अध्याय-8. किसान, ज़मींदार और राज्य: कृषि समाज और मुगल साम्राज्य
📅 Date: 24 February 2026 (Tuesday)
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में लगभग 85% लोग गाँवों में रहते थे। यह अध्याय मुग़लकालीन ग्रामीण समाज के ताने-बाने, किसानों, जमींदारों और राज्य के बीच के जटिल रिश्तों का विश्लेषण करता है। यह अध्ययन 'आइन-ए-अकबरी' जैसे ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित है।
1. आइन-ए-अकबरी: मुग़ल प्रशासन का दर्पण
आइन-ए-अकबरी, अकबरनामा (अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल द्वारा रचित) का तीसरा भाग है। इसे 1598 ई. में पूरा किया गया।
आइन के पाँच भाग (दफ्तर):
- मंज़िल-आबादी: शाही घर-परिवार और उसके रख-रखाव का विवरण।
- सिपह-आबादी: सैनिक व नागरिक प्रशासन और मनसबदारों की जानकारी।
- मुल्क-आबादी: सबसे महत्वपूर्ण भाग। इसमें साम्राज्य के वित्तीय पहलुओं, राजस्व दरों और "बारह प्रांतों का बयान" है।
- चतुर्थ व पंचम भाग: भारत के लोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों का वर्णन।
इसमें दिए गए संख्यात्मक आँकड़ों में कुछ विषमताएँ हैं। साथ ही, कीमतें और मजदूरी की दरें मुख्य रूप से राजधानी आगरा और उसके आसपास के क्षेत्रों से ली गई हैं, जो पूरे साम्राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।
2. किसान और कृषि उत्पादन
किसानों के लिए फारसी स्रोतों में रैयत (बहुवचन: रिआया) या मुज़रियान शब्द का प्रयोग होता था।
किसानों के प्रकार:
- खुद-काश्त: वे किसान जो उसी गाँव में रहते थे जहाँ उनकी ज़मीन थी।
- पाहि-काश्त: वे खेतिहर जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे (स्वेच्छा से या मजबूरी में)।
फसलें और तकनीक
- फसल चक्र: दो मुख्य फसलें होती थीं— खरीफ़ (पतझड़) और रबी (वसंत)।
- जिन्स-ए-कामिल: इसका अर्थ है 'सर्वोत्तम फसलें' (नकदी फसलें)। जैसे—कपास (दक्कन), गन्ना (बंगाल), तिलहन और दलहन।
- नई फसलें: मक्का (अफ्रीका/स्पेन से), तंबाकू, टमाटर, आलू, मिर्च (नई दुनिया से) इसी काल में भारत आए।
- सिंचाई: कुओं और तालाबों के अलावा राज्य द्वारा नहरों का निर्माण (जैसे शाहजहाँ द्वारा पंजाब में 'शाह नहर')।
3. ग्रामीण समुदाय और पंचायत
गाँव का समाज तीन घटकों से बना था: खेतिहर किसान, पंचायत और मुखिया।
जाति और पंचायत
- जाति पंचायतें: हर जाति की अपनी पंचायत होती थी जो दीवानी झगड़ों और विवाह आदि का निपटारा करती थी।
- मुख्य पंचायत: यह गाँव के बुजुर्गों का समूह था (अल्पतंत्र)। इसका फैसला सबको मानना पड़ता था।
- मुखिया (मुक़द्दम/मंडल): इसका चुनाव बुजुर्गों की सहमति से होता था। इसका मुख्य काम गाँव की आय-व्यय का हिसाब रखना और पटवारी की निगरानी करना था।
बंगाल में ज़मींदार दस्तकारों (लोहार, बढ़ई, सुनार) को उनकी सेवाओं के बदले रोज का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे। वस्तु-विनिमय और सेवाओं के इस आदान-प्रदान को 'जजमानी प्रथा' कहा जाता था।
