रोजगार: संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे
📅 विस्तृत शैक्षणिक सामग्री | भारतीय आर्थिक विकास (कक्षा 12)
किसी भी राष्ट्र की आर्थिक यात्रा की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसकी गगनचुंबी इमारतें कितनी ऊँची हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसके कितने नागरिक सम्मानजनक और उत्पादक रोजगार में लगे हुए हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए रोजगार केवल आय का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक स्थिरता और न्याय का आधार भी है। पिछले सात दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने कई संरचनात्मक बदलाव देखे हैं—जहाँ हम 'कृषि प्रधान' समाज से 'सेवा प्रधान' समाज की ओर बढ़े हैं। लेकिन इस विकास यात्रा में 'रोजगारहीन संवृद्धि' (Jobless Growth) और 'अनौपचारीकरण' (Informalisation) जैसे गंभीर संकट भी उभरे हैं। इस विस्तृत लेख में हम श्रमशक्ति की संरचना, रोजगार के बदलते स्वरूप, अनियतीकरण की चुनौतियां और बेरोजगारी के विविध रूपों का अत्यंत सूक्ष्म एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे।
1. प्रमुख अवधारणाएँ: श्रमिक और उत्पादक गतिविधियाँ
रोजगार के विश्लेषण को शुरू करने से पहले हमें अर्थशास्त्र की उन बुनियादी शब्दावलियों को समझना होगा जो श्रम बाजार को परिभाषित करती हैं।
उत्पादक गतिविधियाँ (Production Activities):
वे सभी क्रियाएँ जो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन या उनके प्रवाह में वृद्धि करती हैं, उत्पादक गतिविधियाँ कहलाती हैं। जीडीपी (GDP) इन्हीं गतिविधियों का मौद्रिक मूल्य है।
श्रमिक (Worker) कौन है?
वह व्यक्ति जो अपनी आजीविका कमाने के लिए किसी भी क्षमता (चाहे वह ऊँची हो या नीची) में उत्पादक गतिविधियों में शामिल है और देश की जीडीपी में योगदान देता है, 'श्रमिक' कहलाता है।
- अस्थायी अनुपस्थिति: यदि कोई व्यक्ति बीमारी, चोट, त्यौहार या सामाजिक कारणों से अस्थायी रूप से काम से दूर है, तो भी वह 'श्रमिक' माना जाता है।
- सहायक श्रमिक: मुख्य श्रमिक की सहायता करने वाले लोग (जैसे घर के व्यवसाय में हाथ बंटाने वाले बच्चे या महिलाएँ) भी 'श्रमिक' श्रेणी में आते हैं।
- स्व-नियोजित: अपने स्वयं के संसाधनों से काम करने वाले (जैसे दुकानदार, किसान) भी श्रमिक हैं।
2. श्रमिकों का वर्गीकरण: रोजगार की प्रकृति
भारत में रोजगार की विविधता को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
I. स्व-नियोजित श्रमिक (Self-employed):
ये वे लोग हैं जो अपने स्वयं के व्यवसाय या पेशे में लगे हैं और अपने ही संसाधनों (भूमि, पूँजी) का उपयोग करते हैं। भारत में लगभग 50% कार्यबल इसी श्रेणी में है। जैसे—किसान, निजी क्लीनिक चलाने वाले डॉक्टर, दुकानदार।
II. भाड़े के श्रमिक (Hired Workers):
जो दूसरों के लिए काम करते हैं और बदले में मजदूरी या वेतन प्राप्त करते हैं। इनके दो उप-प्रकार हैं:
- नियमित वेतनभोगी (Regular Salaried): जिन्हें नियोक्ता द्वारा स्थायी आधार पर रखा जाता है। इन्हें सामाजिक सुरक्षा लाभ जैसे पेंशन, भविष्य निधि (PF) और स्वास्थ्य बीमा मिलता है। भारत में यह संख्या मात्र 15-20% है।
- अनियत श्रमिक (Casual Workers): ये दिहाड़ी मजदूर होते हैं जिन्हें काम होने पर बुलाया जाता है। इनके पास न तो स्थायी नौकरी होती है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ। भारत का लगभग 33% श्रमबल इसी श्रेणी में है।
