अध्याय-1. ईंटें, मनके और अस्थियाँ: हड़प्पा सभ्यता
📅 Date: 24 February 2026 (Tuesday)
हड़प्पा सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और नगरीय सभ्यताओं में से एक थी। यह अपने सुव्यवस्थित नगर नियोजन, उन्नत जल निकासी प्रणाली, और विशिष्ट शिल्प कार्यों के लिए प्रसिद्ध है। इस विस्तृत अध्ययन में हम इस सभ्यता के हर पहलू—खोज से लेकर पतन तक—का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
1. संस्कृति और खोज (Culture & Discovery)
'संस्कृति' शब्द का अर्थ
पुरातत्वविद ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग पुरावस्तुओं (Artifacts) के ऐसे समूह के लिए करते हैं जो एक विशिष्ट शैली के होते हैं और सामान्यतया एक साथ, एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र तथा काल-खंड से संबद्ध पाए जाते हैं। हड़प्पा के संदर्भ में इन वस्तुओं में मुहरें, मनके, बाट, पत्थर के फलक और पकी हुई ईंटें शामिल हैं।
ऐतिहासिक खोजें
- 1921 (दयाराम साहनी): हड़प्पा की खुदाई की और प्राचीनतम मुहरें खोज निकालीं।
- 1922 (राखाल दास बनर्जी): मोहनजोदड़ो से हड़प्पा के समान मुहरें खोजीं, जिससे यह अनुमान लगा कि दोनों एक ही संस्कृति का हिस्सा हैं।
- 1924 (सर जॉन मार्शल): भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) के डायरेक्टर जनरल के रूप में उन्होंने पूरे विश्व के समक्ष 'सिंधु घाटी' में एक नवीन सभ्यता की खोज की विधिवत घोषणा की।
वे भारत में कार्य करने वाले पहले पेशेवर पुरातत्वविद थे। एस.एन. राव ने अपनी पुस्तक 'द स्टोरी ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॉजी' में लिखा है, ‘‘मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हज़ार वर्ष पीछे छोड़ा।’’ (क्योंकि उन्होंने भारत के इतिहास को वैदिक काल से पीछे धकेल दिया)।
2. कालक्रम और बस्तियाँ (Chronology & Settlements)
हड़प्पा सभ्यता का काल 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. के बीच माना जाता है।
आरंभिक और परवर्ती हड़प्पा
- आरंभिक हड़प्पा: सिंध और चोलिस्तान (पाकिस्तान का रेगिस्तानी क्षेत्र) में थीं। यहाँ बस्तियाँ छोटी थीं और बड़े भवनों का अभाव था।
- क्रम-भंग (The Break): कई स्थलों पर बड़े पैमाने पर आग लगने और बस्तियों को त्यागने के संकेतों से पता चलता है कि आरंभिक हड़प्पा और परिपक्व हड़प्पा सभ्यता के बीच एक स्पष्ट अंतराल या 'क्रम-भंग' था।
3. हड़प्पाई मुहरें, लिपि और धर्म
हड़प्पाई मुहर (Harappan Seal)
यह सेलखड़ी (Steatite) नामक मुलायम पत्थर से बनाई जाती थी। इन मुहरों पर जानवरों के चित्र और एक रहस्यमयी लिपि के चिह्न उकेरे गए हैं। इनका प्रयोग लंबी दूरी के व्यापार में सामान की सुरक्षा (सीलबंदी) के लिए होता था।
'आद्य शिव' और धार्मिक विश्वास
एक प्रसिद्ध मुहर पर पालथी मारे बैठे 'योगी' की आकृति मिली है, जिसे जानवरों ने घेरा हुआ है।
- जॉन मार्शल का मत: उन्होंने इसे 'आद्य शिव' (Proto-Shiva) यानी शिव का प्रारंभिक रूप माना।
- विरोध: ऋग्वेद में रूद्र (शिव) का वर्णन है, लेकिन उन्हें 'पशुपति' या 'योगी' के रूप में नहीं दिखाया गया है।
- आधुनिक मत: कई इतिहासकार इसे 'शमन' (Shaman) मानते हैं—वह व्यक्ति जिसके पास जादुई और इलाज करने की शक्तियाँ होती हैं।
- रहस्यमयी: इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
