विद्रोही और राज: 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान
📅 विस्तृत अध्ययन नोट्स | इतिहास (कक्षा 12)
1857 की क्रांति भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना थी। यह न केवल एक सैन्य विद्रोह था, बल्कि यह औपनिवेशिक शासन के प्रति दशकों से संचित राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक असंतोष का विस्फोट था। 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुई यह ज्वाला देखते ही देखते उत्तर और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से में फैल गई, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी।
1. क्रांति का स्वरूप: अलग-अलग दृष्टिकोण
1857 की क्रांति के स्वरूप को लेकर इतिहासकारों और समकालीन विद्वानों के बीच गहरे मतभेद रहे हैं। इसे मुख्य रूप से दो श्रेणियों में देखा जा सकता है:
ब्रिटिश दृष्टिकोण (British Perspective)
- सिपाही विद्रोह: कई ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे केवल अनुशासित सैनिकों का एक सीमित विद्रोह माना।
- धार्मिक कट्टरता: कुछ ने इसे 'ईसाई धर्म' के विरुद्ध 'सभ्यता और बर्बरता' का संघर्ष बताया।
भारतीय दृष्टिकोण (Indian Perspective)
- प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: विनायक दामोदर सावरकर ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला सुव्यवस्थित 'राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम' कहा।
- जनक्रांति: आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि यह एक जनक्रांति थी जिसमें किसान, जमींदार, कारीगर और आम नागरिक भी शामिल थे।
2. क्रांति के गहरे कारण: राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषण
विद्रोह रातों-रात पैदा नहीं हुआ था; इसके पीछे ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियां थीं।
राजनीतिक कारण: संधियों और हड़प की राजनीति
लॉर्ड वैलेजली द्वारा शुरू की गई इस संधि ने भारतीय राज्यों की स्वायत्तता छीन ली। इसके तहत भारतीय राजाओं को अपने यहाँ ब्रिटिश सेना रखनी पड़ती थी, जिसका खर्च वे खुद उठाते थे, और उनके दरबार में एक ब्रिटिश रेजीडेंट तैनात होता था। वे किसी अन्य विदेशी शक्ति से संबंध नहीं रख सकते थे।
लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति (Doctrine of Lapse): डलहौजी ने इस नीति के माध्यम से उन रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जिनके राजाओं का कोई जैविक (अपना) उत्तराधिकारी नहीं था। दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया गया, जिससे सतारा, झांसी और नागपुर जैसी रियासतें हड़प ली गईं।
आर्थिक कारण: शोषण का चक्र
- भू-राजस्व प्रणालियाँ: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवारी और महालवारी व्यवस्थाओं ने किसानों और जमींदारों पर करों का असहनीय बोझ डाल दिया।
- विऔद्योगिकीकरण (De-industrialization): ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय हस्तशिल्प और कपड़ा उद्योग को सुनियोजित तरीके से नष्ट कर दिया, जिससे लाखों कारीगर बेरोजगार हो गए।
3. सामाजिक, धार्मिक और सैन्य कारण
ब्रिटिश शासन ने भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान पर भी प्रहार करना शुरू किया था।
सामाजिक-धार्मिक हस्तक्षेप
- सुधार बनाम आक्रमण: सती प्रथा उन्मूलन (1829) और विधवा विवाह की वैधता को हिंदू समाज के रूढ़िवादी वर्गों ने अपने धर्म पर हमला माना।
- ईसाई मिशनरियाँ: मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन के प्रयासों और सरकारी नौकरियों में ईसाई बने लोगों को प्राथमिकता देने से समाज में भय व्याप्त हो गया।
सैनिकों का असंतोष और तात्कालिक कारण
भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सैनिकों की तुलना में कम वेतन और कम सुविधाएं मिलती थीं। साथ ही, उन्हें समुद्र पार युद्ध के लिए भेजा जाना उनके धर्म के विरुद्ध माना जाता था।
1857 के विद्रोह का मुख्य तात्कालिक कारण 'एनफील्ड राइफल' थी। अफ़वाह फैली कि इसके कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी का लेप लगा है, जिसे मुँह से खोलना पड़ता था। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के सैनिकों की भावनाएं आहत हुईं। मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में इसके खिलाफ आवाज़ उठाई और अधिकारियों पर हमला कर दिया।
