समकालीन विश्व राजनीति: 2. सत्ता के वैकल्पिक केंद्र - यूरोपीय संघ, आसियान और चीन

समकालीन विश्व राजनीति: सत्ता के वैकल्पिक केंद्र - यूरोपीय संघ, आसियान और चीन
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2: सत्ता के वैकल्पिक केंद्र - विश्व राजनीति में नई शक्तियों का उदय

समकालीन विश्व राजनीति: 2. सत्ता के वैकल्पिक केंद्र - यूरोपीय संघ, आसियान और चीन

1990 के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही 'दो-ध्रुवीय' विश्व व्यवस्था का अंत हो गया। इसके बाद दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व (Hegemony) का दौर शुरू हुआ, जिसे 'एक-ध्रुवीय विश्व' कहा गया। लेकिन वैश्विक राजनीति स्थिर नहीं रहती। जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका की सैन्य और आर्थिक शक्ति को चुनौती देने के लिए कुछ क्षेत्रीय संगठन और देश 'सत्ता के वैकल्पिक केंद्र' (Alternative Centres of Power) के रूप में उभर रहे हैं। यूरोपीय संघ (EU), दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN) और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था ने वैश्विक शक्ति संतुलन को बहु-ध्रुवीय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस लेख में हम इन संगठनों की शक्ति, संरचना और उनके वैश्विक प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।


1. यूरोपीय संघ (European Union): एक आर्थिक शक्ति से राजनीतिक महाशक्ति तक

यूरोपीय संघ आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय संगठनों में से एक है। इसकी यात्रा दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही के बाद शुरू हुई, जब यूरोपीय देशों ने अपनी पुरानी दुश्मनी भुलाकर सहयोग का रास्ता चुना।

यूरोपीय एकीकरण का इतिहास: मार्शल योजना से मास्ट्रिक्ट संधि तक

1945 के बाद यूरोप दो हिस्सों में बँट गया था। पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए अमेरिका ने 'मार्शल योजना' के तहत भारी वित्तीय मदद दी। इसके माध्यम से 1948 में 'यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन' की स्थापना हुई, जिसने आर्थिक एकीकरण की नींव रखी।

📅 यूरोपीय संघ के विकास के मुख्य पड़ाव:
  • 1949: राजनीतिक सहयोग के लिए 'यूरोपीय परिषद' का गठन।
  • 1951: पेरिस संधि द्वारा 'यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय' (ECSC) का निर्माण।
  • 1957: रोम की संधि के माध्यम से 'यूरोपीय आर्थिक समुदाय' (EEC) और 'यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय' (Euratom) की स्थापना।
  • 1992: 'मास्ट्रिक्ट संधि' (Maastricht Treaty) पर हस्ताक्षर, जिसके साथ 'यूरोपीय संघ' का औपचारिक जन्म हुआ।
  • 2002: एक साझा मुद्रा 'यूरो' (€) का प्रचलन शुरू हुआ।
  • 2016: ब्रिटेन ने जनमत संग्रह (Brexit) के जरिए संघ छोड़ने का निर्णय लिया।

यूरोपीय संघ की शक्ति के आधार

यूरोपीय संघ अब केवल एक आर्थिक संगठन नहीं रह गया है, बल्कि यह एक 'अधिराष्ट्रीय संगठन' (Supranational Organization) के रूप में कार्य करता है।

  • आर्थिक शक्ति: 2016 में इसकी जीडीपी 17,000 अरब डॉलर से अधिक थी, जो इसे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाती थी। इसकी मुद्रा 'यूरो' अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए एक बड़ा खतरा है। विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमेरिका से तीन गुना अधिक है।
  • राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव: संघ का एक सदस्य, फ्रांस, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है। यह वैश्विक कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए, ईरान के परमाणु मुद्दे पर चीन और अमेरिका के बीच मध्यस्थता या प्रभाव डालना।
  • सैन्य क्षमता: यूरोपीय संघ के पास सामूहिक रूप से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। फ्रांस के पास परमाणु हथियार और उन्नत मिसाइल तकनीक है। अंतरिक्ष विज्ञान और संचार तकनीक में यह केवल अमेरिका से पीछे है।
⚠️ यूरोपीय संघ की सीमाएं:
इतनी शक्ति के बावजूद, यूरोपीय संघ को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सदस्य देशों की अपनी अलग विदेश और रक्षा नीतियां अक्सर आपस में टकराती हैं। जैसे, इराक हमले के समय ब्रिटेन अमेरिका के साथ था, जबकि जर्मनी और फ्रांस इसके खिलाफ थे। इसके अलावा, कई देशों में 'यूरो' मुद्रा को अपनाने को लेकर हिचकिचाहट है और 'ब्रेक्सिट' जैसी घटनाओं ने इसकी एकता पर सवाल खड़े किए हैं।