- चित्रात्मक: यह वर्णमालीय नहीं थी (इसमें वर्णमाला के अक्षर नहीं थे)।
- चिह्नों की संख्या: 375 से 400 के बीच।
- दिशा: यह दाईं से बाईं ओर (Right to Left) लिखी जाती थी (क्योंकि दाईं ओर अंतराल चौड़ा है और बाईं ओर संकुचित)।
4. निर्वाह और कृषि प्रौद्योगिकी (Subsistence & Agriculture)
भोजन और पशुपालन
फसलें: गेहूँ, जौ, दाल, सफ़ेद चना, तिल। गुजरात के स्थलों से बाजरे के दाने मिले हैं, लेकिन चावल के साक्ष्य बहुत कम हैं।
पशु: हड़प्पावासी भेड़, बकरी, भैंस और सूअर पालते थे।
कृषि प्रौद्योगिकी (High Yield Facts)
कृषि के लिए उन्नत तकनीकों का प्रयोग किया जाता था:
- हल का प्रयोग: चोलिस्तान और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के हल (Toy Plough) के प्रतिरूप मिले हैं।
- जुता हुआ खेत (Ploughed Field): कालीबंगन (राजस्थान) से साक्ष्य मिले हैं। यहाँ खेत में हल रेखाओं के दो समूह एक-दूसरे को समकोण पर काटते हैं, जो दर्शाता है कि एक साथ दो अलग-अलग फ़सलें (मिश्रित कृषि) उगाई जाती थीं।
- सिंचाई: शोर्तुघई (अफ़गानिस्तान) से नहरों के अवशेष मिले हैं (पंजाब/सिंध में नहीं)। धौलावीरा (गुजरात) से जलाशयों (Reservoirs) के साक्ष्य मिले हैं, जो जल संचयन के लिए प्रयुक्त होते थे।
अनाज पीसने के लिए अवतल चक्कियाँ (Saddle Querns) मिली हैं। इनमें से कुछ पत्थरों का प्रयोग केवल जड़ी-बूटियों और मसालों को कूटने के लिए होता था, जिसे पुरातत्वविदों ने 'सालन पत्थर' नाम दिया है।
5. मोहनजोदड़ो: एक नियोजित शहरी केंद्र
मोहनजोदड़ो का नगर नियोजन अद्भुत था। शहर दो भागों में विभाजित था:
- दुर्ग (Citadel): यह हिस्सा छोटा था लेकिन ऊँचाई पर बना था (कच्ची ईंटों के चबूतरे पर)। इसमें विशिष्ट सार्वजनिक भवन (जैसे मालगोदाम, स्नानागार) थे। इसे दीवार से घेरा गया था।
- निचला शहर (Lower Town): यह बड़ा था लेकिन नीचे स्थित था। यहाँ आम लोगों के आवास थे।
जल निकास प्रणाली (Drainage System)
हड़प्पा शहरों की सबसे अनूठी विशेषता।
- ग्रिड पद्धति: सड़कों और गलियों को एक ‘ग्रिड’ पैटर्न में बनाया गया था, जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
- योजना: पहले नालियों के साथ गलियों को बनाया गया, फिर उनके अगल-बगल घर बनाए गए।
- अर्नेस्ट मैके का कथन: ‘‘निश्चित रूप से यह अब तक खोजी गई सर्वथा संपूर्ण प्राचीन प्रणाली है।’’
विशाल स्नानागार (The Great Bath)
दुर्ग क्षेत्र में मिला एक आयताकार जलाशय।
- यह चारों ओर से गलियारे से घिरा था।
- Waterproofing: ईंटों को जमाने के लिए जिप्सम के गारे का प्रयोग किया गया था ताकि पानी लीक न हो।
- उपयोग: इसका प्रयोग विशेष 'आनुष्ठाानिक स्नान' (Ritual Bath) के लिए किया जाता था।
6. सामाजिक भिन्नता और विलासिता
पुरातत्वविद सामाजिक अंतर को समझने के लिए शवाधानों और विलासिता की वस्तुओं का अध्ययन करते हैं。
शवाधान (Burials)
हड़प्पा के लोग मिस्र के पिरामिडों की तरह मृतकों के साथ बहुत धन-संपत्ति नहीं दफनाते थे।
- मृतकों को गर्तों (Pits) में दफनाया जाता था।
- कुछ कब्रों में मृदभाण्ड और आभूषण मिले हैं (हड़प्पा में एक पुरुष की खोपड़ी के पास शंख के तीन छल्ले मिले)।
- तांबे के दर्पण भी मिले हैं।
विलासिता की वस्तुएँ (Luxury Goods)
- दैनिक उपयोग: चक्कियाँ, सुइयां, मृदभाण्ड (पत्थर/मिट्टी से बनीं)।