4. विद्रोह के केंद्र और उनके नेतृत्वकर्ता
विद्रोह जैसे-जैसे फैला, विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय नेताओं ने कमान संभाली:
| विद्रोह का स्थान | प्रमुख नेतृत्वकर्ता | विशेष विवरण |
|---|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह ज़फ़र (सेनापति: बख्त खान) | मुगल सम्राट को विद्रोह का प्रतीक घोषित किया गया। |
| कानपुर | नाना साहिब | पेशवा बाजीराव-2 के दत्तक पुत्र। |
| झांसी | रानी लक्ष्मी बाई | दत्तक पुत्र को मान्यता न मिलने पर युद्ध छेड़ा। |
| बिहार (आरा) | कुँवर सिंह | 80 वर्ष की आयु में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी। |
| लखनऊ (अवध) | बेगम हजरत महल / बिरजिस क़द्र | नवाब वाजिद अली शाह के निर्वासन के बाद कमान संभाली। |
| बरेली | खान बहादुर खान | रुहेलखंड के नेता के रूप में उभरे। |
5. अवध में विद्रोह: एक विशेष अध्ययन
अध्याय में अवध के विद्रोह को विशेष महत्व दिया गया है। लॉर्ड डलहौजी ने 1851 में अवध के बारे में कहा था— "यह गिलास फल (Cherry) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।"
अवध को 'बंगाल आर्मी की पौधशाला' कहा जाता था क्योंकि बंगाल सेना के अधिकांश सिपाही अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से आते थे। जब अंग्रेजों ने 1856 में कुशासन का आरोप लगाकर नवाब वाजिद अली शाह को निर्वासित किया, तो न केवल दरबार के लोग बल्कि किसान और सैनिक भी मर्माहत हुए। ताल्लुक़दारों की जमीनें छीनने के लिए 'एकमुश्त बंदोबस्त' नीति लागू की गई, जिससे पूरा ग्रामीण समाज अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हो गया।
6. विद्रोही क्या चाहते थे? (एकता और वैकल्पिक सत्ता)
विद्रोहियों के घोषणापत्रों (इश्तहारों) से पता चलता है कि वे केवल अंग्रेजों को भगाना नहीं चाहते थे, बल्कि एक नई व्यवस्था बनाना चाहते थे।
- हिंदू-मुस्लिम एकता: विद्रोहियों ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर लड़ने का आह्वान किया। दिल्ली की घोषणाओं में हिंदू-मुस्लिम सहअस्तित्व पर जोर दिया गया।
- उत्पीड़न का अंत: वे उस भू-राजस्व व्यवस्था और साहूकारी प्रथा को समाप्त करना चाहते थे जिसने आम जनता को कंगाल बना दिया था।
- वैकल्पिक प्रशासन: दिल्ली और लखनऊ में विद्रोहियों ने अपनी सरकारें बनाईं, राजस्व वसूलने की कोशिश की और सैन्य आदेश जारी किए। यह दर्शाता है कि वे ब्रिटिश शासन का विकल्प तैयार कर रहे थे।
7. विद्रोह का दमन और परिणाम
ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह को कुचलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।
दमन के तरीके:
- मार्शल लॉ: उत्तर भारत में सैन्य कानून लागू किया गया। आम ब्रिटिश नागरिकों को भी विद्रोहियों को सजा देने का हक दिया गया।
- अत्यधिक बर्बरता: विद्रोहियों को तोप के मुँह पर बांधकर उड़ा दिया गया या सरेआम फांसी दी गई। गाँवों के गाँव जला दिए गए।
- फूट डालो और राज करो: जमींदारों को उनकी जागीरें वापस करने का लालच देकर विद्रोहियों से अलग किया गया।
क्रांति के परिणाम (1858):
- कंपनी शासन का अंत: भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी) के हाथों में चला गया।
- वायसराय का पद: गवर्नर जनरल को अब 'वायसराय' कहा जाने लगा (प्रथम वायसराय: लॉर्ड कैनिंग)।
- सेना में बदलाव: भारतीय सिपाहियों की संख्या घटाई गई और यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ाया गया ताकि भविष्य में ऐसा विद्रोह न हो।
- धार्मिक हस्तक्षेप पर रोक: ब्रिटिश सरकार ने भारतीय धर्म और परंपराओं में हस्तक्षेप न करने का वादा किया।
8. विद्रोह की स्मृतियाँ और व्याख्यान
इतिहास में 1857 को जिस तरह से चित्रित किया गया है, वह पक्षपाती दृष्टिकोण का उदाहरण है।
- ब्रिटिश चित्रण: 'रिलीफ ऑफ लखनऊ' (थॉमस जोन्स बार्कर) जैसे चित्रों में अंग्रेजों को रक्षक और नायकों के रूप में दिखाया गया। 'इन मेमोरियम' (जोसेफ नोएल पेटन) में ब्रिटिश महिलाओं की लाचारी दिखाकर प्रतिशोध की भावना को हवा दी गई।
- भारतीय राष्ट्रवादी चित्रण: बीसवीं सदी में राष्ट्रवादियों ने इसे गौरवमयी गाथा के रूप में पेश किया। झांसी की रानी को एक महान नायिका के रूप में 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' जैसी कविताओं के माध्यम से अमर कर दिया गया।
