीक का न्यायपूर्ण उपयोग और प्रकृति के साथ संतुलन बनाने में निहित होगा। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए चुनौती यह है कि वे अपनी सीमित संपदा का उपयोग सैन्य तैयारियों और सामाजिक विकास के बीच कैसे संतुलित करते हैं।
