7: वैश्वीकरण - समकालीन विश्व की एक बहुआयामी प्रक्रिया
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | राजनीति विज्ञान (कक्षा 12)
कल्पना कीजिए कि आप भारत के किसी सुदूर गाँव में बैठे हैं और आपके हाथ में दक्षिण कोरिया का स्मार्टफोन है, आप अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं, और आपके पास स्विस चॉकलेट का स्वाद है। यह कोई जादुई दृश्य नहीं, बल्कि 21वीं सदी की वास्तविकता है जिसे हम 'वैश्वीकरण' (Globalization) कहते हैं। वैश्वीकरण ने दुनिया की भौगोलिक दूरियों को समेट कर उसे एक 'वैश्विक गाँव' (Global Village) में तब्दील कर दिया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसने न केवल व्यापार और अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, बल्कि हमारी राजनीति, संस्कृति और खान-पान के तरीकों को भी पूरी तरह बदल दिया है। इस लेख में हम वैश्वीकरण के अर्थ, इसके प्रमुख कारकों, प्रभावों और इसके प्रति होने वाले वैश्विक विरोध का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
1. वैश्वीकरण का अर्थ और मूल अवधारणा
वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है जिसका अर्थ केवल आर्थिक लेन-देन तक सीमित नहीं है। व्यापक अर्थों में, वैश्वीकरण का तात्पर्य दुनिया भर में विचारों (Ideas), पूँजी (Capital), वस्तुओं (Commodities) और लोगों (People) के निर्बाध प्रवाह से है।
वैश्वीकरण के चार प्रमुख प्रवाह:
- विचारों का प्रवाह: दुनिया के एक हिस्से में उत्पन्न विचार या तकनीक का दूसरे हिस्से में तेजी से पहुँचना। जैसे—लोकतंत्र, मानवाधिकार या इंटरनेट का प्रसार।
- पूँजी का प्रवाह: निवेशकों द्वारा एक देश से दूसरे देश में धन लगाना। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा दूसरे देशों में कारखाने स्थापित करना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
- वस्तुओं का प्रवाह: विभिन्न देशों के बीच व्यापार का विस्तार। अब बाज़ारों में आपको अपनी स्थानीय वस्तुओं के साथ-साथ दुनिया भर के ब्रांड्स के विकल्प मिलते हैं।
- लोगों का प्रवाह: रोजगार, शिक्षा या बेहतर जीवन की तलाश में लोगों का एक देश से दूसरे देश में आवागमन।
वैश्वीकरण की गति को तीव्र करने में 'प्रौद्योगिकी' (Technology) की सबसे बड़ी भूमिका रही है। टेलीग्राफ, टेलीफोन, माइक्रोचिप और इंटरनेट ने संचार की बाधाओं को खत्म कर दिया है। आज न्यूयॉर्क के शेयर बाज़ार में होने वाली हलचल का असर मुंबई के बाज़ार पर कुछ ही सेकंडों में महसूस किया जा सकता है।
2. वैश्वीकरण का विकास: प्राचीन बनाम आधुनिक
वैश्वीकरण कोई एकदम नई प्रक्रिया नहीं है। प्राचीन काल में भी रेशम मार्ग (Silk Route) के जरिए व्यापार होता था और लोग धर्म व ज्ञान के प्रसार के लिए लंबी यात्राएं करते थे। लेकिन आधुनिक वैश्वीकरण पुराने समय से कई मायनों में भिन्न है।
तुलनात्मक विश्लेषण:
- गति और पैमाना: पहले वैश्वीकरण धीमा और सीमित था। आज डिजिटल नेटवर्क के कारण यह अत्यंत तीव्र और व्यापक हो गया है।
- प्रकृति: पुराने समय में सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव प्रमुख था, जबकि आज आर्थिक और तकनीकी एकीकरण प्राथमिक है।
- परिवहन: पुराने समय में समुद्री यात्राएं जोखिमपूर्ण और महीनों लंबी होती थीं, आज हवाई यातायात और 'कंटेनरीकरण' ने माल ढुलाई को सस्ता और सुरक्षित बना दिया है।
3. वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव: राज्य की बदलती भूमिका
राजनीतिक रूप से वैश्वीकरण ने 'राज्य की संप्रभुता' (State Sovereignty) पर बहस छेड़ दी है। क्या राज्य अब भी उतना ही ताकतवर है जितना पहले था?