3. श्रमशक्ति और कार्यबल (Labour Force vs. Workforce)
इन दोनों शब्दों के बीच का बारीक अंतर बेरोजगारी की दर को स्पष्ट करता है।
- श्रमशक्ति (Labour Force): वे सभी लोग जो काम कर रहे हैं या काम की तलाश में हैं और काम के लिए उपलब्ध हैं। (आयु सीमा: 15-60 वर्ष)।
- कार्यबल (Workforce): उन लोगों की वास्तविक संख्या जो वास्तव में किसी आर्थिक गतिविधि में नियोजित हैं।
- बेरोजगार व्यक्ति = श्रमशक्ति - कार्यबल
नोट: जो लोग काम करने के इच्छुक नहीं हैं (जैसे छात्र, गृहिणी जो केवल घर का काम करती हैं, या जो स्वेच्छा से बेरोजगार हैं), उन्हें श्रमशक्ति का हिस्सा नहीं माना जाता।
4. भारत में कार्यबल की प्रवृत्तियाँ: क्षेत्रीय और लिंग वितरण
भारत का कार्यबल भौगोलिक और सामाजिक रूप से अत्यंत विविधतापूर्ण है।
क्षेत्रीय वितरण:
भारत का लगभग 70% कार्यबल ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है। शहरी क्षेत्रों में कार्यबल का मात्र 30% हिस्सा है। यह दर्शाता है कि आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही रोजगार का मुख्य आधार है।
लिंग वितरण और महिलाओं की भागीदारी:
- कुल कार्यबल में लगभग 70% पुरुष और 30% महिलाएँ हैं।
- ग्रामीण बनाम शहरी: ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक है। ग्रामीण इलाकों में हर तीन में से एक महिला श्रमिक है, जबकि शहरों में केवल पाँच में से एक।
- कारण: ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी अधिक है, जिससे महिलाओं को मजबूरी में अकुशल और कम मजदूरी वाले काम (जैसे खेत की निराई, गोबर उठाना) करने पड़ते हैं। शहरों में पुरुषों की आय अधिक होने के कारण और महिलाओं के पास उच्च शिक्षा/कौशल की कमी के कारण वे अक्सर घर पर रहना पसंद करती हैं या काम नहीं मिल पाता।
5. श्रमिक जनसंख्या अनुपात (Worker-Population Ratio)
यह अनुपात किसी देश की कुल जनसंख्या में उत्पादक रूप से लगे हुए लोगों के प्रतिशत को दर्शाता है।
भारत में यह अनुपात लगभग 39% है, जो विकसित देशों के मुकाबले कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में WPR (40%) शहरी क्षेत्रों (36%) से अधिक है, क्योंकि ग्रामीण बच्चे और महिलाएँ गरीबी के कारण शिक्षा छोड़कर जल्दी काम पर लग जाते हैं।
6. रोजगारहीन संवृद्धि (Jobless Growth): एक चिंताजनक संकेत
आर्थिक सिद्धांत कहता है कि GDP बढ़ने पर रोजगार बढ़ना चाहिए। लेकिन भारत में 1991 के बाद एक अजीब स्थिति देखी गई—अर्थव्यवस्था तो बढ़ी, लेकिन रोजगार के अवसर नहीं बढ़े।
1990 के बाद भारत की GDP 8% की दर तक बढ़ी, लेकिन रोजगार की वृद्धि दर मात्र 1% से भी नीचे (0.98%) रही। इसे ही 'जॉबलेस ग्रोथ' कहते हैं।
कारण:
- पूँजी-प्रधान तकनीक: कम्पनियाँ अधिक उत्पादन के लिए मजदूरों के बजाय आधुनिक मशीनों और रोबोटिक्स का उपयोग कर रही हैं।
- सेवा क्षेत्र का एकाधिकार: विकास का मुख्य केंद्र IT और बैंकिंग जैसे क्षेत्र रहे हैं, जहाँ केवल उच्च-कुशल लोगों की आवश्यकता होती है, जबकि देश का बड़ा हिस्सा अकुशल है।
- विनिर्माण (Manufacturing) का अभाव: चीन के विपरीत भारत में लेबर-इंटेंसिव फैक्ट्रियों का विकास नहीं हो पाया।
7. कार्यबल का अनियतीकरण (Casualisation)
अनियतीकरण का अर्थ है—सुरक्षित, नियमित वेतन वाली नौकरियों का घटना और असुरक्षित 'दिहाड़ी मजदूरी' का बढ़ना।
- असुरक्षा: अनियत मजदूरों को कभी भी बिना कारण बताए निकाला जा सकता है।
- सामाजिक सुरक्षा शून्य: उन्हें न तो छुट्टी के पैसे मिलते हैं, न ही बीमार होने पर चिकित्सा सहायता।
