भारतीय अर्थव्यवस्था 1950-1990: एक विस्तृत विश्लेषण
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | भारतीय आर्थिक विकास (कक्षा 12)
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने एक जर्जर और गतिहीन अर्थव्यवस्था थी, जिसे ब्रिटिश शासन ने सदियों तक निचोड़ा था। स्वतंत्र भारत के नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि विकास का कौन सा मॉडल अपनाया जाए? क्या हम पूरी तरह पूँजीवादी बनें या समाजवादी? अंततः भारत ने एक 'मध्यम मार्ग' चुना, जिसे 'नियोजित मिश्रित अर्थव्यवस्था' कहा गया। 1950 से 1990 की अवधि भारतीय आर्थिक इतिहास में 'संरक्षणवाद' और 'राज्य के प्रभुत्व' का काल रही है। इस दौरान भारत ने खाद्यान्न संकट से निकलकर आत्मनिर्भरता प्राप्त की और एक औद्योगिक आधार तैयार किया। इस लेख में हम पंचवर्षीय योजनाओं, कृषि सुधारों, हरित क्रांति और औद्योगिक नीति 1956 का अत्यंत सूक्ष्म एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे।
1. आर्थिक नियोजन: संकल्पना और संस्थागत ढांचा
नियोजन (Planning) का अर्थ है—राष्ट्र के सीमित संसाधनों का कुशलतम अनुमान लगाना और उन्हें पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्राथमिकता के आधार पर आवंटित करना। भारत ने यह विचार सोवियत संघ (USSR) से ग्रहण किया था।
योजना आयोग (Planning Commission):
1950 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में योजना आयोग की स्थापना की गई। इसने भारत के आर्थिक भाग्य को 'पंचवर्षीय योजनाओं' के सांचे में ढालना शुरू किया।
- पंचवर्षीय योजनाएँ: ये अल्पकालिक (5 वर्ष) लक्ष्य होते थे जो आर्थिक विकास की दिशा तय करते थे।
- परिप्रेक्ष्यात्मक योजना (Perspective Plan): यह एक दीर्घकालिक विजन (15-20 वर्ष) होता था, जिसे पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से छोटे-छोटे हिस्सों में प्राप्त किया जाता था।
2. पंचवर्षीय योजनाओं के चार महा-लक्ष्य
1950 से 1990 तक की सभी योजनाओं के मूल में चार प्रमुख उद्देश्य समाहित थे, जिन्हें विकास के स्तंभ माना गया:
- संवृद्धि (Growth): इसका अर्थ है वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन क्षमता बढ़ाना। इसका प्रामाणिक सूचक 'जीडीपी' (GDP) में निरंतर वृद्धि है। यदि जीडीपी का केक बड़ा होगा, तभी समाज के हर हिस्से को अधिक मिलेगा।
- आधुनिकीकरण (Modernization): इसमें न केवल नई तकनीक (जैसे—हाइब्रिड बीज, मशीनें) को अपनाना शामिल था, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव भी शामिल था। जैसे—महिलाओं को कार्यक्षेत्र में समान अवसर देना।
- आत्मनिर्भरता (Self-reliance): इसका उद्देश्य उन चीजों के आयात से बचना था जिन्हें भारत में बनाया जा सकता था। विशेषकर खाद्यान्न के मामले में भारत 'हाथ फैलाने' वाली स्थिति (Ship-to-mouth) से बाहर निकलना चाहता था ताकि विदेशी हस्तक्षेप हमारी संप्रभुता को प्रभावित न करे।
- समानता (Equity): संवृद्धि और आधुनिकीकरण तब तक व्यर्थ हैं जब तक उनका लाभ निर्धन वर्ग तक न पहुँचे। समानता का अर्थ है—हर भारतीय को भोजन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना।
3. कृषि क्षेत्र: ठहराव से आत्मनिर्भरता तक
आजादी के समय भारत की कृषि व्यवस्था बिचौलियों (जमींदारों) के चंगुल में थी और उत्पादकता अत्यंत कम थी। भारत को अपने भोजन के लिए अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ता था।
कृषि सुधार के तीन आयाम:
समानता लाने के लिए 'जोतने वाले को भूमि' (Land to the tiller) का सिद्धांत अपनाया गया:
- जमींदारी उन्मूलन: बिचौलियों को खत्म कर लगभग 200 लाख काश्तकारों का सरकार से सीधा संपर्क कराया गया।
- हदबंदी (Land Ceiling): एक व्यक्ति या परिवार के पास अधिकतम भूमि की सीमा तय की गई। अतिरिक्त भूमि भूमिहीनों में बाँटी गई।
- सीमाएं: केरल और पश्चिम बंगाल के अलावा अन्य राज्यों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण जमींदार कानून से बचने में सफल रहे।
1960 के दशक के मध्य में MS स्वामीनाथन के नेतृत्व में उच्च पैदावार वाले बीजों (HYV) का उपयोग शुरू हुआ।
- सकारात्मक प्रभाव: भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना। 'विपणित अधिशेष' (Marketed Surplus) बढ़ा, जिससे गरीब लोग अनाज खरीद सके।