2. आसियान (ASEAN): दक्षिण-पूर्व एशिया की सामूहिक आवाज

दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN) उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है जिसने औपनिवेशिक काल और शीतयुद्ध के दौरान भारी कठिनाइयाँ झेली थीं। यहाँ के देशों ने राष्ट्र-निर्माण और आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने के लिए सहयोग का मार्ग चुना।

स्थापना और "आसियान शैली"

8 अगस्त 1967 को पाँच देशों (इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड) ने 'बैंकॉक घोषणा' पर हस्ताक्षर करके इसकी स्थापना की। आज इसमें 10 सदस्य देश शामिल हैं।

"आसियान शैली" (ASEAN Way): यह अनौपचारिक, टकराव-मुक्त और सहयोगात्मक संवाद का एक अनूठा तरीका है, जहाँ सदस्य देश एक-दूसरे की राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करते हैं।

आसियान के तीन स्तंभ (Three Pillars):

2003 में आसियान ने यूरोपीय संघ की तर्ज पर, लेकिन अपनी विशिष्ट शैली में, तीन समुदायों की स्थापना की:

  1. आसियान सुरक्षा समुदाय: क्षेत्रीय विवादों को सैन्य टकराव तक न पहुँचने देने और बातचीत से हल करने के लिए।
  2. आसियान आर्थिक समुदाय: एक साझा बाजार और उत्पादन आधार तैयार करना ताकि यह क्षेत्र निवेश और श्रम के लिए आकर्षक बने।
  3. आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय: सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ाना।

आसियान का बढ़ता वैश्विक कद

आसियान की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। 1994 में स्थापित 'आसियान क्षेत्रीय मंच' (ARF) आज एशिया की सुरक्षा और विदेश नीति पर चर्चा का सबसे बड़ा मंच है। भारत और चीन जैसे देशों ने आसियान के साथ 'मुक्त व्यापार समझौते' (FTA) किए हैं, जो इसकी बढ़ती प्रासंगिकता का प्रमाण है।


3. चीनी अर्थव्यवस्था का नाटकीय उत्थान

सत्ता के वैकल्पिक केंद्रों में चीन का नाम सबसे ऊपर आता है। 1949 की साम्यवादी क्रांति के बाद, चीन ने सोवियत मॉडल को अपनाया था, लेकिन 1970 के दशक के बाद उसने जो आर्थिक सुधार किए, उन्होंने दुनिया को चौंका दिया।

चीनी सुधारों का क्रमबद्ध विकास:

  • 1972: अमेरिका के साथ संबंध बहाल करके चीन ने अपना राजनीतिक और आर्थिक एकांतवास (Isolation) खत्म किया।
  • 1978: देंग श्याओपेंग ने 'ओपन डोर पॉलिसी' (मुक्त द्वार की नीति) की घोषणा की। चीन ने 'शॉक थेरेपी' के बजाय धीरे-धीरे अपनी अर्थव्यवस्था को खोला।
  • 1982 और 1998: क्रमशः कृषि और उद्योगों का निजीकरण किया गया। इससे उत्पादन में भारी वृद्धि हुई।
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ): विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए चीन ने तटीय क्षेत्रों में SEZ बनाए, जहाँ नियम बहुत उदार थे।
  • 2001: विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल होकर चीन वैश्विक व्यापार का केंद्र बन गया।
📈 चीन की आर्थिक ताकत:
आज चीन दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र (Manufacturing Hub) है। इसके पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है। ऐसा अनुमान है कि 2040 तक चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया की नंबर एक अर्थव्यवस्था बन जाएगी। इसका प्रभाव अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों पर भी गहरा है, जहाँ यह भारी निवेश कर रहा है।

