1: दो ध्रुवीयता का अंत - वैश्विक राजनीति में युगांतकारी परिवर्तन
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
शीतयुद्ध का चरम बिंदु वह समय था जब विश्व दो शक्तिशाली गुटों में विभाजित था, जिसका सबसे बड़ा प्रतीक 'बर्लिन की दीवार' थी। यह दीवार केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं थी, बल्कि यह पूँजीवादी पश्चिमी देशों और साम्यवादी सोवियत खेमे के बीच की गहरी वैचारिक खाई को दर्शाती थी। 9 नवंबर 1989 को जब पूर्वी जर्मनी की जनता ने इस दीवार को गिराया, तो यह केवल एक दीवार का अंत नहीं था, बल्कि एक पूरी वैश्विक व्यवस्था का ढहना था। सोवियत संघ के पतन के साथ ही "दूसरी दुनिया" का लोप हो गया और शीतयुद्ध की कड़वाहट का अंत हुआ। इस लेख में हम सोवियत प्रणाली के उदय, इसकी उपलब्धियों, इसकी आंतरिक कमजोरियों और इसके विघटन के दूरगामी परिणामों का सूक्ष्म विश्लेषण करेंगे।
1. सोवियत प्रणाली: एक वैचारिक और राजनीतिक ढांचा
सोवियत प्रणाली का जन्म 1917 की रूसी समाजवादी क्रांति के गर्भ से हुआ था। यह क्रांति पूँजीवादी व्यवस्था के दोषों के विरुद्ध एक विद्रोह थी और इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ समानता और न्याय सर्वोपरि हो।
सोवियत प्रणाली की आधारभूत विशेषताएं:
- समाजवादी आदर्श: यह प्रणाली मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांतों पर आधारित थी, जिसने निजी संपत्ति के उन्मूलन और सार्वजनिक स्वामित्व पर जोर दिया।
- कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व: सोवियत राजनीति की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। यहाँ किसी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष के लिए कोई संवैधानिक स्थान नहीं था।
- नियोजित अर्थव्यवस्था: पूरी अर्थव्यवस्था राज्य के कड़े नियंत्रण में थी। उत्पादन और वितरण के निर्णय बाजार की शक्तियों के बजाय केंद्रीय नियोजन समितियों द्वारा लिए जाते थे।
- दूसरी दुनिया: दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के देश (जिन्हें सोवियत सेना ने फासीवाद से मुक्त कराया था) सोवियत खेमे में शामिल हुए। इन देशों के समूह को 'दूसरी दुनिया' कहा गया।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ अमेरिका के बराबर की महाशक्ति बन गया। इसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व से कहीं अधिक विकसित थी। सोवियत संघ 'पिन से लेकर कार तक' सब कुछ स्वयं बनाता था। इसके पास विशाल ऊर्जा संसाधन (तेल, लोहा, इस्पात) और एक उन्नत संचार तंत्र था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यहाँ बेरोजगारी न के बराबर थी और राज्य नागरिकों को न्यूनतम जीवन स्तर (मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य, शिशु देखभाल) की गारंटी देता था।
2. सोवियत प्रणाली की आंतरिक कमजोरियां और ठहराव
1970 के दशक के उत्तरार्ध तक सोवियत प्रणाली अपनी चमक खोने लगी थी। जो व्यवस्था कभी विकास का इंजन थी, वह अब बोझ बनने लगी थी।
प्रमुख कमजोरियां:
- नौकरशाही का शिकंजा: व्यवस्था पूरी तरह से नौकरशाही के नियंत्रण में आ गई थी, जिससे निर्णय लेने में देरी और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा।
- लोकतंत्र का अभाव: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न होने के कारण जनता का दम घुटने लगा। लोग अपनी असहमति केवल चुटकुलों और कार्टूनों के माध्यम से ही व्यक्त कर पाते थे।
- हथियारों की होड़: अमेरिका से सैन्य बराबरी करने के चक्कर में सोवियत संघ ने अपने कीमती संसाधनों का बड़ा हिस्सा हथियारों पर खर्च कर दिया, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं की भारी कमी हो गई।
- अफगानिस्तान हस्तक्षेप (1979): अफगानिस्तान में सैन्य दखल सोवियत संघ के लिए 'नासूर' साबित हुआ, जिसने इसकी अर्थव्यवस्था और सैन्य मनोबल को तोड़ दिया।