- नकारात्मक प्रभाव: यह पंजाब और हरियाणा जैसे सीमित क्षेत्रों तक ही रहा। इसने क्षेत्रीय और सामाजिक असमानता को बढ़ावा दिया क्योंकि बड़े किसानों को इसका लाभ अधिक मिला।
4. सहायिकी (सब्सिडी) पर तीखी बहस
भारत में उर्वरकों और बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी हमेशा विवाद का विषय रही है।
- पक्ष में तर्क: कृषि एक जोखिम भरा व्यवसाय है। यदि सब्सिडी नहीं दी गई, तो गरीब किसान नई तकनीक (HYV बीज) नहीं अपना पाएंगे, जिससे अमीर-गरीब की खाई बढ़ेगी।
- विपक्ष में तर्क: सब्सिडी का बड़ा हिस्सा समृद्ध किसान और उर्वरक कंपनियाँ डकार लेते हैं। इससे सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है और संसाधनों का दुरुपयोग (जैसे—पानी और खाद का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल) होता है।
5. औद्योगिक विकास: महालनोबिस मॉडल और सार्वजनिक क्षेत्र
नीति-निर्माताओं का मानना था कि कृषि केवल आजीविका दे सकती है, लेकिन 'समृद्धि' केवल उद्योगों से आएगी।
प्रशांतचन्द्र महालनोबिस का योगदान:
द्वितीय पंचवर्षीय योजना को 'महालनोबिस मॉडल' कहा जाता है। उन्होंने भारी उद्योगों (जैसे स्टील, कोयला) पर ध्यान केंद्रित किया। वे भारतीय योजना के मुख्य वास्तुकार माने जाते हैं।
यह प्रस्ताव भारतीय समाजवाद का आधार बना। इसमें उद्योगों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया:
- अनुसूची A: पूरी तरह सरकारी नियंत्रण वाले उद्योग (जैसे—रक्षा, रेलवे)।
- अनुसूची B: जहाँ सरकार नेतृत्व करेगी लेकिन निजी क्षेत्र सहयोग कर सकता है।
- अनुसूची C: निजी क्षेत्र के लिए छोड़े गए उद्योग (लेकिन कड़े लाइसेंस के अधीन)।
लाइसेंस राज (Permit Raj):
निजी क्षेत्र को उद्योग शुरू करने, विस्तार करने या नया उत्पाद बनाने के लिए सरकार से 'लाइसेंस' लेना अनिवार्य था। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय समानता लाना था (पिछड़े क्षेत्रों में लाइसेंस आसानी से मिलते थे)। हालांकि, बाद में बड़े घरानों ने इसका दुरुपयोग प्रतिस्पर्धियों को रोकने के लिए किया।
6. लघु उद्योग (SSI) और कर्वे समिति
1955 में कर्वे समिति ने सुझाव दिया कि ग्रामीण विकास के लिए लघु उद्योग अनिवार्य हैं।
- श्रम प्रधान: ये उद्योग मशीनों के बजाय इंसानी श्रम का अधिक उपयोग करते हैं, जिससे रोजगार बढ़ता है।
- संरक्षण: बड़ी कंपनियों से बचाने के लिए कई उत्पादों को केवल लघु उद्योगों के लिए 'आरक्षित' कर दिया गया।
7. व्यापार नीति: अंतर्मुखी व्यापार रणनीति (आयात प्रतिस्थापन)
भारत ने 1990 तक **आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution)** की नीति अपनाई। इसका अर्थ था—"उन चीजों का आयात न करें जिन्हें देश में बनाया जा सकता है।"
- प्रशुल्क (Tariffs): आयातित माल पर भारी टैक्स लगाना ताकि वे महंगे हो जाएं।
- कोटा (Quotas): आयात की जाने वाली वस्तुओं की अधिकतम मात्रा तय करना।
- उद्देश्य: घरेलू उद्योगों को विदेशी बड़ी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा से बचाना।
8. 1950-1990 की अवधि का मूल्यांकन: सफलता और विफलता
| क्षेत्र | उपलब्धियाँ (सफलता) | कमियाँ (विफलता) |
|---|---|---|
| जीडीपी अंशदान | उद्योगों का हिस्सा 13% से बढ़कर 24.6% हुआ। | सेवा क्षेत्र का असामयिक उभार (कृषि से सीधे सेवा)। |
| खाद्य सुरक्षा | भारत खाद्यान्न में पूरी तरह आत्मनिर्भर बना। | दलहन और तिलहन की उपेक्षा हुई। |
| सार्वजनिक क्षेत्र | बुनियादी ढांचे का विकास हुआ। | भ्रष्टाचार, अकुशलता और भारी घाटा। |
| लाइसेंसिंग | क्षेत्रीय असंतुलन कम करने का प्रयास। | नौकरशाही का दबदबा और व्यापार में देरी। |
निष्कर्ष: 1991 की ओर एक अनिवार्य कदम
1950 से 1990 के चार दशकों ने भारत को एक ठोस आधार तो दिया, लेकिन 'संरक्षणवाद' और 'अत्यधिक सरकारी नियंत्रण' ने अर्थव्यवस्था की दक्षता को कुंद कर दिया था। भारतीय उत्पादकों के पास सुधार के लिए कोई प्रेरणा नहीं थी क्योंकि उनके पास एक 'सुरक्षित बाजार' था। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ सफेद हाथी साबित हो रही थीं। इन आंतरिक समस्याओं और 1991 के भुगतान संतुलन के संकट ने भारत को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। यही वह पृष्ठभूमि थी जिसने भारत को 'नई आर्थिक नीति' (LPG) की ओर धकेला।