- मजबूरी: लोग स्वेच्छा से दिहाड़ी मजदूर नहीं बनते; जब उन्हें नियमित नौकरी या खेती में पर्याप्त आय नहीं मिलती, तब वे इस ओर मुड़ते हैं।
8. भारतीय श्रमबल का अनौपचारीकरण (Informalisation)
यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत की अर्थव्यवस्था दो समांतर हिस्सों में बंटी है:
| विशेषता | औपचारिक क्षेत्रक (संगठित) | अनौपचारिक क्षेत्रक (असंगठित) |
|---|---|---|
| परिभाषा | सरकारी विभाग और 10+ मजदूरों वाले निजी संस्थान। | छोटे खेत, रेहड़ी-पटरी, घरेलू कामगार, <10 मजदूर वाली इकाइयाँ। |
| सामाजिक सुरक्षा | पेंशन, PF, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व अवकाश मिलता है। | कोई लाभ नहीं। 'काम नहीं तो दाम नहीं' का नियम। |
| कानूनी सुरक्षा | श्रम कानूनों (Labour Laws) का कड़ा पालन। | न्यूनतम वेतन कानून भी अक्सर लागू नहीं होता। |
| शक्ति | मजबूत ट्रेड यूनियन और सौदेबाजी की शक्ति। | असंगठित, कोई सामूहिक आवाज़ नहीं। |
| भारत में स्थिति | मात्र 6% श्रमिक यहाँ हैं। | विशाल 94% श्रमिक यहीं संघर्ष कर रहे हैं। |
9. बेरोजगारी (Unemployment): स्वरूप और कारण
बेरोजगारी मानवीय संसाधनों की बर्बादी है। भारत में बेरोजगारी केवल 'काम का न होना' नहीं है, बल्कि 'सही काम का न होना' भी है।
प्रमुख प्रकार:
- प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment): खेती में सबसे अधिक। जहाँ 2 लोगों की जरूरत है, वहां 5 लोग लगे हैं। उन 3 अतिरिक्त लोगों को हटाने पर भी उत्पादन कम नहीं होगा।
- मौसमी बेरोजगारी: जो केवल खेती के सीजन में काम पाते हैं और बाकी साल बेरोजगार रहते हैं।
- संरचनात्मक बेरोजगारी: जब बाजार को 'कंप्यूटर ऑपरेटर' चाहिए और आपके पास केवल 'फाइल क्लर्क' का कौशल है।
- खुली बेरोजगारी: व्यक्ति काम के लिए पूरी तरह तैयार है, पर बाजार में काम का नामोनिशान नहीं है।
1. NSSO: राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (अब PLFS)।
2. Census of India: जनगणना रिपोर्ट।
3. Employment Exchange: रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत नाम।
10. सरकार और रोजगार सृजन: मनेरगा (MGNREGA)
सरकार रोजगार पैदा करने के लिए दो तरह से प्रयास करती है:
- प्रत्यक्ष (Direct): सरकारी विभागों और सेना में नई भर्तियाँ करना।
- अप्रत्यक्ष (Indirect): बुनियादी ढाँचे (सड़क, बिजली) में निवेश करना ताकि निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ें।
MGNREGA 2005: यह दुनिया का सबसे बड़ा रोजगार गारंटी कार्यक्रम है। यह प्रत्येक ग्रामीण परिवार के कम से कम एक सदस्य को वर्ष में 100 दिन के अकुशल कार्य की 'कानूनी गारंटी' देता है। यदि सरकार काम नहीं दे पाती, तो वह 'बेरोजगारी भत्ता' देने के लिए बाध्य है।
निष्कर्ष: रोजगार की गुणवत्ता की चुनौती
भारत में असली समस्या केवल 'बेरोजगारी' नहीं है, बल्कि 'रोजगार की गुणवत्ता' है। करोड़ों लोग 'काम' तो कर रहे हैं, लेकिन उनकी आय इतनी कम है कि वे गरीबी रेखा से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। 'कार्यबल का अनौपचारीकरण' भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि यह सामाजिक विषमता को बढ़ाता है। भविष्य में भारत को यदि 'विकसित राष्ट्र' बनना है, तो हमें 'जॉबलेस ग्रोथ' के जाल से बाहर निकलकर 'रोजगार-प्रधान विकास' (Labour Intensive Growth) की ओर बढ़ना होगा। कौशल विकास (Skill India) और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना ही इसका एकमात्र समाधान है।