- तकनीकी पिछड़ापन: सोवियत संघ सैन्य क्षेत्र में तो आगे था, लेकिन नागरिक सूचना और प्रौद्योगिकी (IT) के क्षेत्र में पश्चिमी देशों से बहुत पीछे छूट गया था।
3. गोर्बाचेव के सुधार और अनपेक्षित परिणाम
1985 में मिखाइल गोर्बाचेव कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने। उन्होंने सोवियत संघ को आधुनिक बनाने और पश्चिम के साथ संबंध सुधारने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाए।
- पेरेस्त्रोइका (Perestroika): इसका अर्थ था 'पुनर्रचना'। इसके तहत आर्थिक और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव कर उसे अधिक कुशल बनाने का प्रयास किया गया।
- ग्लासनोस्त (Glasnost): इसका अर्थ था 'खुलापन'। इसने समाज में अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक चर्चाओं को बढ़ावा दिया।
गोर्बाचेव ने अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाई और पूर्वी यूरोप में सोवियत नियंत्रण कम किया। हालांकि, इन सुधारों ने जनता की आकांक्षाओं को इतना बढ़ा दिया कि वे अब साम्यवाद के भीतर सुधार नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का अंत चाहते थे। कम्युनिस्ट पार्टी के गरमपंथी नेताओं ने भी गोर्बाचेव का विरोध किया, जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।
4. सोवियत संघ के विघटन का घटना-चक्र (1985-1991)
विघटन की प्रक्रिया क्रमिक थी लेकिन इसके अंतिम क्षण अत्यंत तीव्र रहे।
- मार्च 1985: गोर्बाचेव महासचिव बने; सुधारों का शंखनाद।
- 1988: लिथुआनिया, एस्टोनिया और लताविया (बाल्टिक देश) में स्वतंत्रता आंदोलन।
- नंवबर 1989: बर्लिन की दीवार का गिरना।
- जून 1990: रूसी संसद ने सोवियत संघ से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की (बोरिस येल्तसिन का उदय)।
- अगस्त 1991: कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टरपंथियों द्वारा असफल तख्तापलट का प्रयास।
- दिसंबर 1991: रूस, यूक्रेन और बेलारूस ने सोवियत संघ की समाप्ति की घोषणा की और 'स्वतंत्र राष्ट्रों का राष्ट्रकुल' (CIS) बनाया।
- 25 दिसंबर 1991: गोर्बाचेव का इस्तीफा; क्रेमलिन से सोवियत ध्वज उतरा और रूसी तिरंगा फहराया गया।
5. विघटन के कारण: एक गहरा विश्लेषण
सोवियत संघ के पतन के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं था, बल्कि यह कई कारकों का सम्मिश्रण था:
- आर्थिक गतिरोध: उपभोक्ता वस्तुओं की कमी और खाद्यान्न के बढ़ते आयात ने व्यवस्था की पोल खोल दी थी।
- राजनीतिक जवाबदेही का अभाव: कम्युनिस्ट पार्टी 70 वर्षों के शासन के बाद जनता से पूरी तरह कट चुकी थी।
- राष्ट्रवाद का उभार: रूस, बाल्टिक गणराज्यों और यूक्रेन में राष्ट्रवादी भावनाओं ने सोवियत पहचान को नकार दिया। यह विघटन का सबसे 'तात्कालिक' कारण बना।
- पश्चिमी प्रभाव: सोवियत नागरिकों को अब पता चल चुका था कि पश्चिमी देशों का जीवन स्तर उनके मुकाबले कहीं बेहतर है, जिससे व्यवस्था के प्रति मोहभंग हुआ।
6. शॉक थेरेपी: साम्यवाद से पूँजीवाद का कठिन मार्ग
सोवियत संघ के पतन के बाद, इन देशों ने विश्व बैंक और आईएमएफ (IMF) के निर्देशों पर पूँजीवाद की ओर संक्रमण की एक दर्दनाक प्रक्रिया अपनाई, जिसे 'शॉक थेरेपी' कहा गया।
शॉक थेरेपी ने इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को तहस-नहस कर दिया। रूस के 90% उद्योग कौड़ियों के भाव निजी हाथों में बेच दिए गए, जिसे "इतिहास की सबसे बड़ी गराज-सेल" कहा गया। रूसी मुद्रा 'रूबल' का मूल्य गिर गया, मुद्रास्फीति आसमान छूने लगी और लोगों की जीवनभर की जमापूँजी डूब गई। समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था खत्म हो गई और एक नया 'माफिया वर्ग' उभरा जिसने आर्थिक संसाधनों पर कब्जा कर लिया। रूस के बड़े बैंक (जैसे इंकॉम बैंक) दिवालिया हो गए, जिससे लाखों लोगों का भविष्य अंधकारमय हो गया।