- विलासिता (Luxury): वे वस्तुएँ जो दुर्लभ हों या जिन्हें बनाना कठिन हो। उदाहरण: फ़ेयॉन्स (Faience)। यह रेत, रंग और चिपचिपे पदार्थ को पकाकर बनाया गया कीमती पात्र था। इसके छोटे पात्र इत्र रखने के काम आते थे।
7. शिल्प उत्पादन और व्यापार
चन्हुदड़ो (Chanhudaro): यह मोहनजोदड़ो (125 हेक्टेयर) की तुलना में बहुत छोटी बस्ती (7 हेक्टेयर) थी, लेकिन यह लगभग पूरी तरह से शिल्प उत्पादन (मनके बनाना, शंख कटाई, मुहर निर्माण) में संलग्न थी।
- शंख (Shell): नागेश्वर और बालाकोट (समुद्र तट के पास)।
- लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli): शोर्तुघई (अफ़गानिस्तान) - यह नीले रंग का कीमती पत्थर था।
- कार्नीलियन (Carnelian): लोथल (भरूच, गुजरात) - लाल रंग का पत्थर।
- तांबा (Copper): खेतड़ी (राजस्थान) और ओमान (Magan)।
- सोना (Gold): दक्षिण भारत (संभवतः कोलार)।
- सेलखड़ी (Steatite): दक्षिणी राजस्थान और उत्तरी गुजरात।
गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति
राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र में मिली एक अलग संस्कृति, जिसके मृदभाण्ड हड़प्पा से अलग थे। यहाँ तांबे की प्रचुरता थी और संभवतः यह हड़प्पा को तांबा भेजते थे।
सुदूर व्यापार (Long Distance Trade)
मेसोपोटामिया के लेखों में हड़प्पा क्षेत्र के लिए 'मेलुहा' (Meluha) शब्द का प्रयोग हुआ है।
- मेलुहा को 'नाविकों का देश' कहा गया।
- हाजा पक्षी (Haja Bird) का जिक्र है, जो संभवतः मोर (Peacock) था।
- दिलमुन (बहरीन) और मगान (ओमान) मध्यस्थ बंदरगाह थे।
8. राजनैतिक व्यवस्था (Political Authority)
हड़प्पा समाज में जटिल फैसले कौन लेता था? इस पर तीन प्रमुख मत हैं:
- कोई शासक नहीं: सभी की सामाजिक स्थिति समान थी।
- कई शासक: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के अलग-अलग राजा थे।
- एकल राज्य (सबसे मान्य): पुरावस्तुओं में अद्भुत समानता (ईंटों का अनुपात जम्मू से गुजरात तक एक जैसा था), नियोजित बस्तियाँ और ईंट बनाने के भट्ठों की स्थिति यह दर्शाती है कि यह एक संगठित केंद्रीय सत्ता द्वारा नियंत्रित था।
नोट: मोहनजोदड़ो से मिली एक पत्थर की मूर्ति को 'पुरोहित-राजा' (Priest King) कहा गया, लेकिन यह नामकरण मेसोपोटामिया के आधार पर था, हड़प्पा की अपनी राजनीति स्पष्ट नहीं है।
9. सभ्यता का पतन (The Decline)
1900 ई.पू. के बाद सभ्यता के मानक (Standardization) खत्म होने लगे। पतन के कारण:
आर्य आक्रमण का सिद्धांत (और उसका खंडन)
- आरोप: आर.ई.एम. व्हीलर ने ऋग्वेद में इंद्र को 'पुरंदर' (किलों को तोड़ने वाला) कहा और मोहनजोदड़ो की 'डैडमैन लेन' में मिले कंकालों को आर्य आक्रमण का सबूत बताया।
- खंडन: 1960 के दशक में जॉर्ज डेल्स ने सिद्ध किया कि ये कंकाल अलग-अलग काल के थे, एक ही समय के नरसंहार के नहीं। अतः आक्रमण का सिद्धांत खारिज हो गया।
मान्य कारण
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change)।
- सरस्वती नदी का सूखना या मार्ग बदलना।
- अत्यधिक बाढ़ और वनों की कटाई।
- संभवतः एक सुदृढ़ एकीकरण (State Machinery) का अंत हो गया था।
10. महत्वपूर्ण पुस्तकें (Exam Special)
2. The Story of Indian Archaeology: एस.एन. राव
3. My Archaeological Mission to India and Pakistan: आर.ई.एम. व्हीलर (इन्होंने खुदाई में 'सैनिक परिशुद्धता' और 'स्तर-विन्यास' तकनीक लाई)।
4. Early Indus Civilization: अर्नेस्ट मैके