4. कृषि समाज में महिलाएँ
महिलाएँ उत्पादन प्रक्रिया का अभिन्न अंग थीं। वे बुआई, निराई, कटाई और अनाज साफ करने में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती थीं।
- भेदभाव: कुछ पूर्वाग्रह थे (जैसे मासिक धर्म के समय पान के बागान में प्रवेश वर्जित)।
- अधिकार: इसके बावजूद, महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक था और वे जमींदारी भी संभाल सकती थीं (इसके प्रमाण राजस्थान और पंजाब से मिले हैं)।
5. ज़मींदार: ग्रामीण कुलीन वर्ग
ज़मींदार खेती नहीं करते थे, लेकिन वे जमीन के मालिक (मिल्कियत) थे और उनकी सामाजिक स्थिति उच्च थी।
- शक्ति के स्रोत: जाति (प्रायः उच्च जाति), व्यक्तिगत जमीन, और राज्य की ओर से कर वसूलने का अधिकार।
- सैन्य शक्ति: उनके पास अपने किले (गढ़ी) और सैनिक होते थे।
- भूमिका: वे राज्य और किसानों के बीच की कड़ी थे। वे खेती को बढ़ावा देते थे और हाट-बाज़ारों का आयोजन करते थे।
6. मुग़ल भू-राजस्व प्रणाली
भू-राजस्व (Land Revenue) साम्राज्य की आर्थिक रीढ़ था। अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने इसे व्यवस्थित किया।
जब्ती प्रणाली की विशेषताएँ:
- कर निर्धारण: पहले जमीन की पैमाइश (नपाई) की जाती थी।
- भूमि का वर्गीकरण: उत्पादकता के आधार पर चार प्रकार:
- पोलज: जिस पर हर साल खेती हो।
- परौती: जिसे उर्वरा शक्ति पाने के लिए कुछ समय खाली छोड़ा जाए।
- चचर: 3-4 साल खाली पड़ी जमीन।
- बंजर: 5 साल या उससे ज्यादा समय से बेकार जमीन।
- जमा और हासिल:
- जमा: निर्धारित राजस्व (Estimated)।
- हासिल: वास्तव में वसूला गया राजस्व (Actual Collection)।
- अधिकारी: अमील-गुज़ार (राजस्व वसूलने वाला) और अमीन (नियम पालन सुनिश्चित करने वाला)।
7. मनसबदारी और चाँदी का बहाव
- मनसबदारी व्यवस्था: यह अकबर द्वारा शुरू की गई एक अद्वितीय प्रशासनिक प्रणाली थी। 'मनसब' का अर्थ है पद/रैंक। हर अधिकारी को एक मनसब (जात और सवार) दिया जाता था, जो उसके वेतन और सैन्य दायित्व को निर्धारित करता था।
- चाँदी का बहाव: 17वीं सदी में भारत का विदेशी व्यापार बहुत बढ़ा। भारतीय माल के बदले दुनिया भर से (विशेषकर नई दुनिया/अमेरिका से) भारी मात्रा में चाँदी भारत आई। इससे मुग़ल राज्य को नकद कर वसूलने में आसानी हुई और अर्थव्यवस्था में स्थिरता आई। (इसका वर्णन इतालवी यात्री जोवान्नी कारेरी ने किया है)।
8. जंगल और कबीलाई समाज
उस समय जंगलों को 'मवास' (बदमाशों का अड्डा) माना जाता था जहाँ विद्रोही शरण लेते थे।
- कबीलाई जीवन: वे शिकार, संग्रहण और स्थानांतरीय कृषि (झूम खेती) पर निर्भर थे।
- पेशकश: कबीलाई सरदार अक्सर बादशाह को हाथियों की भेंट (पेशकश) देते थे।
- वाणिज्यिक खेती: धीरे-धीरे जंगलों में भी वाणिज्यिक खेती (जैसे मधु, लाख) का विस्तार हुआ और वे बाहरी दुनिया से जुड़ते गए।