नकारात्मक प्रभाव (राज्य की शक्ति में कमी):
- न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य: वैश्वीकरण के कारण राज्य अब लोक-कल्याणकारी कार्यों (स्वास्थ्य, शिक्षा) से पीछे हट रहा है और उसका मुख्य कार्य केवल 'कानून-व्यवस्था' बनाए रखना रह गया है।
- बाहरी दबाव: विश्व व्यापार संगठन (WTO) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी संस्थाओं के नियम सरकारों की स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति को प्रभावित करते हैं।
सकारात्मक प्रभाव (राज्य की शक्ति में वृद्धि):
- प्रौद्योगिकी का लाभ: उन्नत तकनीक के कारण अब राज्य अपने नागरिकों के बारे में अधिक जानकारी रख सकता है और शासन को अधिक प्रभावी बना सकता है।
- सहयोग: वैश्विक आतंकवाद और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर देश एक-दूसरे के साथ मिलकर अधिक मजबूत हुए हैं।
यद्यपि वैश्वीकरण ने राज्यों के आर्थिक अधिकारों को सीमित किया है, लेकिन आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धुरी 'राज्य' ही है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा विवाद जैसे मुद्दों पर राज्य की प्रधानता आज भी बरकरार है।
4. वैश्वीकरण का आर्थिक प्रभाव: अवसर और चुनौतियां
आर्थिक वैश्वीकरण ही इस पूरी प्रक्रिया का सबसे दृश्यमान हिस्सा है। इसने वैश्विक स्तर पर उत्पादन और उपभोग के पैटर्न को बदल दिया है।
सकारात्मक पक्ष:
- बाज़ार का विस्तार: उपभोक्ता को कम कीमतों पर बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलते हैं।
- रोजगार के अवसर: विदेशी निवेश (FDI) के कारण विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे का विकास हुआ है और नई नौकरियां पैदा हुई हैं।
- आर्थिक वृद्धि: मुक्त व्यापार के कारण दुनिया की जीडीपी में समग्र रूप से वृद्धि हुई है।
नकारात्मक पक्ष:
- आय असमानता: वैश्वीकरण ने अमीरों को और अमीर बनाया है, जबकि गरीब और पिछड़ते जा रहे हैं। 'सामाजिक सुरक्षा कवच' (Social Safety Net) के बिना गरीबों का जीवन और कठिन हो गया है।
- स्थानीय उद्योगों का विनाश: बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा के सामने छोटे और कुटीर उद्योग टिक नहीं पाते, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है।
- आर्थिक संप्रभुता का ह्रास: देश अपनी आर्थिक नीतियों के लिए विदेशी संस्थाओं और विदेशी पूँजी पर निर्भर हो गए हैं।
5. वैश्वीकरण का सांस्कृतिक प्रभाव: समरूपता बनाम वैविध्य
संस्कृति पर वैश्वीकरण का प्रभाव सबसे अधिक विवादित है। क्या हम सब एक जैसी 'वैश्विक संस्कृति' की ओर बढ़ रहे हैं?