चीन की आंतरिक चुनौतियाँ

इतनी प्रगति के बावजूद चीन के सामने कई समस्याएँ हैं: आर्थिक लाभ सभी तक नहीं पहुँचा है, जिससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खाई बढ़ी है। पर्यावरण प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। साथ ही, वहाँ अभी भी राजनीतिक लोकतंत्र का अभाव है और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगते रहते हैं।


4. भारत और चीन के संबंध: संघर्ष और सहयोग

भारत और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देश और उभरती हुई शक्तियाँ हैं। दोनों का इतिहास गौरवशाली रहा है, लेकिन आधुनिक काल में उनके संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं।

विवाद के मुख्य बिंदु:

  • तिब्बत मुद्दा (1950): चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे और दलाई लामा को भारत में शरण मिलने से संबंधों में खटास आई।
  • 1962 का युद्ध: सीमा विवाद (अक्साई चिन और नेफ़ा/अरुणाचल प्रदेश) को लेकर हुए युद्ध में भारत की हार ने दशकों तक अविश्वास का माहौल बनाए रखा।

सुधार की ओर बढ़ते कदम:

1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा ने एक नया मोड़ दिया। दोनों देशों ने सीमा विवाद को दरकिनार कर आर्थिक सहयोग पर ध्यान देने का फैसला किया। आज भारत और चीन के बीच व्यापार 84 अरब डॉलर से अधिक का है। दोनों देश वैश्विक मंचों (जैसे WTO और पर्यावरण सम्मेलनों) पर विकासशील देशों के हितों के लिए एकजुट होकर लड़ते हैं।


5. अन्य उभरते केंद्र: जापान और दक्षिण कोरिया

एशिया में केवल चीन ही नहीं, बल्कि जापान और दक्षिण कोरिया भी सत्ता के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

जापान: तकनीकी और आर्थिक दिग्गज

दूसरे विश्वयुद्ध में परमाणु हमले की विभीषिका झेलने के बाद जापान ने जो रिकवरी की, वह अद्भुत है। जापान दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 'सोनी', 'पैनासोनिक', 'टोयोटा' जैसे जापानी ब्रांड दुनिया भर में मशहूर हैं। जापान का रक्षा बजट भी दुनिया में सातवें स्थान पर है, जो उसकी सैन्य क्षमता को दर्शाता है।

दक्षिण कोरिया: "हान नदी का चमत्कार"

1950-53 के विनाशकारी युद्ध के बाद दक्षिण कोरिया ने अपनी शिक्षा और तकनीक के दम पर जो विकास किया, उसे "हान नदी का चमत्कार" कहा जाता है। आज यह दुनिया की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 'सैमसंग', 'हुंडई' और 'एलजी' जैसे ब्रांड्स के साथ दक्षिण कोरिया एक वैश्विक तकनीकी लीडर बन चुका है।


निष्कर्ष: एक बहु-ध्रुवीय विश्व की ओर

सत्ता के वैकल्पिक केंद्रों के उदय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य का विश्व 'एक-ध्रुवीय' नहीं रहेगा। यूरोपीय संघ की राजनीतिक एकता, आसियान का सहयोगात्मक मॉडल और चीन की आर्थिक आक्रामकता ने वैश्विक शक्ति संरचना को नया आकार दिया है। भारत के लिए इन संगठनों और देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। सत्ता के ये वैकल्पिक केंद्र न केवल अमेरिका के प्रभुत्व को संतुलित करते हैं, बल्कि वैश्विक शांति, व्यापार और विकास के लिए नए अवसर भी प्रदान करते हैं।

💡 सारांश: 21वीं सदी एशिया की सदी मानी जा रही है। यूरोपीय संघ जहाँ स्थिरता का प्रतीक है, वहीं आसियान और चीन विकास की गति का। भारत को अपनी 'एक्ट ईस्ट' नीति के माध्यम से इन शक्तियों के साथ मिलकर एक समृद्ध और सुरक्षित विश्व के निर्माण में योगदान देना चाहिए।