7. सोवियत संघ के बाद का संघर्ष और तनाव
विघटन के बाद भी शांति नहीं आई। पूर्व सोवियत गणराज्यों में कई जातीय और क्षेत्रीय संघर्ष छिड़ गए:
- चेचन्या और दागिस्तान (रूस): यहाँ हिंसक अलगाववादी आंदोलन चले जिन्हें रूस ने सैन्य बल से दबाया।
- मध्य एशिया: ताजिकिस्तान में 10 वर्षों तक गृहयुद्ध चला। अजरबैजान के 'नगरनों-कराबाख' क्षेत्र को लेकर आर्मेनिया के साथ तनाव बना रहा।
- युगोस्लाविया का विखंडन: युगोस्लाविया कई टुकड़ों में टूट गया और बोस्निया-हर्जेगोविना में भीषण जातीय हिंसा हुई, जिसमें नाटो (NATO) को हस्तक्षेप करना पड़ा।
- संसाधनों की होड़: मध्य एशिया के हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) संसाधनों पर नियंत्रण के लिए रूस, अमेरिका और चीन के बीच 'ग्रेट गेम' शुरू हो गया।
8. विघटन की वैश्विक परिणतियाँ
सोवियत संघ के अंत ने विश्व के राजनीतिक मानचित्र और शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया:
- शीतयुद्ध का अंत: वैचारिक संघर्ष और हथियारों की होड़ समाप्त हुई।
- एकध्रुवीय विश्व: अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। इसे 'अमेरिकी वर्चस्व' का युग कहा गया।
- उदार लोकतंत्र की विजय: पूँजीवादी व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर सर्वश्रेष्ठ मान लिया गया।
- नए राष्ट्रों का उदय: सोवियत संघ से अलग हुए 15 नए देशों ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। बाल्टिक देश नाटो और यूरोपीय संघ का हिस्सा बन गए।
9. भारत और सोवियत संघ/रूस: एक स्थायी मित्रता
भारत और सोवियत संघ के संबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीति में 'आदर्श संबंधों' की श्रेणी में आते हैं।
- आर्थिक: सोवियत संघ ने भिलाई, बोकारो और विशाखापट्टनम जैसे इस्पात संयंत्रों के लिए तकनीकी सहायता दी। उसने उस समय भारत के साथ 'रुपये' में व्यापार किया जब हमारे पास विदेशी मुद्रा की कमी थी।
- राजनीतिक: कश्मीर मुद्दे पर सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में हमेशा भारत का साथ दिया। 1971 के युद्ध में सोवियत संघ की मदद निर्णायक रही।
- सैन्य: भारतीय सेना को अधिकांश अत्याधुनिक हथियार (जैसे सुखोई, ब्रह्मोस, टैंक) रूस से ही मिलते रहे हैं।
- सांस्कृतिक: सोवियत संघ में राजकपूर और अमिताभ बच्चन जैसे भारतीय कलाकार आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।
10. प्रमुख व्यक्तित्व: इतिहास के निर्माता
इस अध्याय के प्रमुख किरदारों का संक्षिप्त परिचय:
- व्लादिमीर लेनिन: 1917 की क्रांति के नायक और सोवियत संघ के संस्थापक।
- जोजेफ स्टालिन: सोवियत संघ के औद्योगीकरण के जनक लेकिन तानाशाही और आतंक के लिए भी जिम्मेदार।
- निकिता ख्रुश्चेव: स्टालिन के आलोचक; क्यूबा मिसाइल संकट के समय सोवियत राष्ट्रपति।
- लिओनिड ब्रेझनेव: सोवियत संघ के विस्तारवादी दौर के नेता; अफगानिस्तान आक्रमण के समय राष्ट्रपति।
- मिखाइल गोर्बाचेव: अंतिम सोवियत राष्ट्रपति जिन्होंने सुधारों की कोशिश की लेकिन विघटन के साक्षी बने।
- बोरिस येल्तसिन: रूस के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति जिन्होंने सोवियत संघ के अंत में केंद्रीय भूमिका निभाई।
निष्कर्ष: इतिहास का सबक
सोवियत संघ का पतन हमें सिखाता है कि कोई भी व्यवस्था, चाहे वह कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि वह जनता की आकांक्षाओं, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान नहीं करती, तो उसका पतन निश्चित है। दो ध्रुवीयता के अंत ने जहाँ एक ओर शीतयुद्ध के भय को समाप्त किया, वहीं दूसरी ओर इसने विश्व के सामने 'एकध्रुवीयता' और 'क्षेत्रीय संघर्षों' जैसी नई चुनौतियां भी पेश कीं। भारत के लिए रूस आज भी एक विश्वसनीय सामरिक साझीदार बना हुआ है, जो बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में हमारा सहयोगी है।