I. सांस्कृतिक समरूपता (Cultural Homogenization):
इसे अक्सर 'मैकडोनाल्डीकरण' (McDonaldization) कहा जाता है। इसमें पश्चिमी संस्कृति, विशेषकर अमेरिकी जीवनशैली (जीन्स पहनना, बर्गर खाना, अंग्रेजी बोलना) पूरी दुनिया पर हावी हो रही है। इससे स्थानीय संस्कृतियों के विलुप्त होने का डर है।
II. सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण (Cultural Heterogenization):
वैश्वीकरण केवल स्थानीय संस्कृति को खत्म नहीं करता, बल्कि उसे एक नया रूप भी देता है। इसे 'हाइब्रिडिटी' (Hybridity) कहते हैं। उदाहरण के लिए, नीली जीन्स के साथ खादी का कुर्ता पहनना या डोसा-बर्गर का चलन। यह संस्कृतियों के मिश्रण से एक नई विविधता पैदा करता है।
6. भारत और वैश्वीकरण: 1991 के आर्थिक सुधार
भारत ने आज़ादी के बाद 'संरक्षणवाद' और आत्मनिर्भरता की नीति अपनाई थी। लेकिन 1991 के भुगतान संतुलन के संकट के बाद भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोल दिया।
भारत पर प्रभाव:
- सेवा क्षेत्र की क्रांति: सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और बीपीओ (BPO) के क्षेत्र में भारत एक वैश्विक महाशक्ति बनकर उभरा। बैंगलोर जैसे शहर 'भारत के सिलिकॉन वैली' कहलाने लगे।
- उपभोक्तावाद: मध्यम वर्ग की संख्या और उनकी क्रय शक्ति में भारी वृद्धि हुई। वैश्विक ब्रांड्स अब भारत के हर शहर में उपलब्ध हैं।
- चुनौतियाँ: कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएं और पारंपरिक बुनकरों व कारीगरों की दुर्दशा वैश्वीकरण के स्याह पक्ष को दर्शाती है। नीम और हल्दी जैसी औषधियों को अमेरिकी कंपनियों द्वारा पेटेंट कराने के प्रयासों ने 'बायो-पायरेसी' की चिंता पैदा की है।
7. वैश्वीकरण का प्रतिरोध: क्यों हो रहा है विरोध?
वैश्वीकरण के आलोचक इसे 'नव-साम्राज्यवाद' का एक रूप मानते हैं। इसके विरोध के मुख्य रूप से दो वैचारिक खेमे हैं:
वामपंथी प्रतिरोध (Leftist Critique):
- उनका मानना है कि वैश्वीकरण पूँजीवाद की एक ऐसी अवस्था है जो केवल धनी वर्ग और धनी देशों के हितों की पूर्ति करती है।
- इससे राज्य की लोक-कल्याणकारी भूमिका खत्म हो रही है और गरीब लोग बिना किसी सुरक्षा के बाजार के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।
दक्षिणपंथी प्रतिरोध (Right-wing Critique):
- इन्हें डर है कि वैश्वीकरण से उनकी 'पारंपरिक संस्कृति' और 'जीवन-मूल्य' नष्ट हो जाएंगे।
- वे 'स्वदेशी' और 'आर्थिक आत्मनिर्भरता' (संरक्षणवाद) की वापसी चाहते हैं। वे विदेशी टीवी चैनलों और पाश्चात्य त्यौहारों (जैसे वैलेंटाइन डे) का विरोध करते हैं।
यह वैश्वीकरण-विरोधी कार्यकर्ताओं का एक अंतरराष्ट्रीय मंच है। इसमें मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर और महिला संगठन शामिल हैं। इसकी पहली बैठक 2001 में ब्राजील (पोर्टो अलगेरे) में हुई थी। यह 'नव-उदारवादी वैश्वीकरण' के खिलाफ एक वैकल्पिक वैश्विक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
8. महत्वपूर्ण घटना: सिएटल विरोध (1999)
1999 में अमेरिका के सिएटल में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की मंत्री-स्तरीय बैठक हुई। यहाँ हज़ारों लोगों ने प्रदर्शन किया। विरोधियों का तर्क था कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था विकासशील देशों के हितों की अनदेखी कर रही है और व्यापार के नियम केवल ताकतवर देशों के पक्ष में बनाए जा रहे हैं। इसे वैश्वीकरण के खिलाफ 'जनता की पहली संगठित आवाज' माना जाता है।
निष्कर्ष: एक न्यायसंगत वैश्वीकरण की ओर
वैश्वीकरण एक अनिवार्य वास्तविकता है जिसे अब वापस नहीं लौटाया जा सकता। चुनौती यह नहीं है कि वैश्वीकरण को रोका जाए, बल्कि यह है कि इसे कैसे 'न्यायसंगत' (Fair) बनाया जाए। वैश्वीकरण के लाभों का वितरण समान होना चाहिए ताकि विकासशील देशों के किसानों, मजदूरों और लघु उद्योगों को भी इसका फायदा मिल सके। भारत जैसे देश को अपनी डिजिटल शक्ति और युवा श्रम का उपयोग करते हुए वैश्वीकरण को अपनी शर्तों पर ढालना होगा।
